अंक-1-बहस-शास्त्र बनाम लोक

शास्त्र बनाम लोक

शास्त्र और लोक की बातें हम सुनते आए हैं. शास्त्रीय गायन, शास्त्रीय संगीत, शास्त्रीय लेखन, शास्त्रीय नृत्य, वहीं लोकगीत, लोकसंगीत, लोककथा, लोकनृत्य इत्यादि. शास्त्र बनाम लोक में स्पष्ट अंतर लक्षित किया जा सकता है, जैसे शास्त्रीयता जहॉं जटिल, निश्चित निमयों से संचालित और आधुनिकतम तकनीकी प्रयोग तथा विषयों द्वारा लक्षित किए जा सकते हैं वहीं लोककला में परम्परा का निर्वाह, पारंपरिक ‘टूल्स’ का प्रयोग, पारंपरिक विषयों के प्रति आग्रह साफ लक्षित होते हैं. एक तरह से प्रथम दृष्टया जो तस्वीर बनती है वो है लोक परम्परागत देहातों से जुड़ी तथा शास्त्र ‘अरबन’ या शहरी क्षेत्र से जुड़ी. भाषा, बोली, इसमें इस्तेमाल किए जाने वाले साधन और अभिव्यक्त करने की शैली भी बहुत कुछ ‘क्रूड’ बनाम ’सॉफिटीकेटेड’ अथवा ‘रॉ’ बनाम ‘परफेक्ट’ जैसा ही प्रतीत होता है, और यह बहुत हद तक सही भी है. जो फर्क गुड़ या खाण्डसारी और शक्कर में है, जो फर्क तकली या चरखे से काटे धागे में और कॉरपोरेट मिक्स के बुने कपड़ों के बीच है-वैसा ही फर्क बहुत कुछ शास्त्र बनाम लोक के बीच है.
क्या ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ?
गुड़ भी मीठा होता है और चीनी भी. दुनिया की कोई भी मिल हो कपड़ा बुनने के लिए उसे धागे की आवश्यकता होती है-चाहे वह धागा कितना भी सिंथेटिक हो. और-यहीं हमें इन दोनों के बीच फर्क का पता चल जाता है. प्रथम दृष्टया ही प्रतीत होने लगता है कि वे एक होते हुए भी उनके बीच काफी अंतर है. और इनके बीच की भिन्नताओं को नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता.
शास्त्रीय कला और लोककला के फर्क को समझने के लिए उपर्युक्त उदाहरण यथेष्ट नहीं है- क्योंकि कला के अपने नियम, यम और गति होते हैं और मैनुफक्चरिंग दुनिया के अपने उसूल हैं. हां, उक्त उदाहरण इन दोनों के भेद को समझने में हमारा कुछ सहयोग अवश्य करते हैं.
शास्त्रीयता जितना नियमों से बंधी होती हैं उतना लोक नहीं. शास्त्रीय गायन या संगीत को ही लें, परंपरागत काव्य को ही लें- वे सब एक निश्चित नियम में बंधे हैं. शास्त्रीय नृत्य की अपनी स्पष्ट भाव-भंगिमाएं हैं. रागों के छेड़ने के निश्चित समय होते हैं- उनका अपना एक अनुशासन होता है। एक स्पष्ट राग या आलाप, फिर स्पष्ट अंतरा और मुखड़ा . ‘वहीं लोककलाएं, चाहे वे चित्रकला हो, नाट्य-नृत्य हो, गीत या संगीत हो या लोकसाहित्य-वे सब पंरपराओं का निर्वाह करते हुए अपने समय और स्थान बोध से परिवर्तित-परिमार्जित होते रहते हैं. इनके विषय वही खेत-खलिहान, नदी, कुंऑं या पहाड़ होते हैं मगर अपने समय के सन्दर्भ में. यानी लचीलापन इनकी खासियत है. एक लोकगीत को दस गायक दस अलग-अलग तरीके से गा सकते हैं. अपने-अपने स्थानीयता के तत्वों-धनों से युक्त कर सकते हैं. कहने की आवश्यकता नहीं कि शास्त्रीयता में ऐसी, या कहें, इतनी मात्रा में ‘छूट’ या आजादी तो है ही नहीं.
शायद यही कारण है कि लोक जहॉं हमारे दिलों के करीब है, वहीं शास्त्र हमारे मस्तिष्क के. जहांॅं एक हमारे दिल में सीधे प्रवेश पाता है वहीं दूसरा हमारे दिमाग़ के दरवाजे़ से दिल तक पहॅुंचने को मशक्कत करता है. एक जितना सरल होता है दूसरा-उतना ही जटिल और जटिलतर होता जाता है.
ऐसा क्या है- वे कौन से सनातन तत्व हैं जो हमें एक निश्चित नियम में, एक अनुशासन में बांध देते हैं ? और उस नियम, अनुशासन से ज़रा भी इधर-उधर खिसकते वे खारिज हो जाते हैं.
क्या इसलिए यह ऐसा है क्योंकि यह सृष्टि ही एक निश्चित नियम में बंधी है ? जहां तक दृष्टि जाती है प्रकृति और परा-प्रकृति में एक अनुशासन, यम और नियम स्पष्ट दिखाई देते हैं. पृथ्वी अपनी धुरी से एक अनुपात में ही घूमती व स्थित है- सारे ग्रह-उपग्रह एक अलिखित नियमों का पालन कर रहे हैं. धरती की तरफ हर चीज बिना अपवाद के खींची चली आती है. सूर्य नियम से-अर्थात् पृथ्वी के चक्कर लगाने के कारण एक नियम के तहत प्रकट होता है.
अगर ऐसा है तो अनुशासन या नियम सर्वोपरि है. तब हमारी कलाओं में ये शास्त्रीय सम्मत बातें समाहित हैं तो आश्चर्य नहीं.
मगर यहीं प्रश्न उठता है कि क्या ये अंतिम हैं ? और अगर यह अंतिम सच है तो कलाओं को अब तक दो जोड़ दो चार की तरह फिक्स होना चाहिए था. यानि सब कुछ पूर्व निर्धारित. एक निश्चित नतीजे के साथ. तब क्या ये दुनिया कलाकारों की दुनिया न होकर रोबोटों द्वारा संचालित दुनिया नहीं बन जाती ? हमारा आज तक का जो विकास है वह अपूर्ण-एकांगी, रसहीन नहीं रह जाता ?
पर, यह भी सच का एक अंश भर है. यानि सच है मगर सापेक्षिक! निरपेक्ष रूप से सत्य कुछ भी नहीं-वस्तुतः निरपेक्ष सत्य का अस्तित्व ही नहीं होता. वो सत्य जो अंतिम हो -वही हो और उसके आगे कुछ और नहीं- ऐसा सत्य इस सृष्टि में कहीं नहीं.
इसलिए कोटि लोगों का सत्य या अनुभव बिल्कुल विशिष्ट होता है- इतना विशिष्ट कि वह किसी और का हो ही नहीं सकता. यह इस दुनिया की बड़ी खूबी है.
फिलहाल, हम शास्त्रीय और नियमों की बातें कर रहे थे.
यहीं हमें संसार का दूसरा पक्ष दिखने लगता है कि सृष्टि जिन नियमों-अनुशासनों से संचालित है- वहीं सृष्टि के तत्वों में ही आजादी, नियमों से परे जाने की चेष्टा जैसे भाव भी विद्यमान है. अर्थात् सृष्टि उन तमाम विरोधी तत्वों से बनी है जितनी कि यह बन सकती थी. जितना अनुशासन-उतना उन अनुशासन से विद्रोह. एक तरह से यहॉं औघड़ तत्व भी उसी मात्रा में मौजूद हैं- पहले खाना फिर स्नान!
इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि प्रकृति की बात करें या परा-प्रकृति की, दो विरोधी तत्वों के बिना संसार का कोई अर्थ ही नहीं होता. स्त्री-पुरूष, कोमल-कठोर, प्रकाश-अंधेरा, प्रकट एवं गुप्त इत्यादि शक्तियांॅ एक समान, एकसाथ यहांॅ संचालित हैं. और, इनके बीच तलाश और फिर इन द्वन्दों से परे जाने की स्थिति! ये मूल चीजें सृजन के साथ भी लागू होती हैं.
यहॉं इन तत्वों की विवेचना की आवश्यकता क्यों पड़ी ? क्योंकि कलाएं हमसे निकली हैं और हम जितना इस सृष्टि के भीतर हैं उतना बाहर भी! या संभव है भीतर या बाहर से परे कोई तीसरा कोना है वहां संभव ये सब व्यक्तिगत संभावनाओं पर आधारित हों. कहने का तात्पर्य ये कि कलाएंॅ अनुशासन को जितना स्वीकार करती हैं उतना ही अस्वीकार भी! यह द्वन्द है. बिना द्वन्द के सृजन संभव नहीं. अभिनेता अपनी छवियों से मुक्त होना चाहता है, लेखक-कवि अपनी विधा से हटकर कुछ पृथक करना या प्रयोग करना चाहता है-गायक कुछ अलग शैली में गाना चाहता है. और यही वे द्वन्द हैं जो किसी भी कलाकार को गति प्रदान करते हैं-उसे निरंतर चलायमान, ‘पैशनेट’ बनाए रखते हैं. कुछ की तलाश-निश्चित नियमों को खारिज कर नये प्रतिमान गढ़ने की ललक!
यह न जायज है ना ही नाजायज, बल्कि यह स्वाभाविक प्रक्रिया है.
इस लेख को प्रारंभ करने का उद्देश्य लोक और शास्त्र को परिभाषित, या व्याख्या करना भर था ? नहीं. बल्कि इसके साथ जुड़ी चिंता थी, कि आज के समय-सन्दर्भ में मनुष्य जहांॅ तकनीक और विज्ञान से घिरा है- कहीं अपनी सोच से इतना हावी न हो जाए कि ‘मानव’-भाव’ को खारिज कर दे और सर्वथा अपने लिए एक ‘रोबोट दुनिया’ आबाद कर ले. रोबोट द्वारा संचालित, रोबोटों के लिए रोबोटों द्वारा! यानी तकनीक-क्लास-नियम-अनुशासन कला के क्षेत्र में भी हावी हो जाए जबकि भावों को एक ‘शेप’ देने के लिए अनुशासन-व नियमों की उतनी ही आवश्यकता है जितना शास्त्रों को जो नियमों में बंधे होते हैं, अपने भीतर ‘ज्ञान’ लाने के लिए मानव भावों की आवश्यकता.
एक महान शास्त्रीय गायक संभवतः पानी में आग लगा दे- अपनी ध्वनि शक्ति से, तकनीक से, पर संभव हो एक लोक गायक सीधे हमारे दिल में भीतर प्रवेश कर जाए-हमें प्रकाशित कर दे.
यही फर्क है. दोनों का सुन्दर समागम या कहें मिश्रण ही श्रेष्ठ कला है- जितना भाव उतना अनुशासन, जितना समय उतना ही स्थान भी, जितना चरित्र उतनी गति भी. यानी सब कुछ! शरीर और आत्मा सबकुछ! रूप और प्राण एक साथ!
सच तो ये है कि अनुशासन में ही आजादी और आजादी में अनुशासन के रहस्य छिपे हैं.
क्या यह खतरनाक नहीं है कि कोई लेखक या नेता या अभिनेता या चित्रकार अपना एक ‘स्कूल’ या मेथड’ या ‘घराना’ बना ले ? सभी नये कलाकार ‘टाइप्ड’ हो जाएं ?
ठेठ कलाकार, खांटी गायक अपनी माटी की गंध लेकर आएगा, फ्रेश! क्योंकि सृष्टि के नियम जितना अनुशासन सीखाती है, उतना ही साथ-साथ हमें आजादी के अर्थ भी बताती चलती है. और यह भी बताती है कि कहांॅ जाकर हमें टिकना है. वह समकलन या आदर्श बिंदु कहांॅ है. फिर समय और स्थान के सापेक्ष कलाकार द्वारा उस ‘आदर्श बिंदु’ की खोज प्रारंभ होती है. इसलिए ना इस सृष्टि का अंत होता है ना ही कलाओं का!
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