ग़ज़ल-रउफ परवेज़-अंक-1

-1-
अपने ही घर में अपने ही साये से डर लगा
सेहरा में जा के बैठे तो अपना ही घर लगा.
इक बेवफा की याद से जलने लगा बदन
अश्कों को जब्त क्या किया कटने जिगर लगा.
जोन कहां के लोग यहां आ के बस गये
इक अजनबी-सा मुझको मेरा ही शहर लगा.
पत्थर उठा के फेंका था उसने मेरी तरफ़
लेकिन पलट के सीधा उसके ही सर लगा.
मैंने तो कह दिया था मिलूंगा न फिर कभी
मेरे ही ख़्वाबों में वो मेरा मुंतजर लगा.
रिश्ते हमारे तू न समझ पायेगा रकीब,
तू इस तरफ न देख, न अपनी नज़र लगा.
परवेज अब वो महफिलें बाकी न अंजुमन,
भटका हुआ-सा राह में हर हमसफर लगा.
-2-
यह फसादात हैं क्या, इन की हकीकत क्या है
खून बहता है जहां, खून की कीमत क्या है?
सर उठाये हुये फिरते हैं, तअस्सुब के पहाड़
मन के अंदर ये सुलगती हुई नफरत क्या है?
वह भी क्या लोग थे दी, जान वतन की खातिर
अपनी धरती से ही अपनी ये अकीदत क्या है?
अपना गुलशन है, बहार अपनी हवायें अपनी
अपने माली से ही अपनी ये शिकायत क्या है?
दूसरों के लिए जीना नहीं सीखा जिसने
उसको अपने लिये जीने की जरूरत क्या है?
अश्क पी-पी के जो हर हाल में जिन्दा हैं यहां
उससे बढ़कर किसी बंदे की इबादत क्या है?
आईना हम को दिखा देता है चेहरा अपना
क्या जहन्नुम है खुदा जाने कि जन्नत क्या है?
गर्दिशों ने मुझे सिखया दिया जीना ‘परवेज़’
इससे बढ़कर किसी इनआम की चाहत क्या है?
-2-
दर्द का साज है और आलमे-तन्हाई है
सोचते-सोचते क्यों आंख ये भर आई है
कितनी रूसवाइयां दामन में लिए फिरता हूं
राह वीरां है मेरी जान पे बन आई है
जामें-तस्कीन लिए कोई तो हमराज मिले
दिल छलकते हुए सागर का तमन्नाई है
अब कहां नामे-वफ़ा है कि वफ़ा खत्म हुई
कौन जाने कि किसे किसने शनासाई है
चांदनी भी है परेशान मेरी हालत पर
मुजतरिब रात दबे पांव चली आई है
जाने क्यों रूठ गई मुझसे बहारे-गुलशन
हाले-दिल पूछने कमबख्त ख़िजा आई है
ज़िन्दगी एक बहाना सही जीने के लिए
ऐसे जीने की मगर कैसी सज़ा पाई है
कोई तो राज है ज़िन्दा हूं मैं वरना ‘परवेज़’
मेरे दरवाजे पे सौ बार क़ज़ा आई है.
-4-
कौन कहता है कि तुम ख़ून की होली खेलो
ख़ून को ख़ून ही रहने दो ज़हर मत घोलो
बेड़ियां कट गईं जं़ज़ीर की कड़ियां टूटीं
आसमां पास है, उड़ने के लिए पर तोलो
दाग़ दामन में लगाये हुए फिरते क्यों हो
धो लिया करती है दुनियां, चलो तुम भी धो लो
कौन ईमान की रोज़ी पे यहां ज़िंदा है
तुम पे लाज़िम नहीं ईमान किसी का तोलो
आदमी कर्ज़ लिया करता है जीने के लिए
कर्ज़ में डूब के मर जाए तो तुम चुप हो लो
वक्त आने पे चला जाता है जाने वाला
दिल उमड़ आए तो रोको नहीं, जी भर रो लो
अपने दामन में ये अपनों के खूं के छींटे
कैसा लगता है भला खून बहाना बोलो?
नेक व बद कौन परवेज़ खुदा ही समझे
तुम तो परवेज़ गुनाहगार हो कुछ मत बोलो.