चिंतन आलेख-मन-जयचंद्र जैन

मन
“मनसो रेतःप्रथमं यदासीत्“-ऋग्वेद के इस नासदीय सूक्त के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति का कारण मन है । मन के बिना कोई क्रिया संभव नहीं है । मन हृदय का केन्द्र-बिन्दु है । संसार में मनुष्य के मन का विकास सभी प्राणियों के मन से अधिक है । मनुष्य का मन सदा अच्छे और बुरे दोनों विचारों को अपने अन्दर समाये रखता है । जब मन बुरे कामों में लगता है, तो वह पाप-कर्मों की ओर प्रवृत्त होता है, लेकिन जब मन अच्छे कर्मों में रुचि लेता है, तो पुण्य के कामों में लगता है । वैसे मन बुरे कामों की ओर जल्दी प्रवृत्त होता है। जब मनुष्य संसार के कार्यों मे लगता है, तब सांसारिकता में ही फँसा रहता हैं । पुण्य के कामों से मनुष्य का मन निर्मल हो जाता है । इससे उसे संसार के बंधनों से मुक्ति का मार्ग मिलता है ।
मन बडा चंचल है । वह तो भुक्त और अभुक्त दोनों क्षणों की याद करके कल्पना-लोक में सुख या दुख का अनुभव करता रहता है। नई-नई इच्छाओं को जन्म देना मन का काम है । जब हमारे मन में कोई इच्छा जागृत होती है, तो हम उसकी पूर्ति के लिये प्रयत्नशील होते हैं । अर्थात् मन ही हमें क्रियाशील बनाता है । यही मन नई-नई वस्तुओं, पदार्थों और पदों को प्राप्त करने के लिये मनुष्य को उद्यमशील बनाता है । यदि मनुष्य के मन में किसी चीज़ की इच्छा जागृत न हो, तोे वह क्रियाविहीन हो जाता है, फिर उसका इस संसार में होना या न होना बराबर है । जब मन की अभिलषित वस्तु प्राप्त नहीं होती, तो मन में क्रोध और जब वह प्राप्त हो जाती है, तो खुशी होती है और फिर व्यक्ति बार-बार वही करता है, जिससे उसे खुशी मिलती है ।
कर्म करके फल न मिलने पर मनुष्य निराश हो जाता है । निराशा मनुष्य को पतन के मार्ग में ढकेल देती है । निराशा के समय यदि हम कृष्ण को याद कर लें, तो हमारा पतन रुक जाता है । कृष्ण ने ’गीता’ में यही तो कहा है कि हम कर्म करने के अधिकारी हैं, फल प्राप्त करने की इच्छा रखने के नहीं । हमंे तो मात्र अपनी कर्मनिष्ठा का निर्वाह करना है और फल की कामना को प्रभु-आश्रित कर देना है । जब हमारी कर्मनिष्ठा में प्रभु की उपस्थिति दर्ज हो जायेगी, तो हमारे कर्म भी अच्छे होंगे, जिससे हमें पुण्य मिलेगा । पुण्य तो सदा शुभफलदायी होता है ।
हमारा मन खण्डों मे विभाजित है । यह विभाजन हमारी इंन्द्रियाँ है। एक इन्द्रिय अपनी इच्छा की पूर्ति के लिये दूसरी इन्द्रिय का विरोध करती भी दिखती है । जब जिस इन्द्रिय का प्रभाव मन पर अधिक होता है, तो वह मन को भी अपने वश में कर लेती है और अपनी इच्छापूर्ति में सफल हो जाती है। खाना खाते समय हमारा पेट अनुभव करता है कि अब अधिक नहीं खाना चाहिये, क्योंकि भूख शान्त हो गई, लेकिन उसी समय जीभ आकर पेट का विरोध करने लगती है कि मुझे तो रसमलाई अच्छी लग रही है, मैं और खाऊँगी। इस विचार से वह मन को भी प्रभावित कर लेती है फिर पेट को जबरदस्ती और रसमलाई को अपने अन्दर जगह देनी पड़ती है । यह द्वन्द्व इन्द्रियों में हमेशा चलता रहता है । इस द्वन्द्व का दुष्परिणाम हमेशा शरीर को भोगना पड़ता है । इन्द्रिय और मन के तालमेल से यह परिस्थिति निर्मित होती है। इससे बचने के लिये इन्द्रिय और मन की भिन्नता का ज्ञान आवश्यक है । विवके-पूर्ण बुद्धि से हम इस भिन्नता को जान सकते हैं । यह ज्ञान मनुष्य को सदा सुखी बनाता है ।
जब हमारा मन शरीर के वशीभूत हो कुछ गलत काम कर बैठता है, और फिर शान्त होने पर उस घटना या कार्य के अच्छे या बुरे पक्ष पर विचार करता है, तो मन बुरे काम करके पछताता भी है, लेकिन उस बुरे काम के सांसारिक सुखद अनुभव मन को उस सुख की याद दिला-दिलाकर प्रभावित कर लेते हैं और हमारा चंचल मन फिर उन बुरे कामों की ओर प्रवृत्त हो जाता है । हमारा मन गलत काम करने से डरता है और उन कामों को वह हमेशा लुक-छिपकर करना चाहता है । वह डरता रहता है कि कोई मुझे देख न ले । आज की घनी आबादी के कारण व्यक्ति की पहचान समाप्त होती जा रही है, जिससे अपराधों में वृद्धि हो रही है । जब मन किये गये बुरे कामों की याद करके पछताता है, तब यदि हमारा बुद्धि-तत्व (विवेक) प्रबल हो जाये और मन को अपनी ओर आकर्षित कर ले, तो हमारा मन उन बुरे कामों से बच जाता है । भौतिक जगत में देखा जाता है कि व्यक्ति नशे की दशा में जघन्य से जघन्य अपराध करने से भी बाज़ नहीं आता, क्योंकि नशे में मन की विवके-क्षमता समाप्त हो जाती है और वह अपराध कर बैठता है, भले ही उसे उसका कितना भी बड़ा दुष्परिणाम क्यों न भोगना पडे़ ।
मनुष्य के मन का रथ बडी तेजी से दौडता है, इसलिये मनुष्य की इच्छायें उसे अपने दबाव में घेरे रहती हैं । जो इच्छा उसे प्रभावित कर लेती है, वह उसी के वश में हो जाता है । यदि मनुष्य अपने मन की सार्थक बात सुनने लगे, तो वह अपनी इन्द्रियों के मोहजाल से आसानी से बच सकता है । इससे उसे खुशी तो मिलेगी ही, उसके मनोरथ भी सिद्ध होंगे । हमारा मन हमारी चेतना का प्रहरी है । जब हम अपने मन को भगवान से जोड देंगे तो हमारा दुख और इन्द्रियों की दासता स्वयं छूट जायेगी । इस बात को तुलसी दास जी ने कहा है कि:-
भव भेषज रधुनाथ जसु सुनाहिंजे नर अरू नारि ।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करिहिं त्रिसिरारि ।
सीता-हरण के बाद जब रावण माँ सीता को लंका की अशोक- वाटिका में रखता है, तो वह सीता को आकर्षित करने के अनेक उपाय करता है। सीता फिर भी अपने सतीत्व से नहीं डिगती । हारकर रावण श्रीराम का वेष धारण कर अशोक-वाटिका जाता है । तब रावण न केवल वेष में राम बना था, बल्कि वाणी और आचरण में भी उसने राम को अपने जीवन में उतारा था, जिससे सीता को अपना बनाने के उसके विचारों पर स्वयं अंकुश लग गया था। लेकिन जब रावण वापिस अपने महल आया और जैसे ही वह राम का वेष त्यागकर फिर रावण बना, तो फिर सीता को अपनी बनाने की चाल सोचने लगा। क्योंकि हमारा वेष, वाणी और विचार हमारे मन को प्रभावित करते हैं ।
हम शरीर, आत्मा और मन से बने है । सांसारिक मनुष्य का जीवन शरीर से प्रारंभ होता है और शरीर पर ही खत्म हो जाता है । वे आत्मा और मन के विषय में सोचते ही नहीं । उनके लिये शरीर ही सब कुछ होता है । उनके सारे क्रिया-कलाप शरीर को केन्द्र-बिन्दु में रखकर ही होते हैं । मनुष्य अपने शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति में ही दिन-रात लगा रहता है । उनका शरीर अपनी सीमा लाँघकर दूसरों के अधिकार-क्षेत्र में घुसकर भी अपने शरीर को पोषित करने में नहीं हिचकता । जब शरीर के साथ मन और आत्मा का संयोजन हो जाता है, तो सारी व्यवस्थायें स्वयं सुचारु रुप से चलने लगती हैं । हमें अपने भोजन पर अधिक ध्यान देना होगा, क्योंकि हमारा भोजन ही मन को सात्विक, तामसिक और राजसिक बनाता है । यदि हमें मन का प्रयोग आत्मोन्नति के लिये करना है, तो हमें मन में सात्विक भाव पैदा करने वाला भोजन करना चाहिये । भोजन के साथ ही हमारी वाणी और आचरण भी मन को सात्विक बनाने में सहयोगी होते हैं ।
बुरे कामों में प्रवृत्त मन को समझने के लिये हम एक छोटे-से उदाहरण का सहारा ले सकते हैं । हम अपने मन को प्लास्टिक की बर्नी मान लेते हैं । उसमें हम आधा इंच गिट्टी एक-एक करके डालते हैं । एक समय ऐसा आता है, जब हमें लगता है कि इस बर्नी में और गिट्टी नहीं डाली जा सकती, फिर भी यदि हम एकाध मुट्टी जीरो गिट्टी उसमें डालने लगें और बर्नी को हिलायें, तो वह भी उसमें समा जायेगी । इसके बाद भी उस बर्नी को हिला-डुला कर थोडी-बहुत रेत डाली जाये, तो बर्नी में वह भी समा जायेगी, लेकिन देखने पर लगता है कि अब इस बर्नी में कुछ नहीं समा सकता, फिर भी उस बर्नी में एकाध कप पानी डाला जाये, तो वह बर्नी उस पानी को भी अपने अंदर जगह दे देगी । यद्यपि बुरे काम मन को अच्छे लगते हैं, क्योंकि उन्हें करके शरीर को सुखाभास होता है और शरीर उन्हीं कामों को करने के लिये इन्द्रियों को उकसाता है और साधारणतः लगता है कि मन तो चिकना घडा है, इसमें किसी अच्छी बात के लिये कोई जगह नहीं, लेकिन बर्नी में जिस प्रकार कुछ ज़ीरो गिट्टी, रेत और फिर पानी को समाया जा सका, उसी प्रकार यदि हम बुरे कामों में लगे मन में छोटी-छोटी सदाचरण की आदत डालने का प्रयत्न करें, तो एक दिन बुरे कामों में लगे मन में भी सदाचरण के अंकुर फूट सकते हैं। जब हमारे मन में सदाचरण के भाव जागृत होने लगें, तो हमें स्वयं को परमात्मा से जोड देना चाहिये । परमात्मा से जुडने पर मन धीरे-धीरे बुरे कामों से बचकर शुभ कामों में लगने लगेगा, जो मनुष्य के पुुण्योदय का कारण बनेगा।
मन को हम दो रूपों में जान सकते हैं । सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहने वाला मन द्रव्य मन है । द्रव्य-मन इच्छा, राग-द्वेष, क्रोध, असंयम और भौतिक पदार्थो के प्रति आसक्ति का कारण है । हमारा द्रव्य-मन इन्हीं भावनाओं से घिरा रहता है और शरीर को पसंद आने वाले साधनों को जुटाने में प्रयत्नशील रहता है।
भाव-मन चिंतन-मनन, संकल्प-विकल्प और ज्ञान की विशेष अवस्था का नाम है । हमारा द्रव्य-मन हमेशा भाव-मन को चंचल बनाये रखता है और हम चिंतन-मनन, धर्म-कर्म या साधना से दूर होते चले जाते हैं । यह द्रव्य-मन हमें अपने संकल्पों से भी दूर बनाये रखता है । द्रव्य-मन हमें संसार में भटकाता रहता है, जबकि भाव-मन हमें निवृŸिा की ओर प्रेरित करता है । यह निवृŸिा का मार्ग हमें तब तक नहीं मिल सकता, जब तक हम अपने द्रव्य-मन को स्थिर न कर लें । अपने द्रव्य-मन और भाव-मन में संतुलन रखना आज के समय की माँग है ।
मन के हारे हार है मन के जीते जीत
एक बार की बात है कि बौद्ध भिक्षु चीन गये । सभी जगह उनकी चर्चा होने लगी । सभी लोग उनके पास ज्ञान-प्राप्ति और अपनी शंकाओं के समाधान के लिये आने लगे । एक दिन वहाँ का राजा भी उनके दर्शन के लिये आया । संत जी का अभिवादन कर वह उनके पास बैठ गया । संत जी ने उनसे आने का कारण पूछा, तो राजा ने कहा कि प्रभु, मुझे ऐसा उपाय बतायें, जिससे मेरा मन शांत रहे । सन्त जी ने कहा कि अब जब भी आप आयें, अपने मन को साथ लेकर आयें । तभी आपकी समस्या का समाधान हो सकेगा । राजा बड़ा अचंभित हुआ कि मन कोई दिखने वाली चीज तो है नहीं, जिसे पकड़कर मै अपने साथ ला सकूँ । खैर, अगले दिन फिर राजा महात्मा जी के पास गया और कहने लगा कि प्रभु, मन हाथ-पैर, नाक, कान या शरीर जैसी दिखने वाली चीज़ तो है नहीं, जिसे मैं अपने साथ ला सकूँ । सन्त जी ने कहा कि कोई बात नहीं। अब आप पालथी मारकर आँख बन्द करके बैठ जाइये । मैं आपके मन को बुलाता हूँ । संत जी ने कहा कि अब आप खोजें कि आपका मन कहाँ है ? मैं अभी उसे शांत कर दूँगा । वास्तव में मन तो व्यक्ति के विचारों और स्मृतियों का संकुल है । वह कोई दृश्यमान चीज़ नहीं है । राजा संत जी का आदेश पाकर शांत चिŸा होकर बैठ गया और अपने मन को खोजने लगा । ज्यों-ज्यों वह ध्यान में डूबता गया, त्यों-त्यों उसे लगने लगा कि मन नाम की तो कोई चीज़ है ही नहीं । उसे पता चला कि आंख बन्द करके शान्त चिŸा बैठने पर निरंतर विचारों की शृंखला आ-जा रही है कुछ, विचार अच्छे हैं कुछ विचार बुरे । कुछ विचार उसे दूसरे राजा पर आक्रमण करने के लिये प्रेरित कर रहे है, तो कुछ विचार इसी मुद्रा में संत जी के पास बैठे रहने को उकसा रहे हैं । कुछ सुखद क्षणों की याद आ रही है, तो कुछ दुखद क्षण परेशान कर रहे हैं । अन्त में उसे समझ में आया कि मन पूर्व-विचारों और स्मृतियों का समूह मात्र है ।
मन को समझने के लिये हमें समझना होगा कि जब मन में कोई विचार उठता है, तो उसे बुद्धि ग्रहण करती है । फिर मन और बुद्धि दोनों उस विचार को कार्य रूप में परिणत करने के लिये सम्बन्धित इन्द्रिय को प्रेषित करते है । सम्बन्धित इन्द्रिय उसे कार्यरूप मे परिणत करने में उतनी ही प्रेरित होती है, जितनी मन की प्रेरणा होती है । यदि मन में उस कार्य को करने की उत्कट इच्छा है, तो सम्बन्धित इन्द्रिय भी उतनी ही तैयारी के साथ उस विचार को सफल करने में लग जाती है । जब इन्द्रिय मन और बुद्धि के द्वारा प्रेषित संदेश पर कार्य करने लगती है, तो उसे यह ज्ञान ही नहीं रहता है कि यह कार्य अच्छा है या बुरा । वह तो मात्र मन का आदेश पालन करती है । सभी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ उस कार्य को करके मन को प्रसन्न करना चाहती हैं । वैसे मन को बुरे काम जल्दी आकर्षित करते हैं, क्योंकि उनको करने से मनुष्य को क्षणिक मज़ा आता है । तभी मनुष्य चोरी, डकैती, लूटपाट, मारपीट, हत्या और बलात्कार जैसे कार्य कर बैठता है । भले ही बाद में वह पछतावे । मन तो उस चीज़ का आनन्द उठाने के लिये भी इन्द्रिय को प्रेरित कर सकता है, जो उपस्थित ही नहीं होती । तभी तो मन में इमली का विचार आते ही मुंह में पानी आने लगता है ।
मन तो इतना प्रबल है कि वह बुद्धि के निर्णय को भी नकार देता है और सम्बन्धित इन्द्रिय को संदेश देकर अपने अभिलषित कार्य को करा लेता है। इन्द्रिय भी मन को खुश करने के लिये कार्य करने लगती है ।
खूबसूरती किसी चीज़ में नहीं, बल्कि मन में होती है । मन की सुन्दरता ही उसे सुन्दर बनाती है, तभी तो काली लैला मजनूँ के मन में जन्नत की हूर थी ।
जीवित शरीर में मन का विकास होता है । मन ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का अधिपति है । इसलिये मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय कहा गया है ।
यह भी होता है कि यदि बुद्धि और इन्द्रिय किसी काम को करना चाहती है, लेकिन मन को वह कार्य पसंद नहीं होता, तो मन इन्द्रिय और बुद्धि को उस कार्य को नहीं करने देता । मन की कोई निजी सŸाा नहीं है । लेकिन फिर भी वह इन्द्रिय और बुद्धि का आधिपति बनकर बैठा है ।
सर्वप्रथम मन की प्रेरणा से ज्ञानेन्द्रिय अपने विषय के ज्ञान का संदेश मन के माध्यम से बुद्धि को देती है । फिर बुद्धि मन के माध्यम से कर्मेन्द्रिय को प्रेरित कर कार्य का निष्पादन कराती है । इन्द्रियों की सक्रियता जीवन और निष्क्रियता मृत्यु है । बुद्धि के कार्यों को कार्य रूप में परिणत कराना भी मन का ही कार्य है । जब तक शरीर में प्राण है, तब तक मन, कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ सक्रिय रहती हैं । यह भी होता है कि जब बुद्धि और इन्द्रियाँ किसी कार्य को करना नहीं चाहतीं, लेकिन मन उस कार्य को करना चाहता है, तो वह इन्द्रियों से बलपूर्वक वह कार्य करा लेता है । इस प्रकार कार्य योजना के प्रारंभ होने से लेकर कार्य निष्पादन तक की सभी क्रियाओं का प्रेरक और संचालक मन ही है । मन ही सभी कार्यों का आदि और अन्त है ।
आज का व्यक्ति इस भौतिकवादी युग में प्रभाव और अभाव में ज़िन्दा है । व्यक्ति तो किसी से मिलता भी प्रभाव, भाव और अभाव के कारण ही है । प्रभाव से मिलने में खुशामद, भाव से मिलने में श्रद्धा और अभाव से मिलने में याचना होती है । मन ही व्यक्ति को प्रभाव, भाव और अभाव के कारण किसी से मिलने के लिये प्रेरित करता है । मन की प्रबलता इतनी जबरदस्त है कि कभी-कभी वह अनहोनी बात को भी हुई मानकर बुद्धि, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को अपनी बात मनवाने के लिये बाध्य कर देता है ।


जयचंद्र जैन
जगदलपुर
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