काव्य-चंद्रकांति देवांगन

सूर्य विदा हुए

सूर्य विदा हुए बुझे मन से
देकर धरा को चांद का उपहार
समेट कर किरणों का जाल
ओझल हुए क्षितिज के पार.
धरा सुशोभित चांद से
निहार रही उसे बार-बार.
अनंत तारों से सजे वसन को
ओढ़, किया श्रृंगार.
चांद की शीतल छाया में
विरह-व्यथा को छुपा दिया है.
ऑंसू को मोती बनाकर
चारों ओर बिछा दिया है.
सुबह-सुबह जब सूर्य आयेंगे
करते किरणों की बौछार.
चमक उठेंगे ये आंॅसू
सूर्य के स्वागत में धरा के द्वार.

आया बसंत

लो आया बसंत
महक उठी धरा.
नव कोंपल फूटी
चमन हुआ हरा भरा.
किसलय कहीं केसरिया
कहीं धूल-धूसर हरित हूए.
विकसित पुष्प
अनेकानेक रंग.
पवन हुआ मदमस्त
बजाते जल तरंग.
किशोरियों के झुण्ड
खिलखिलाते चले संग.
लो आया बसंत
महक उठी धरा
नव कोंपल फूटी
चमन हुआ हरा भरा.

कु. चंद्रकांति देवांगन
विजय वार्ड
जगदलपुर, छ.ग.
मो.-09201024582