पदमश्री धर्मपाल सैनी की कविताओं का समीक्षा-आलेख

समीक्षा-आलेख


जगतप्रिय ‘ताऊजी’ ऐसे ही ताऊजी नहीं कहलाते हैं वे अपने इस नाम के अनुरूप ही लोगों की सहायता करते हैं, जुड़कर रहते हैं, जो भी उनकी छत्रछाया में आता है आप ही आप सुरक्षित महसूस करता है। यह अच्छाई उनके व्यवहार, विचार के साथ-साथ साहित्य में भी दिखाई देती है। अपनी कविताओं में बच्चों और युवाओं का आह्वान देशहित में कर्मशील होने के लिए लगातार करते रहते हैं। देशहित में समर्पित अपने सर्वस्व जीवन की तरह ही वे अपने विचारों में भी देश और परमार्थ के लिए जीते हैं।
‘ऐ मेरे अरमानों/सपनों में मचलो/आशा के आसमान में/साहस की भरो उड़ान ’-इन चार पंक्तियों में ‘ताऊजी के जीवन का यथार्थ दृश्यमान है। वे युवाआंे का आह्वान कर रहे हैं, वे जान रहे हैं कि युवा ही इस देश का भविष्य हैं। साहस और हौसले के साथ धरती, पर्यावरण और समाज का कल्याण करने उन्हें प्रेरित कर रहे हैं। अंतिम पंक्ति में यह रहस्य उजागर होता है कि अपने सपने किसे मानते हैं। ‘तुम ईश्वर की प्रतिभा हो /मनुष्य के अवतार में।’
‘हम देह ही नहीं, यह कहते /योगा करता, तन के द्वारा/आत्म समत्व उजागर है।’ आध्यात्म दर्शन से परिपूर्ण पंक्तियां यही बताती हैं कि हम अपने तन के माध्यम से योग करते हैं और आत्मा शुद्ध होती है। आत्मा और शरीर को समझाती कविता है ‘को अहम्’।
‘मेरे उलटे-सुलटे बोल’ कविता पर टीका लिखी जाये तो ग्रंथ तैयार हो सकते हैं। ‘ताऊजी’ की श्रेष्ठ कविताओं की माला का यह पैंडल है। ‘मैंने सपनों में सपना खो दिया’ से शुरू हुई कविता उनके जीवन को पुनः चित्रित करती है कि जब स्वयं को ‘खो’ देता है व्यक्ति तब कहीं जाकर वह ‘कुछ’ पाता है। और उस वक्त व्यक्ति जो आनंद पाता है तब कहता है-‘हुआ निहाल, ऐसे तन मन से/ तन की भाषा और मन की चाल/ एक हो जाये तब यह आनंद’।
‘पृच्छा’ कविता का अंतिम हिस्सा ‘मैंने इन शब्दों को जगाया नहीं/ये उतरे हैं/मुझे जगाने’ अद्भुत सोच का दार्शनिक उत्तर है। हम जिन तथ्यों को सांसारिक भ्रमण का कारण मान कर चलते हैं वही हमें आध्यात्मिक जीवन पर चलने को प्रेरित करते हैं मात्र। उनसे कैसे प्रेरित हैं हम यह महत्वपूर्ण है।
‘अहिंसा/सत्य के प्रति/प्रेम का/चरमोत्कर्ष है।’ यही तो अहिंसा की सर्वश्रेष्ठ परिभाषा है। यदि यदि व्यक्ति सत्य के प्रति समर्पित है तो वह हिंसक हो ही नहीं सकता है। (गांधी दर्शन)
शाश्वत मूल्यों की ऊर्जा/अनुभवों का आत्मिक बल है/उसको साधे, सब सध जायेगा।’ गहरे दर्शन से जुड़ी ये काव्यात्मक पंक्तियां ‘अनुभवों का प्रश्न’ कविता की है जो ऊर्जा शाश्वत मूल्य यानि शाश्वत नैतिकता, सत्य, अहिंसा, प्रेम आदि की ऊर्जा से ही अनुभव यानि व्यवहार में जीवन चलता है। इन ऊर्जा स्रोतों का चिन्तन, मनन और जीवन में अवतरण जीवन को सुखमय बना देगा।
‘मेरी श्रद्धा/कभी नाव/कभी मल्लाह/कभी पतवार/तीनों अलग-अलग नहीं/उद्देश्य सगी/स्वतंत्र रही।’ उत्कृष्ठ उद्देश्यों और विचारों की कविता की बानगी है यह पंक्तियां, तीन अलग-अलग चीजें हैं जिनका स्वतंत्र अस्तित्व है पर उनकी आपसी श्रद्धा, विश्वास एक हो जाये तो नदी पार हो जाती है।
‘मेहमान’ कौन है और उसकी वास्तविक पहचान क्या है ? दर्शन का चरम छूती यह कविता बता रही है। साथ ही ‘ताऊजी’ का जीवन सत्व भी उजागर कर रही है। ‘चौरासी लाख योनियों के/कोलाहल में घिरकर/अपने में रम गया हूं।’ यानि साधुत्व की प्राप्ति, स्वयं की पहचान, जान लेने का विचारणीय विश्लेषण!
‘मुझे गुलाब ने/फूल नहीं कांटे दिये,’ जीवन को देखने के दो तरीकों का वर्णन एक फूल के माध्यम से बहुत ही सुन्दर ढंग से किया गया है। गुलाब में कांटे देखने वालों को कांटे नजर आते हैं तो उन्हें सुन्दर सुगंधित फूल नजर नहीं आता। नकारात्मक सोच का उदाहरण है।
‘जीवन में / बोध देती हर चुनौती,’ ये पंक्तियां वीर भोगता भक्ति, कविता की हैं। जीवन के संग्राम में जो वीर होगा उसे ही सम्मान मिलेगा या यू ंसमझे अच्छा जीवन प्राप्त होगा। जीवन में आने वाली प्रत्येक चुनौती जीवट व्यक्ति को एक शिक्षा देने आती है। यदि यह बात समझ आ जाये तो जीवन सफल हो सकता है। जो ये समझ जाता है वही वीर कहलाता है।
मजा यह कि ईमान /खुद खोज रहा ईमान / पैसा हर कहीं उसे घेर रहा, कितना सच है इन पंक्तियों में हम सभी ये अनुभव कर चुके हैं। पैसा सबसे ज्यादा जरूरी है उसके साथ ही अतृप्त अंगार भी है। पैसे का होना कभी आदमी को खुश नहीं कर सकता है, फिर भी वह पैसों के पीछे भागता रहता है। वह ही दुविधाकारी होता है ये पैसा।
ताऊजी की कविताएं जीवन दर्शन के करीब हैं। यथार्थ का खूबसूरत वर्णन उनकी कविताओं की शोभा है तो वहीं शब्दों का चयन कविताओं की जान है।