कहानी-उर्मिला आचार्य

एक था एनकू सोनार

इधर मेरा डायरेक्टर दोस्त बहुत दिनों बाद घर लौटा था. मिलते ही बड़ी गंभीरता से बोला-‘‘चल यार, माटी का कर्ज चुका आते हंै.’’
मैं वैसे कर्ज में आकंठ डूबा हुआ था, बेरोजगार तो पहले से ही था. शायद माटी का कर्ज मुझे बाकी कर्जों से मुक्त कर दें, वह यह सोचकर उम्मीद की एक पीली किरण मेरी पथराई आँखों में झिलमिलाने लगी थी.
दोस्त अपने को फिल्म डायरेक्टर कहता था. गाँव की पृष्ठभूमि पर एक डाक्युमेन्ट्री फिल्म बनाना चाहता था. उसके डायरेक्टर होने का प्रमाण शायद इतना ही था कि वह बरसों से मुंबई में झख मार रहा था.
मंैंने उसके प्रस्ताव पर जैसे ही सिर हिलाकर सहमति की मुहर लगाई, दोस्त ने मुझे एक लोक-कलाकार ढूँढ निकालने का काम सौंपा और मैं बेरोजगार की जगह बरोजगार हो गया.
लोक-कलाकार ढूंढ़ना कोई मुश्किल काम नहीं था, पर मेरे कस्बे में इधर बरसात में कुकुरमत्ते-से लोक-कलाकार फूट आए थे. उनमें से ‘‘श्रेष्ठ’’ का चुनाव करना कठिन था. अचानक ही मेरे दिमाग में आषाढ़ के बादलों में दूज के चाँद-सा ‘‘एनकू दादा’’ का नाम उभर आया जिसे देखकर मेरे घर के लोग परिहास करते थे-‘‘एनकू दादा इलेस, डुरका सगे खेलेसे… ’’(बाघ के साथ खेलने वाला एनकू दादा आया).
एनकू उसका ओरिजनल नाम था या नहीं ? यह बताना कठिन था, पर था तो वह मेरे ही गाँव का, शायद हम-उम्र भी.
जैसे बालीवुड कहते ही फिल्म नगरी मुंबई की याद आ जाती है, वैसे ही ‘‘एनकू सोनार’’ लोक-कहानी कहते-सुनते वह खुद ‘‘एनकू’’ के नाम से जाना जाने लगा था. ‘‘एनकू सोनार’’ की कहानी ही उसके लोक-कलाकार होने का सर्टिफिकेट था.
हमें बचपन से ही वह इस अंदाज में कहानी सुनाता था-
‘‘एक था, एनकू सोनार! गढ़ना जानता था वह माला-मुँदरी, हार.
पर था वह गरीब, गढ़ने को था नहीं-सोना-चाँदी का थार!’’
गरीब था एनकू. सोना चाँदी उसकी किस्मत में कहाँ ?
‘‘गांव-गांव भटकते उसे हुआ रान (जंगल) से प्यार. सपने में गढ़ने लगा वह माला-मुंदरी-हार.’’
कभी सोने-सी सरसों की बालियाँ हवा से दोस्ती कर झूमतीं, आकाश को रिझातीं ‘‘देखता एनकू सोनार तो सोने-सी बालियों से गढ़ता मुंदरी-हार. फिर बरसात में गोबर में फूट आते फूटू (कुकुरमुत्ते) तो उसकामन गढ़ने लगता चाँदी-सा झकाझक सफेद पेंड़ी (पायल) जो सांवली लेकी (लड़की) के गोदने वाले पाँव में चकचक करते.’’
सोनार की कहानी यहीं रूक जाती और बीच में ही एनकू अपनी आप-बीती सुनाने लग जाता था.
‘‘वह भी तो ब्याह करना चाहता था मुखिया की लेकी (लड़की) से, पर सगाई के लिए भेज नहीं पाता था माहलाकारिया (सगाई का दूत) के हाथ सल्फी, बकरा भात, तेजी से।’’
‘‘था तो वह भी लोक-कलाकर.
गरीब ही जैसे, अपना एनकू सोनार.
गढ़ना जानता था जो, माला मुंदरी हार.
पर था नहीं उसके पास भी सोने, चाँदी का थार.’’
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मेरा मुंबईया दोस्त ‘एनकू’ दादा और उसकी लोककथा से प्रभावित हुआ. बचपन का गाँव और एनकू का सपना कैमरे में कैद कर आंचलिक कथा को एक्सपोज करने को वह उतावला हुआ. आखिर उसे भी तो माटी का कर्ज चुकाना था.
अगले ही दिन स्पाॅट देखने हम ऐसे निकल पड़े, जैसे मेरे गाँव के सियान भातिहा बांधकर (भोजन की व्यवस्था) मेला-मंडई देखने चल पड़ते हैं. गांव के मुहाने में ही देखा कि ‘‘सामने आदमी, पीछे बच्चे को थामी औरत.’’
साथ चलता मेरा दोस्त कल्पना में चापड़ा (चींटी) खाते, मांदर की थाप पर घोटुल में मदमाते अधनंगे मांसल रूप को आँखों में समेटे लोकगीत की बखिया उधेड़ने लगा.
‘‘इला तो इला बोऊ पाइला बिलई पिला दादा र करमे थीला.’’
(जो हुआ सो हुआ. भाभी ने जन्मा बिल्ली का बच्चा. खा गई वह गच्चा. पर मेरे भाई का ही भाग क्यों फूटा)
जैसे-तैसे कच्चे, ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों पर धक्का खाते हम गाँव पहुँचे.
‘‘गाँव के आखिरी छोर पर था मुखिया का इकहरा मुंडेर वाला मकान.
पीछे इमली के पेड़ जैसे कौए लगाए हुये थे, मछली की दुकान.’’
मैंने दोस्त से कहा-‘‘यार! लोककथा है कि जिस गाँव में इमली के पेड़ होते हैं, वहाँ की लड़कियाँ बड़ी सुंदर होती है.’’
मेरी बात सुनकर दोस्त हँसा. फिर प्रत्युत्तर में मुखिया के आँगन में खड़े पेड़ की ओर किया इशारा, जिसके तने पर बंधी तुंबी (सूखी लौकी का पात्र) मदमाते रस से भरी थी.
मुखिया के आंगन में सल्फी के पेड़ ने हमारा स्वागत किया. दोस्त गद्गद् हुआ और बोला-‘‘लोकेशन तो अच्छा है.’’
इतने में मकान के भीतर से अपने चूजों को लिए चूजों की अम्मा मुर्गी हमारे पैरों के बीच से ‘‘इकली, दुकली, तिकली ता..’’ करती निकल पड़ी. चूजों के अचानक हमले से दोस्त चिहुंक पड़ा- ‘‘अरे-अरे-रे…..शिट….’’
फिर उसे एक आइडिया सूझा.
‘‘हम यहाँ परिवार नियोजन को विज्ञापित करेंगें- बड़ा परिवार, दुखी परिवार. क्यों…….? फिर हमारी पिक्चर टैक्स-फ्री.’’
मेरे दोस्त की टैक्स फ्री कल्पना ऊँची उड़ान भर भी नहीं पाई थी कि मुर्गियों को झाँपी (बाँस की टोकनी) में ढांपने, टखनों से ऊपर साड़ी बांधे लेकी (लड़की) हात्-हात् हस्स……. करती, भागती निकल आई.
दोस्त के आँखों में कैमरा फिट हो चुका था. जैसे साँप काटने पर कोई फेन उगलता हो, वैसे ही दोस्त बुदबुदा रहा था-
‘‘लेकी की उम्र सत्रह-अठारह बरस. सिर पर खोसा. खोसे में कंघी, गले में मनकों की माला. पर ये क्या…. लेकी ने साड़ी के साथ ब्लाउज भी पहन रखा है. तुम तो कहते थे, शहरी प्रभाव यहाँ तक नहीं पहुँचा फिर….’’
दोस्त की हैरानी पर गुस्सा हावी हो चुका था.
मैं लज्जित था. लेकी के छींटकर ब्लाउज पर ‘‘कम्बख्त! अपनी संस्कृति का भी ख्याल न रखा. ब्लाउज नहीं पहनती तो क्या हो जाता ?’’
जल्दी ही दोस्त ने इस लज्जा से मुझे मुक्त किया- ‘‘ऐसा करते हैं…..चितरकोट फाॅल में मुर्गी पकड़ती लेकी के नहाने का सीन शूट कर लेते हैं, यार! इससे जल प्रपात की सुंदरता भी आयेगी और….’’
मेरी फिल्म दोस्त एक तीर से दो शिकार करना चाहता था. टैक्स फ्री तो होना ही था! फिर जनता-जनार्दन को भी खुश करना था. वैसे मैं कोई करोड़पति प्रोड्यूसर तो था नहीं जो दोस्त को सीनरी फिल्माने स्विट्जरलैंड ले जाता और न ही यूरोप जाकर सामंता फाॅक्स को अनुबंधित कर लेता.
हमने अनचाहा मेहमान बनकर मुखिया के आंगन में अपनी फोल्डिंग चेयर डाल ली. लेकी घबराकर इमली पेड़ के पीछे दुबक गई. हम उसके लिए गुलाबी कंघी और नारंगी शाल भेंट में लाए थे. बड़ी मुश्किल से वह उन्हें लेकर बात करने को राजी हुई. बहुत पूछने पर पता चला की माँ हाट (बाजार) गई है. बाप सल्फी का तुंबा अपने पेट तक उतारकर परान तरफ गया है. बात करने वाला कोई नहीं था. दोस्त की आँख उसे तौल रही थी. परदेशी आँखांे की तपन उसने पहले भी सहा था पर आज….जल्दी ही लेकी खेत से एनकू को बुला लाई.
‘‘जुहार दादा!’’ (नमस्कार)
‘‘आले बसा!’’ (बैठो) एनकू लंबा कद, गठीला बदन, आँखों में ईमानदारी की चमक. एनकू हमारे पैरों के पास बैठ चुका था. मैंने उसे छेड़ते हुए कहा……
‘‘एनकू दादा इलेसे…….झूम झूमा झूम!’’ (एनकू दादा आ गए)
एनकू शरमा गया. दोस्त उसकी भाव-भंगिमा पर मुग्ध हो चला.
‘‘ऐसी ओरिजनलिटी और कहाँ!’’ दोस्त मेरे कानों में बुदबुदा रहा था.
गर्मी में सूखे गले को तर करने के लिए मेरे दोस्त ने मिनरल वाॅटर का वाॅटर खोला. एनकू ने सोचा, हम नशा कर रहे हैं. उसने आस भरी नजर से हमारी ओर देखा. मैं उसे समझा न सका कि वह नशा नहीं, पानी था. पानी तो उसके पास डबरे में भी था और सूखी नदी भी दूर नहीं थी. फिर घर-द्वार-खेत-खलिहान की लम्बी बातचीत के बाद हमने एनकू से एक सौदा किया-
‘‘वह भी ब्याहना चाहता था मुखिया की लेकी से, पर भेज नहीं पाता था सल्फी, बकरा, भात तेजी से.’’
एनकू का सपना, गाॅंव का असली परिदृश्य. सहकारी योजनाएॅं और पर्यावरण हमारी फिल्म का विषय था. लेकी को अभिनय के नाम पर अपनी दिनचर्या ही निभानी थी. इसलिए उसे पता भी नहीं चला कि वह अभिनय कर रही है. वैसे भी लेकी को कोई आस्कर एवार्ड तो चाहिए नहीं था. हाॅं, दोस्त बालीवुड से अपनी टीम बुलाकर शूटिंग शुरू कर चुका था.
अभी शूटिंग पूरी नहीं हो पाई थी कि एक अनहोनी हो गई. गाॅंव में सिन्दरी माता (चेचक) का प्रकोप हुआ हमारी नायिका लेकी उसकी चपेट में आ गई. देखते-ही-देखते गाॅंव में अजीब या सन्नाटा छा गया. माता के प्रकोप से बचने के लिए कई जतन किये गए. देवधामी. पूजा पाठ. परेशान मुखिया ने डुगडुगी बजाकर खबरदार कर दिया कि गाॅंव बांध दिया गया है.
गाॅंव बांधने का अर्थ था न कोई गाॅंव के देवगुडी के इस पार न उस पार आ-जा सकता है. माता (चेचक) के प्रकोप से बचने के लिए वह एक पारम्परिक उपाय था.
हम सब थे गाॅंव के अन्दर. अब क्या हो यह प्रश्न था मन के भीतर. पर मेरे दोस्त और उसकी मुंबइया टीम बडी खुश थी. मुझे लगा कि अब हम चेचक से बचने के लिए नए-नए नियम बताएंगे. अंधविश्वास और गंदगी हटायेंगे. आखिर हमे भी तो माटी का कर्ज चुकाना था! पर मेरे दोस्त का इरादा भिन्न था. गंदगी और बीमारी से लडने के बजाय सिर धुनकते सिरहा-गुनिया फिल्माना ज्यादा फायदेमंद था. मैं तो यह बाद में ही समझा कि रहस्य-रोमांच के लिए ऐसे वास्तविक सीन बिरलों को ही फिल्माने मिलते हैं. इस संबंध में उसने अंग्रेजी हाॅरर फिल्मों का कुछ उदाहरण भी दिए जिसे मैने अपने कस्बे की टाॅकिज में आज तक देखा भी नहीं था. मैं अपने जनरल नाॅलेज के कम ज्ञान पर पहले भी दुखी था.
इधर अबोध ग्रामीणों की जाने लेकर माता ने अपना प्रकोप कुछ कम किया. डाॅक्टरों की जवाबदारी, छुटभैया नेताओं के साथ बढ गई थी. अखबार वालों ने भी इस खबर को खूब उछाला. पता नहीं, डाॅक्टरी इलाज ने कितना काम किया. पर गाॅंव में नीम के पेड की कमी नहीं थी. राम-राम करते हमारी शूटिंग पूरी हुई. अपनी इस फिल्म को लेकर दोस्त बडा एक्साईटेड था- लगता है, अबकी बार मुझे कोई नहीं रोक सकता.
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जाते-जाते दोस्त ने एनकू की जेब गरम कर दी और एक विदेशी कैमरा सौंपकर नए-नए फोटो कलेक्शन के लिए छोड दिया.
दोस्त के जाने के बाद मैने पाया कि मैं तो फिर बेरोजगार हो गया हूॅं. इसके आगे की कहानी कुछ जायकेदार नहीं थी. जीवन का रूटीन था. इसलिए फिल्म में समा नहीं पाया. कुछ महीने के बाद फसल पकने पर अनाज वसूल करने जब मैं गाॅंव पहुॅंचा तो पता चला कि एनकू और लेकी ने मुंदरी बदरा (अंगूठी बदली) लेकी एनकू की हुई. चलो, अच्छा हुआ. दो चाहने वाले एक हुए. मुझे तसल्ली हुई.
अब शायद सब ठीक चलता, पर माता के प्रकोप से नवब्याहता लेकी कमजोर हो गई थी. उपर से रह-रहकर उठता पेट दर्द उसे बेदम कर देता था. ऐसे में एनकू की जेब गरम था. जेब शहर की तरफ जाने को फडफडाती- कहते है, गीदड की मौत आती है तो वह शहर की ओर भागता है.
कुछ ऐसा ही एनकू के साथ हुआ. सिरहा-गुनिया (झाडफूक करने वाले) के धुनकते सिर से नजर बचाकर आंगदेव और पाटदेव (आदिवासियों के प्रकृति देव) को पूजकर वह लेकी को डाॅक्टर को दिखाने शहर चला आया.
जगदलपुर शहर में दंतेश्वरी माॅंई, दशहरा-रथ और दस-दस झरोखे वाले घर दिखाता एनकू ने लेकी को डाॅक्टर को भी दिखाया. डाॅक्टर ने लेकी के पेट का एक्सरे निकालने को कहा. एनकू ने एक्सरे निकलवा दिया.
अब लेकी के लिए पैड़ी खरीदने वह बाजार की ओर चल पडा. सडक के किनारे पसरे गिलट को धिक्कारते हुए वह चैराहे की चमचमाती ज्वेलरी शाॅप की सीढियाॅं चढ गया.
थोडी देर बाद लेकी के थके पाॅंव में फूटू (कुरकुरमुत्ता) से झकाझक पैडी सजाए एनकू एक्सरे रिपोर्ट दिखाने डाॅक्टर तक पहुॅंचा. रिपोर्ट को देख कर दवाइयों को लम्बी-चैडी लिस्ट थमाकर डाॅक्टर ने एनकू की गरम जेब पूरी तरह कतर डाली. गाॅंव तक जाने को भी उसके पास पैसा नहीं था और एनकू की फरियाद सुनने लायक संवेदना डाॅक्टर के पास थी ही नहीं. पैसे के अभाव में एक्सरा ही उपचार है सोचता हुआ एनकू, लेकी के पाॅंव में फूटू – सा सजा पैडी देखता खेत-खलिहान से होकर पाॅंव-पाॅंव हिड कर (पैदल चलकर) गाॅंव लौट चला. रास्ते में सरसों की सोने सी बालियाॅं लहलहा रही थी. एनकू सोनार राह चलते सोने-सी बालियों से गढने लगा था मुंदरी हार. फूटू से झकाझक पैड़ी लेकी के पाॅंव में पहल से ही चकचक कर रहे थे.
धूप और बीमारी से थकी लेकी ने पगडंडी से लगे बरगद की छाॅंव को आस भरी नजर से देखा. दोनों थोडी देर वहीं विश्राम करने बैठ गए. आदतन एनकू को कहानी कहने की सूझी.
‘‘एक था एनकू सोनार
गढना जानता था वह माला, मुंदरी हार.
पर था वह गरीब
गढने को था नहीं सोना-चाॅंदी का थार.
एनकू सोनार इले से झूम, झूमा, झूम.’’
कहानी कहता एनकू को लगा, लेकी का चेहरा भावहीन है-सो गई क्या?
लेकी चिट ना पिट। (कोई हलचल नहीं)
एनकू चुप हो गया और पथराई आंखो से आसमान की ओर देखने लगा.
आज भी एनकू सोनार की कहानी अधूरी रह गई है.


सुश्री उर्मिला आचार्य
एम.ए.एल.एल.बी.बी.एड.
पंच रास्ता चैक
जगदलपुर जिला-बस्तर छ.ग.
मो.-09575665624