(1) मोबाइल यूं चढ़ा ज्यों मसान का भूत, पेंशन लेते बाप हों या नकारा पूत। नकारा…
Category: पद्य
ग़ज़ल-विक्रम सोनी
1. समंदर में तूफां ये मौजें ये धारें। कहां चल दिये बेखुदी के ये मारे। उसूलों…
काव्य-मोहिनी ठाकुर
(1) दिन को बना लिया बिछौना, रात ओढ़ ली अब चांद निकलने की, हमने आस छोड़…
काव्य-कृष्णचन्द्र महादेविया
धर्म सोपुर के पुल पर कुछ कहा था पीछे से उसने शायद कश्मीरी में मुड़ा था…
काव्य-पुरषोत्तम चंद्राकर
हाइकू जल तरंग इंद्रधनुष रंग मन पतंग। मखमल में टाट पर पैबंद बेजान रिश्ते। गुरू की…
काव्य-नवल जायसवाल
जाने के कारण मित्र! यदि आप मित्र हैं तो कहना चाहूंगा मैं तेरी ओलती में खड़ा…