काव्य-जैन करेलिवी

(1)
मोबाइल यूं चढ़ा ज्यों मसान का भूत,
पेंशन लेते बाप हों या नकारा पूत।
नकारा हो पूत, बॉस बाबू चपरासी,
नेता बनिया कुली कबाड़ी चौकीदार खलासी।
हर तबके के नर-नारी की यही एक स्टाइल,
बाबा मांगें भीख मगर रखते मोबाइल।
(2)
बिन नथनी के नाक ज्यों बिन बिंदिया के माथ,
ऐसे ही सूनो लगे मोबाइल बिन हाथ।
मोबाइल बिन हाथ, बनी क्या चीज निराली,
नहीं अछूती कोई सास साली घरवाली।
साड़ी रंग से मेच करे यूं कम्मर में लटकायें,
सरेआम वे प्रियजनों से हंस-हंस के बतियायें।
(3)
इस रचना को देखकर ब्रह्मा जी हैं दंग,
मोबाइल ऐसो भयो ज्यों शरीर को अंग।
ज्यों शरीर को अंग, रहें बाहर या घर में,
रहे हमेशा संग, करें पूजा मंदिर में।
आरती गा रय घंटी आ गई, कितना पेमेंट करे,ं
तीन लाख का चेक काट दो, ओम जय जगदीश हरे।

जैन ‘करेलिवी’

मेन रोड,करेली म.प्र.