कल के खेल कभी हम खेला करते थे खिलौनों से,धूल-मिट्टी,पत्तों,डालों से खुले मैंदानों में। बाबा बताते…
Category: काव्य
अंक-2-गिरीश पंकज की कविता फेसबुक वाल से
इतनी कुंठा और निराशा ठीक नहीं सबको गाली देती भाषा ठीक नहीं। आप बड़े ज्ञानी-ध्यानी हैं…
काव्य-हरेन्द्र यादव
तपती दोपहरी बियावन कानन है तपती दोपहरी चिट-चिटिर करती फुदकती गिलहरी बरगद की डाली में यहां-वहां…
काव्य-जैन करेलिवी
(1) मोबाइल यूं चढ़ा ज्यों मसान का भूत, पेंशन लेते बाप हों या नकारा पूत। नकारा…
काव्य-मोहिनी ठाकुर
(1) दिन को बना लिया बिछौना, रात ओढ़ ली अब चांद निकलने की, हमने आस छोड़…
काव्य-कृष्णचन्द्र महादेविया
धर्म सोपुर के पुल पर कुछ कहा था पीछे से उसने शायद कश्मीरी में मुड़ा था…
काव्य-पुरषोत्तम चंद्राकर
हाइकू जल तरंग इंद्रधनुष रंग मन पतंग। मखमल में टाट पर पैबंद बेजान रिश्ते। गुरू की…
काव्य-नवल जायसवाल
जाने के कारण मित्र! यदि आप मित्र हैं तो कहना चाहूंगा मैं तेरी ओलती में खड़ा…