काव्य-शिवेंद्र यादव

कल के खेल कभी हम खेला करते थे खिलौनों से,धूल-मिट्टी,पत्तों,डालों से खुले मैंदानों में। बाबा बताते…

अंक-2-गिरीश पंकज की कविता फेसबुक वाल से

इतनी कुंठा और निराशा ठीक नहीं सबको गाली देती भाषा ठीक नहीं। आप बड़े ज्ञानी-ध्यानी हैं…

काव्य-हरेन्द्र यादव

तपती दोपहरी बियावन कानन है तपती दोपहरी चिट-चिटिर करती फुदकती गिलहरी बरगद की डाली में यहां-वहां…

काव्य-जैन करेलिवी

(1) मोबाइल यूं चढ़ा ज्यों मसान का भूत, पेंशन लेते बाप हों या नकारा पूत। नकारा…

काव्य-देव भंडारी

तटस्थों का शहर सब तटस्थ हैं यह तटस्थों का शहर है। न कोई शत्रु यहां, न…

काव्य-मोहिनी ठाकुर

(1) दिन को बना लिया बिछौना, रात ओढ़ ली अब चांद निकलने की, हमने आस छोड़…

काव्य-कृष्णचन्द्र महादेविया

धर्म सोपुर के पुल पर कुछ कहा था पीछे से उसने शायद कश्मीरी में मुड़ा था…

काव्य-पुरषोत्तम चंद्राकर

हाइकू जल तरंग इंद्रधनुष रंग मन पतंग। मखमल में टाट पर पैबंद बेजान रिश्ते। गुरू की…

काव्य-नवल जायसवाल

जाने के कारण मित्र! यदि आप मित्र हैं तो कहना चाहूंगा मैं तेरी ओलती में खड़ा…

काव्य-अशोक आनन

हमने घर-घर बस्तर देखे कैसे-कैसे मंजर देखे दुश्मन घर के अंदर देखे। बस्ती का क्या हाल…