काव्य-नवल जायसवाल

जाने के कारण

मित्र!
यदि आप मित्र हैं तो
कहना चाहूंगा
मैं तेरी ओलती में खड़ा हूं
बाहर बरसात हो रही है
वह रूक जायेगी
मैं चला जाऊंगा।
कविता रूठ गई है
मैंने लीपिका ओढ़ लिया है
विषय मेरे अपने हैं
मात्राओं के साथ
छन्दों की तलाश है
समन्वय होते ही
मैं चला जाऊंगा।
छत के नीचे की
एक दीवार ढह गई है
स्थायी ने साथ नहीं दिया
चटखारे लेकर हंस रही है
मैं अपनी लेखनी खोज रहा हूं
संवर जाने के बाद
मैं चला जाऊंगा।
आकाश और मेरे बीच
बादल क्यूं आ जाते हैं
जब बरसात ही न हो तो
अपने विचारों को झकझोर कर
समन्दर अपना जल दे दे
अपना आराम पा लूं
मैं चला जाऊंगा।

संतानों ने नाप लिए हैं
मेरी आयु के पड़ाव
उन्हें गिनती आती है
दस के बाद नौ नहीं गिनेंगे
नौ के बाद शून्य उन्हें मालूम है
मैं अपना अंक पा लूं
मैं चला जाऊंगा।
समय ने अपने खण्डकाव्य में
स्पष्ट लिख रखा है
पल, घड़ी, दिवस, सप्ताह
माह, वर्ष, शताब्दी
और सहस्त्रशताब्दी
मेरा युग पूर्ण होते ही
मैं चला जाऊंगा।
कविताएं लिखी
दोहे-चौपाई भी लिखीं
खण्डकाव्य भी लिखा
बड़ी-छोटी कहानियां लिखीं
उपन्यास का भी समापन किया
आत्मकथा का अंत लिख लूं
मैं चला जाऊंगा।

नवल जायसवाल
प्रेमन, बी 201, सर्वधर्म
कोलार रोड, भोपाल-462042
मो.-07552493840