समीक्षा-पासंग-अनीता सक्सेना

समीक्षा-पासंग

दर्द की चितेरी पद्मश्री मेहरून्निसा परवेज़ जी का अद्भुत उपन्यास है ‘पासंग’
‘‘पासंग यानि की तराजू के दो पल्लों का एक बराबर वजन करने के लिए लगाई गई एक छोटी सी वजन की पोटली जो कि तराजू की डंडी के एक कोने पर बंधी होती है और तराजू के दोनों पल्लों के बीच संतुलन बनाये रखती है।
इस पासंग के बिना तराजू बेकार है, ना ही उससे सही वजन लिया जा सकता है ना ही उस पर एतबार किया जा सकता है, एक नन्हीं सी पासंग उस तराजू के लिए अनमोल होती है।’’
पासंग उपन्यास की दादी यानी बुलाकी बेगम जिनके बेटे, बहू और पति ने उनका साथ छोड़ दिया लेकिन नन्हीं कनी पासंग बनकर उनके जीवन में आई और नन्हें से पासंग के सहारे अपनी जिन्दगी के सुख-दुःख काट लिए।
मेहरून्निसा जी का यह अद्भुत – अद्वितीय उपन्यास है ! आपने इस उपन्यास में बस्तर के आदिवासियों, उनके जीवन, त्योहार, दिनचर्चा, उनके वन-उपवन, खेती, शादी-विवाह, संस्कार हर एक के बारे में गहन जानकारी दी है। आपकी पैनी नज़र चींटियों की चटनी, मुर्गियों की दिलचस्प बातें, गौसू दादा का मुर्गा और उसकी लड़ाई, तीज-त्यौहार, एक मध्यवर्गीय परिवार, स्वाभिमानी दादी, मासूम कनी, समझदार कुलसुम और दर्द में डूबी बानो आपा हर एक पर रही है! दर्द के कारण हंसी का भी इतना सुन्दर खाका खींचा है कि पढ़ते-पढ़ते कई बार पाठक मुस्कराने लगता है और कई बार आंखें नम हो उठती हैं! पूरा उपन्यास आंखों के सामने से गुजरता है, इसे हम पढ़ते कम और देखते ज्यादा हैं!
बुलाकी बेगम की सराय का पूरा नक्शा आंखों के सामने दिखता है, आगे के बंद कमरे फिर अम्मा का कमरा, पीछे दादी का कमरा, आंगन जिसमें मुर्गियों के दड़बे हैं, दीवारों पर मोखे हैं, पीछे सीताफल, इमली और आम के पेड़ का बगीचा, घर के बगल से गुजरती तंग संकरी गली सारा कुछ दिमाग में ऐसे बैठ जाता है कि लगता है कि हम भी कभी वहां गए हैं!
लेखिका के शब्दों में ‘संसार में कुछ भी तो नहीं बदलता, सब कुछ वैसा ही रहता है, वही धरती, वही आकाश, वही पहाड़, पेड़-पौधे, नदी-नाले मोहल्ले, शहर सब वैसे के वैसे ही रहते हैं लेकिन सिर्फ एक घटना से सारा का सारा ज्योग्रफिया बदल जाता है, लोगों के देखने का तरीका बदल जाता है उनकी नजर बदल जाती है, विचित्र गणित है ना ये !! ये घूमती पृथ्वी ही सब कुछ बदल देती है, ना स्वयं रूकती ना किसी को रूकने देती है ! धूल की परतें उड़ती हैं फिर जम जाती हैं, जमी धूल कभी उड़ कर, कभी जम कर, बहुत कुछ याद दिलाने लगती है, बीती बातों की फुसफुसाहटें होती हैं जो हवा में तैर-तैर हमें किसी के हमारे पास होने का अहसास कराती रहती है और पासंग की नन्हीं पोटली की जगह पाठक स्वयं इस कथा में बंध जाता हे, जो कलसुम को देख अपना बचपन याद करता है, वो गलियों में दौड़ना कच्ची अमिया तोड़ कर लाना और नमक के साथ खाना, नमक में उबले बेर और गुड़ में उबले बेर, कलसुम और कनी की गुड़िया-गुड्डे की शादी, उसकी तैयारी, गहनों का वर्णन, शादी और उसके बाद झट से विदा करा ले जाने की अकुलाहट, इन सब में डूब कर पाठक किसी और लोक में पहुंच जाता है।
एक-एक चीज को बारीकी से देखा है आपने! छोटी सी बात का विस्तृत वर्णन अद्भुत है। जैसे गौसू दादा का मुर्गे की कहानी, देवगुड़ी का वर्णन, गदली पूजा, महावीर का चढ़ावा, पंचम लगना और नज़र उतारना, तीन ऊले के चूल्हे का वर्णन, चक्की का गेंहूं पीसना, पीतल के गुंड में रूपये छुपा कर रखना, चावल की अनेक किस्मों के बारे में जानकारी, और बेहद रोचक धान का शगुन साथ ही अरबी महीने की तेरह तारीख और जुम्मा का वर्णन!
बस्तर और बस्तर के आदिवासियों के जीवन के प्रति आप ज्ञान अद्भुत है, बातों-बातों में दादी से ज्ञानवर्धक कई कहानियां सुना दी हैं जैसे भीष्म पितामह की कहानी, नूरजहां जहांगीर की कहानी, टिटहरी की कहानी, राजा प्रवीरचंद की कहानी, शमशुद्दीन की कहानी, अकबर के जन्म की कहानी और चना जोर गरम वाला गीत आदि ! जैनब दादी और दादी की बातों में दो बहनों के प्यार का ख़जाना है, दोनों बहनें जब भी मिलतीं हैं, पुरानी यादों में खो जातीं हैं, यह खज़ाना अनमोल है और उस खज़ाने के जरिये आपने अपने पाठकों को, ढेरों संग्रहणीय जानकारी दे दी है ! मुझे विश्वास है कि, ये ज़माना आपके ज्ञान के इस खजाने को जानेगा ! दादी से आपने जो जानकारी दिलाई है काबिले तारीफ है जैसे कुछ और कुएं के साफ़ पानी का संबंध, मैना को हल्दी की गोली खिलाना, केंचुए की मिट्टी से सांप के काटे का इलाज, चींटी की चटनी और बस्तर, तगारी-रंगदारी और पगारी, शाही हुक्मरानों द्वारा तेज गति से डाक कैसे पहुंचाते थे आदि !
‘‘इतिहास कभी लिखा नहीं जाता, हमेशा लिखाया जाता है! उचित और अपने मतलब की बातें लिखवाई जाती हैं अनुचित बातें दबा दी जाती हैं! जनमानस तो मूक साक्षी होता है घटाने-बढ़ाने का काम तो बड़े लोग करते हैं!’’ आपने एकदम सही कहा! इतिहास के कच्चे दस्तावेजों में बानो आपा के प्यार- त्याग को दबा दिया गया! उचित- अनुचित का फैसला दूसरों ने किया! बानो आपा का किरदार मन-मस्तिष्क को झकझोर देता है, क्या कसूर था उनका ? क्या खुदा की क़यामत के पहले परिवार और समाज ने क़यामत नहीं ढाई थी उन पर ? हज़ार शिकवे, ज़िल्लतें और कष्ट सह कर वह उस बच्चे के लिए जी रही थीं, कुकून के रेशम की तरह अपने चारों तरफ़ जिंदगी लपेट रही थीं क्या गुनाह था उनका यह कहना कि ‘‘किसी का दोष नहीं हैं, मेरी किस्मत में यह उलट-फेर की कथा लिखी थी, कहते हैं ना कि जब इन्सान का बुरा वक्त आता है तो उसके पहले ही काल उसकी मति हर लेता है! जैसे सर्चलाईट की रौशनी के पड़ते ही खरगोश ठिठका-सहमा रह जाता है, वह सोचता है कि रास्ता ख़त्म हो गया। मगर ऐसा नहीं होता, रास्ते तो बहुत होते हैं उसकी अपनी बुद्धि काम नहीं करती ! मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ ! मेरे पास भी रास्ते थे पर मैं खुद ही ठिठक कर रह गई ! मेरी बुद्धि तो मेरे काल ने हर ली थी, अपनो को अपना अधिकार दे कर मैं खुद ही ठगी गई !’’ दिल को छूता है ! छठी की पूजा का महत्व और छठी की पूजा का मार्मिक वर्णन है जिस को पढ़ कर दिल रो उठता है !
पासंग में जिन्दगी की गहराई है, कुछ वाक्य जो जिंदगी का सार हैं :-
‘‘इन्सान और ज़मीन दोनों की खोज़-खबर ना ली जाये तो दोनों पड़िया हो जाते हैं, बंजर हो जाते हैं !’’
‘‘गलत बातों का, गलत लोगों का साथ कभी नहीं देना चाहिए, ऐसे लोग कच्ची रोकड़ होते हैं, जरा झटका लगा और कच्ची सिलाई उधड़ गई !’’
‘‘धर्म आस्था के लिए होता है, व्यवस्था के लिए नहीं।’’
‘‘जरा सी खरपतवार सारी ज़मीन, फसल को खा जाती है।’’
‘‘नदी में उतार-चढाव कम होते हैं, भंवर भी कम होती हैं, मगर जिंदगी में तो ढेरों उतार -चढाव हैं और भंवर ही भंवर हैं।’’
‘‘नेकी और वदी तो अल्लाहमियां की तराजू के दो पलड़े हैं।’’
‘‘दर्द का रिश्ता नजदीक का होता है, अपने-आप एक दूसरे से तार जुड़ जाते हैं।’’
‘‘हंसी-ख़ुशी को बटोरने के लिए तो लोगों का झुंड होता है लेकिन दुःख तो अकेले काटना पड़ता है! अपने दुःख, घाव – टीसों की वेदना कष्ट तो स्वयं को सहना पड़ता है! समय एक ऐसा वैद्य है, रफूगर है जो जिंदगी के बड़े घाव और उधड़ी सीवन को सिल देता है ! पैबंद लगा कर रफ़ू कर देता है ! बड़े वृक्ष अब आंधियों में गिरते हैं तो अकेले नहीं गिरते उनके साथ ढेर सारे छोटे-बड़े पौधे और ढेर सारी ज़मीन भी निकल कर बाहर आ जाती है।’’
‘‘पानी देखो, जब नदी के किनारों की आड़ में बंधा रहता है तो सीधा चलता है ! ये किनारे ही तो हमारी खानदानी आबरू होते हैं, हमारी मर्यादा होते हैं पर जिस दिन ये टूटे या तूफ़ान आ कर किनारे तोड़ दे तो देखो पानी कैसा तबाही में बदल जाता है।’’
‘‘ज़मीन-जायदाद का हिसाब तो पटवारी के खाते में मिल सकता था पर कितनों के दिलों की बस्तियां बर्बाद हुईं, कितनों के अरमानों के महल ढह गए उसका हिसाब किसी पटवारी के खाते में नहीं था।’’
‘‘इन्सान को जब अपनी जान की पड़ी होती है वह सब को भूल जाता है, अल्लाह, भगवान, मन्दिर-मस्जिद सब भूल जाता है ! मन में जब सुकून होता है तभी मन में धार्मिक आस्था ज्यादा बढ़ती है।’’
‘‘तीनों के बीच मौन था पर वाणी से वाचाल था।’’
‘‘सुख के रंग बेशक अलग-अलग होते हैं पर दुःख के रंग-भाव सबके हमेशा एक जैसे होते हैं।’’
‘‘दुःख तो सबको मिलता हैं पर समझदार और अच्छे लोगों को उसका एहसास अधिक होता है।’’
‘‘खुदा हर सुन्दर चीज को इतनी तकलीफ क्यूं देता है ? या तो सुन्दरता ना देता या तकलीफ ना देता, गुलाब को देखो, फूलों का राजा है, उसे देखते ही हर इंसान का दिल उसे तोड़ने के लिए मचल जाता है, फिर भले ही उसकी पंखुड़ियां पैरों के नीचे कुचल दी जाएं उससे उसका कोई वास्ता नहीं !’’
‘‘दादी कहती हैं कि घर के पशु-पक्षियों को घर के हर सुख-दुःख की आहट होती है ! हवा से भी वह सब सूंघ लेते हैं ! हवा में प्रसन्नता होती हैं तो वह खुश हो कर चहचहाते हैं ! गोरैया चिड़िया घर की आबादी वाले घरों में ही बसेरा डालती है, सूने घरों में उल्लू और चमगादड़े रहती हैं।’’
‘‘दादी ठीक कहती हैं – अफीम के खेत के किनारे भी अगर इन्सान बैठा रहे तब भी उसे अफीम का नशा चढ़ जाता है ! हवा में तैरता है अफीम का नशा।’’
‘‘हर घाव सूख कर कितना छोटा हो जाता है।’’
‘‘जिस खेत की माटी उसी खेत में जमती है, गेंहू के खेत में धान नहीं होता और न ही धान के खेत में गेंहू।’’
‘‘दूसरों की जिन्दगी में धतूरे के बीज बोने वाले लोग देखे हैं।’’
‘‘जिस बरस बांस में फूल आता हैं और बेर खूब फलती है उस बरस ‘‘भूमकाल’’ आता है।’’
छोटी-छोटी लोकोक्तियों का भी बड़ा सुन्दर समावेश है पासंग में :-
‘‘घर के देव ललाएं, बाहर पत्थर पूजन जाएं’’
‘‘के हंसा मोती चुगे, के लंघन ही मर जाए’’
‘‘बोले मोर फूले कांसा, अब वर्षा की नहीं है आशा’’
‘‘कांटा बुरा करील का, औ बदरी की घाम, सौत बुरी है चून की, और साझे का काम’’
‘‘तिरया तेल, हमीर हठ, चढ़े ना दूजी बार’’
‘‘तीन बार बुलाने को बुलौआ, चलौआ और टिरौआ कहते हैं’’
‘‘दूर गड़ासा दूरे पानी, नियर गड़ासा नियरे पानी’’
मेहरून्निसा जी ने अपने उपन्यास में महिलाओं की स्थिति का सदैव ही बड़ा सजीव और मार्मिक चित्रण किया है, एक बालिका के शैशव काल से उसके बुजुर्ग हो जाने तक के उसके संघर्ष, उसकी उत्पीड़न, उसकी बेचारगी, विवशता, लाचारी सभी को दिल को छू जाने वाले शब्दों में व्यक्त किया है! मां की महत्ता को भी बताया है कि पहले बच्चे को मां के नाम से ही जाना जाता था, गान्धारी पुत्र, कुंती पुत्र, सौमित्र, कैकई पुत्र आदि ! मां के दूध का क़र्ज़ उतारना, जब तक मां का नाम ना लो, फातिहा पूरी नहीं होती, मां के पैर के नीचे जन्नत है आदि बातें बताते हुए कनी की दादी का वर्णन जो कि धैर्य की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं, उनके पास ज्ञान का भंडार है, कनी नाम के तिनके के सहारे उन्होंने अपनी जिन्दगी काटी ! ढहती हवेली को बचने के लिए वह स्वयं एक स्तंभ बन कर खड़ीं रहीं और स्वयं के जर्जर शरीर के होते हुए भी कनी के सामने किले की मजबूत दीवार की तरह तनी रहीं, और यह दीवार ढही भी तो कब ? जब कनी की जिद के आगे उसकी अम्मी उस हवेली में आई, जिस हवेली को वह वर्षों पहले छोड़ गईं थीं और जिसके दरवाजे उनके लिए हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो गये थे उस हवेली में उन्होंने कनी के लिए कदम रखा लेकिन मालकिन से सामना ना कर सकीं, एक खुद्दार, स्वाभिमानी दादी अम्मा जिस शान से बुलाकी बेगम कर उस हवेली में आईं थीं उस ही शान से उन्होंने उस हवेली से विदा ली ! ज़माने की एक उंगली भी उन्होंने अपने जीते जी उस हवेली की शान में और अपने ऊपर नहीं उठने दी !
दादी के लिए कनी खुदा की एक नियामत थी, उस के सहारे उन्होंने अपनी वीरान जिन्दगी काटी थी, उसे वह वर्षा की पहली बड़ी बूंदें ‘‘दादौरा’’ कहती थीं। और कनी को भी लगता था कि सुख और दुःख का एहसास दादी के दुपट्टे के दो छोर की तरह थे जो एक साथ दाएं – बाएं लटकते थे ! और अंत में दादी कनी से कहती हैं ‘‘तू ही तो मेरी जिन्दगी की पासंग है, जिन्दगी की तराजू के दोनों पल्ले सुख और दुःख तुझसे ही तो जुड़े थे! दुनियादारी निभाना इतना आसान नहीं होता ! अपनी छवि ऐसी बनानी होती है कि लोग डरें वर्ना सीधे इन्सान के सर पर तो कौआ चील-तक बैठ कर बीट करें ! जीवन भी एक युद्ध है, यहां राजा का जिन्दा रहना बहुत जरूरी होता है, वरना दूसरा राजा कब्ज़ा कर लेता है ! सेना खुद नहीं लड़ती, राजा के बल पर लड़ती है ! यह जिन्दगी के ताने-बाने हैं इनके सहारे, इनकी आड़ में हम बेहिचक सुरक्षित बने रहते हैं! कनी, मेरी बच्ची, मेरे सूखे मरूस्थल जीवन में बरसी तू पहली दादौरा की वर्षा थी!‘‘
पासंग अतुलनीय है, जिसने इसको नहीं पढ़ा, उसने जिंदगी को नहीं पढ़ा !

अनीता सक्सेना
बी-143
न्यू मीनाल रेसीडेंसी
भोपाल – 23
संपर्क : 9424402456