-1- अपने ही घर में अपने ही साये से डर लगा सेहरा में जा के बैठे…
Category: पद्य
ग़ज़ल-शमीम बहार
ग़ज़ल-1 वक्त अंधेरे में देखने वाला नहीं होता, शहर वतन में क्या-क्या नहीं होता. सुबहो-शाम ये…
काव्य-डॉ राजाराम त्रिपाठी
कौन हो तुम लोग कौन हो तुम लोग ? जो बिना मांगे दे रहे हो- कभी…
काव्य-श्यामनारायण श्रीवास्तव
श्यामनारायण श्रीवास्तव की दो कविताएं साक्षात्कार मात्र एक देश नहीं सम्पूर्ण धरा पर कहीं भी आना…
काव्य-शशांक श्रीधर
चिन्ता (बस्तर में अमन की) खाने की मेज़ पर बैठता हूं निवाला अन्दर नहीं जाता लाल…
काव्य-डॉ. शैलेश गुप्त ‘वीर’
बिटिया रानी ठुमक-ठुमक कर पाँव पटकती, पल-पल में है रंग बदलती. दादी को दिन-रात छकाती, बाबाजी…
काव्य-महेंद्र कुमार जैन
अर्थ अर्थ में ही अर्थ है समर्थ का ही अर्थ अन्यथा जीवन उसका व्यर्थ है. स्वार्थ…
काव्य-रानू नाग
घरौंदा बचपन में रेत के घरौंदे बनाती बच्चों की कोमल, रेत सनी उंगलियों को हर रोज…