लघुकथा-अलका पांडे

निःशब्द
मैं गली के नुक्कड़ से अनाथ मिला बेबस। सुबह नाश्ते में लोगों की गालियाँ-लात अनायास ही मिलते। नीम चौराहे पर मेरा डेरा। या यूं कहें कि घर! सड़क पर चमचमाती गाड़ियाँ जब रूकतीं मैं अपना फटा गमछा लेकर दौड़ पड़ता उन्हें चमकाने, मेरे जैसे और आवारा अनाथ, लड़कांे के साथ; दो पैसे मिलेंगे।
दोपहर होते ही पेट कुम्हलाने लगते। 10-11 बरस की उम्र भूख से आकुल दौड़ पड़ते शहर के आलीशान होटलों की ओर, सरपट। गंदी नालियों के बीच पाइप से जूठन जहाँ से बहकर आता था। कभी भात का ढेर कभी रोटी के टुकडों पर टूट पड़ते मैं और मेरे साथी, और साथ में आवारा कुत्तों का झुंड पहले पाने की। कर रही थी कोशिश पेट की आग को बुझाने की। शाम को फिर वही पगली सड़क पर बड़बड़ाते हुए पुल के नीचे जाकर सोई रहती। कुछ लड़के गंदी निगाहों से देखते हुए रोटी देकर उसे बुलाते। छी! मैं इन सबसे घबरा जाता रोटी की कीमत भूख की तड़प!!
शाम बीतने को है। धीरे- धीरे निशा पांव पसारने लगी है दूर उठता धुआं। मन बोझिल हो उठा। धुअें के संग मन को उलझाते हुए आकाश में दूर विलीन होते हुए, कुछ अनकहे निःशब्द सवाल। मैं चलता जा रहा था रात गहरा रही थी। दूर कुत्तों के भौंकने की डरावनी आवाज निशा की शांति को भंग करने को आतुर। अनायास ही मेरे पैर मुड़े पुल की ओर। नहीं मुझे उस पगली को बचाना होगा जो रोते हुए भागी जा रही थी रोटी के टुकड़े के पीछे। उन लडकों के संग। मेरे कदम तेज हो गये। मैं दौड़ पड़ा उस दिशा की ओर जहां कोई और मुझ जैसा अनाथ जनम न ले सके। मुझे बचाना है इस धरा को ‘‘निःशब्द’’!
पहल
सूरज सर पे चढ़ गया है। आज मैडम के घर बर्तन झाडू करते हुए बहुत देर हो चुकी थी। घर पहुंचकर दरवाजा खोलते ही देखा पति पीकर धुत्त पड़ा है। दो साल की बच्ची को गोद से उतारकर…. चूल्हे में खाना चढ़ाने लगी; इतने में बूढ़ी सास खांसते हुए आवाज दी- रम्मो पानी पिला दे। इस सरगू को तो आवाज देकर थक गई हूँ ! पड़ा है जमीन पर।
अपनी सास को पानी देकर… मैं चावल के खौलते पानी को एकटक निहार रही थी। मन अतीत में खो गया। वो स्कूल वो सहेलियां – कक्षा नवीं में पढ़ती थी जब भागकर इस सरगू से शादी कर ली थी। मेरे पिता गांव के सरपंच थे। बहुत बदनामी हुई। सरपंच की लड़की खदान में काम करने वाले मजदूर के साथ भाग गई। कुछ दिन ठीक चला पर.. धीरे-धीरे आर्थिक बोझ बढ़ने से सरगू शराब पीने लगा था। लाख मनाया पर….।
अरे रमोतीन तुम्हारे गांव से एक आदमी आया है। दौड़कर दरवाजे पर गई – चमरू, पिता का नौकर खड़ा था- दादा अंतिम सांस ले रहे हैं- ये खत देने को कहा है।
मैं खत खोलकर पढ़ने लगी- बेटी मेरी जिंदगी खत्म हो रही है! पर मेरी और कोई औलाद नहीं है- इसलिए अंतिम समय में न चाहकर भी तुझसे कुछ कहना है, सरपंच हूँ न, मैं ही पहल कर रहा हूं, मेरा नसीब! बेटी तू आज अपने जीवन में पढ़ाई के महत्व को समझती तो कितना अच्छा होता…. पर मैं कुछ बैंक बैलेंस व खत छोड़ कर जा रहा हूं उन पैसों से तू खूब पढ़ना और अपनी बच्ची को पढ़ाना। खेत में सरगू को सब्जी लगाने कहना। आह ! क्या करूं, मैं तो तुझे विदा भी नहीं कर पाया, पर तू मुझे इस दुनिया से अंतिम विदाई दे दे – मेरी चिता को मुखाग्नि देकर। घर (गांव) आ जाना, तुरंत…।
मैं सोच नहीं पा रही थी, पिता पुत्री को विदा करता है या पुत्री पिता को। खैर! इस कठोर जिंदगी में इतना समझ गयी कि शिक्षा का क्या महत्व है। मैं मायके जाने को तैयार होने लगी, पिता के अंतिम दर्शन व विदाई हेतु।


श्रीमती अलका पाण्डे
शिक्षिका, भानपुरी
जिला-बस्तर
मो.-9009481026