लघुकथा-अंकुश्री

पुरोहितजी


वर्षा नहीं होने के कारण राज्य में अकाल पड़ गया था, लोगों में हाहाकार मचा हुआ था। इस समस्या के समाधान हेतु लोग पुरोहित जी के पास गये। उन्होंने परामर्श दिया, ‘‘राजा यदि सोने के हल से खेत जोते तो वर्षा हो सकती है।’’इसके लिये राजा को तैयार करना था।
अनेक परामर्श आये। तय हुआ कि खेत के निकट एक उत्सव का आयोजन किया जाये। उसके उद्घाटन और सभापतित्व के लिये राजा अवश्य आ जायेंगे। यह भी तय हुआ कि उद्घाटन के बाद राजा को एक भोज दे दिया जायेगा। भोज में राजा के साथ दूसरे लोग भी आयेंगे। जनता के प्रतिनिधि और पुरोहित जी जैसे कुछ लोगों को भी भोज में बुलाना था। अनुमान के आधार पर निश्चित हुआ कि खर्च की कमी से आयोजन नहीं हो पायेगा।
सोने का हल भी एक समस्या थी। अकाल से पीड़ित राज्य में सोना नहीं था। धन का भी अभाव था। बहुत मिन्नत करने पर पुरोहित जी ने कहा कि विधान में संशोधन हेतु उन्हें फिर से पतरा देखना होगा और गणना करनी होगी। उन्हें दुबारे दक्षिणा दिया गया। ‘‘अभावे शाली चूर्णम्’’ की उक्ति देते हुए पुरोहित जी ने कामचलाऊ उपाय खोज निकाला, ‘‘अभाव में लकड़ी के हल पर सोना मढ़वा कर भी काम चलाया जा सकता है।’’ उन्होंने आगे बताया-‘‘पर इसके लिये शुद्धिकरण यज्ञ द्वारा हल को शुद्ध करना होगा।’’
हल को मढ़ने के लिये सोने की आवश्यकता थी। राजा द्वारा खेत में हल उतारने से पूर्व पूजा-पाठ करना था और पुरोहित जी को दान-दक्षिणा भी देनी थी। आयोजन में खर्च ही खर्च नज़र आ रहा था। राज्य की हालत यह थी कि अकाल से पीड़ित गरीब जनता दाने-दाने के लिये तरस रही थी। बगल के राज्यों से अनाज आदि खरीद कर खाने में लोगों के रुपये-पैसे पहले ही खत्म हो चुके थे।
लोगों के पास लोटा-थाली जैसे दैनिक आवश्यकता के कुछ सामान बचे हुए थे। अकाल की बात ठहरी और पुरोहित जी का परामर्श। खेत में राजा से हल तो चलवाना ही था। लोग पड़ोसी राज्यों में जाकर अपना-अपना सामान बेच कर आयोजन सबंधी आवश्यक सामान एकत्रित करने लगे। आयोजन की तैयारी तो हो गयी, मगर घर-घर के सामान और रुपये-पैसे निकल गये। आयोजन में राजा आये। उन्होंने खेत में हल भी चलाया।और आयोजन समाप्त हो गया।
राज्य के लोग हर साल दूसरे राज्यों में खेती-मजदूरी करने जाते थे। लेकिन उस साल लोगों को विश्वास था कि राजा द्वारा सोना मढ़े हल से खेत जोता गया है, इसलिये अच्छी बारिश होगी और अवश्य होगी। इसलिये लोग अपने राज्य में ही खेत जोत-कोड़ कर फसल लगाने की तैयारी करने लगे। बरसात का समय आ गया। लोग वर्षा की प्रतीक्षा करने लगे। वर्षा की प्रतीक्षा में दिन पर दिन गुजरने लगे। महीने भी बीत गये। फिर साल भी खत्म हो गया। पर वर्षा नहीं हुई।
एक तो अकाल! उस पर राजा द्वारा सोना मढ़े हल से खेत जोतने का मंहगा आयोजन। राज्य की जनता भूख से तड़प-तड़प कर मरने लगी। हाहाकार मच गया।
राज्य में जो कुछ लोग बच गये। वे पुरोहित जी से मिलने गये। गंभीर मुद्रा बना कर पुरोहित जी ने उन लोगों का शंका समाधान किया, ‘‘………. राजा ने सोने के ठोस हल से खेत नहीं जोता है। लगता है, इसीलिये वर्षा नहीं हुई।’’ उन्होंने आगे कहा-‘‘यदि अब भी सोने के ठोस हल से राजा खेत जोतें तो काम बन सकता है।’’
खेत जोतने के बाद सोना मढ़ा हल पुरोहित जी को ही मिला था। उनके शास्त्र में ऐसा ही विधान था।


अंकुश्री
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मो.-