काव्य-हरेन्द्र यादव

तपती दोपहरी

बियावन कानन है तपती दोपहरी
चिट-चिटिर करती फुदकती गिलहरी
बरगद की डाली में यहां-वहां जाती
बगल से महुआ चुन-चुनकर लाती।

पास उसके बैठी है कोयल दीवानी
पिहू-पिहू रटती पपीहा मस्तानी
जब सुनाई देती किदर्री की तान
तब भान होता है, है ये बियावान।

झिंगुर भी चिकी-मिकी राग है सुनाता
लम्पुछिया फुदक-फुदक है मन को भाता
दूर-दूर मृगतृष्णा ही नजर आती
ऐसे में छाया ही मन को भाती।

इस निर्जन कानन का बरगद छतनार
लगता है यहां का पहरेदार
छोटे-बड़े पंछी यहां उड़कर आते
अपनी-अपनी, अलग-अलग धुन है सुनाते।

गरम-गरम, सांय-सांय चलती पुरवइया
तन-मन शीतल करती बरगद की छंइया
आते-जाते पथिक यहां करते विश्राम
तब जाते-ढलती दोपहरी की घाम।

चौकड़ी भरते दिखते कभी मृग छौने
ऊंचे-ऊंचे पेड़ तले लगते हैं बौने
कठफोड़वा ठक्क-ठक्क ताल है बजाता
पुक्क-पुक्क कर पुक्का सुर है मिलाता।

कौन ये गीतकार छेड़े हैं गीत
संग होती ऐसे में कोई मनमीत
तपती दोपहरी भी लगती तब न्यारी
गोदी सिर रख सहलाती प्यारी।

मैं और मेरी कलम

मैं
और मेरी कलम
चलते हैं दोनो साथ-साथ।
कभी- पतझर
कभी-बहारों की तलाश में
कभी-सेम्हल, टेसू
गुलमोहर की आस में
चलते हैं
दोनों साथ-साथ
कभी-भंवरों के साथ गुनगुनाते हैं
कभी-कलियों संग मुस्काते हैं
कभी-चिड़ियों की चहक में
मन बहलाते हैं।
कभी-उनके राग में राग मिलाते हैं
कभी-देख आते हैं
खद्दर की झोपड़ी
उसमें निश्चिन्त पसरे, उघरे
पिचके पेट
कभी-बढ़ती मंहगाई
चीजों के बढ़ते रेट
घूसखोर, चापलूस
लोभी धन्ना सेठ
कभी-चिन्गारी से
शोलों तक का सफर
कभी-जमीन से आकाश तक
खो जाते हैं,
तारा मण्डल में
उल्का पिण्डों की तालाश में।
मैं
और मेरी कलम
कभी-बारूद की गंध लने
पहुंच जाते हैं सीमा पार
और देख आते हैं
कायराना हरकत
उस पार की
मैं
और मेरी कलम
चलते हैं साथ-साथ

हरेन्द्र यादव
सेवानिवृत्त वन क्षेत्रपाल
सरगीपालपारा
कोण्डागांव, छ.ग.
मो.-09424291952