काव्य-देव भंडारी

तटस्थों का शहर

सब तटस्थ हैं
यह तटस्थों का शहर है।

न कोई शत्रु यहां, न कोई मित्र
न कोई पक्ष, न विपक्ष
भयावह संत्रास चेहरे पर
कोई कुछ बोलता नहीं
तटस्थता ओढ़े हुए हैं सब।

सत्य कहने का सामर्थ्य नहीं
और झूठ को झूठ भी कह नहीं सकते
कोई सफेद को सफेद नहीं कहता
न काले को कोई काला कहता
अवसर मिला तो रंगीन बनेगा
मुंह में कुछ और, मन में कुछ और
संबंध में नहीं अपनापन
मन नहीं हंसता, मात्र होंठ हंसते हैं।

बिना रूप का चेहरा
बिना दृश्य की आंख
बिना रंग की तस्वीर
बिना रास्ता के बटोही
यह शहर……..तटस्थों का शहर।

न स्वागत के दरवाजे खुलते हैं न झरोखे
न जलती हैं तिरस्कार की आंखें
न मुरस्कराकर कोई पास आता है
न सम्मान होता है न अपमान
क्या हुआ इस शहर को?
चहल पहल ऐसी कि मुर्दे जाग उठे हैं
न कोई अपना, न कोई बेगाना
यह शहर…….तटस्थों का शहर।

लगता है छोड़कर चला जाउं
या धुंध में समा जाउं
यह शहर, ये लोग, यहां की गलियां
ये सड़क, ये सन्नाटा
यहां के उजड़े-उजड़े से मुखौटे
यहां मुझे न अमृत पीने को मिला न विष
न जीवन मिला न मृत्यु
न रंग मिला, न रोगन
यह शहर…….तटस्थों का शहर।


देव भंडारी
एच.एल.डी रोड
कलिम्पोंग
जिला-दार्जिलिंग
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