सनत सागर की कहानी -मेरा अक्कू वैसा नहीं है….

मेरा अक्कू वैसा नहीं है….

कलेन्डर की तारीख में एक गोला और बना दिया। इस गोले के साथ आज तीसरा दिन था, समझ आ गया। उगते सूरज की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उसे अपना चेहरा सामने रखी लोहे की आलमारी में लगे आइने में साफ नजर आने लगा था। वह चौक उठी उसे लगा कि उसके माथे पर झुर्रियां सी आ गयी हैं। उसका हाथ ये सब सोचने के पूर्व ही माथे पर जा चिपका। वहां कुछ ऐसा नहीं था परन्तु प्रतीत हो रहा था।
’ये बाल भी न, तीन दिनों ऐसे रूखे से हो गये हैं मानों जन्म जन्मान्तरों से तेल के दर्शन ही न किये हों। मकड़ी के जाले भी इसके सामने शरमा जायें। पर कुछ भी हो इस चेहरे में कुछ तो है!’
अपने चेहरे में आयी मुस्कुराहट आइने पर देख वह हंस पड़ी।
आइना उसके बालों से लेकर पैरों की ओर जाता हुआ खुद को खुशनसीब मान रहा था। वह भी तसल्ली से ठण्डी सांस ले मुंह उतार कर रह गया।
’डींग डांग!’ दरवाजे की घंटी ने बता दिया कि अखबार उसके दरवाजे के पल्लों के नीचे से भीतर आकर उसका इंतजार कर रहा है।
’ये अखबार वाले भी न अलसुबह आ जाते हैं, जाने सोते भी हैं या नहीं!’ वह अखबार को उठाती हुयी बड़बड़ायी। ’ये मन भी न, कनफ्यूजन में पड़ जाता है कि पहले चाय पीये या फिर अखबार पढ़े।’
उसकी बड़बड़ाहट लगातार चल रही थी। इसे छत पर लगा पंखा ही भलीभांति समझ रहा था क्योंकि वह भी लगातार किरींच-किरींच की आवाज के साथ कई दिनों से चल रहा था। उसे अब ये मानसिक बीमारी नहीं महसूस होती थी कि वह अकेले ही बड़बड़ा रहा है। अभी पिछले तीन दिनों से तो वह भारी खुश था क्योंकि पिछले तीन दिनों से उसका साथ ये लड़की लगातार दिनरात दे रही थी। ब्रेड और बटर के खत्म होने के बाद सिर्फ एक बार ही दोबारा खरीदने कमरे से बाहर निकली थी। वरना इस घर के पल्ले आपस में मिलकर रोते ही रहते हैं।
कमरे की छत पर लगे पंखे से कोई बात छिपी भी न थी। वह लगातार देख रहा था कि वह लड़की जो दिन और रात पढ़ायी करती थी पिछले कुछ दिनों से पुस्तक खोलकर जरूर बैठती है और पुस्तक के पन्नों को देखती भी है परन्तु पढ़ती ढेला भर नहीं है।
उसने उसकी दो सहेलियों को भी देखा था। सारी की सारी एकदम सुंदर, हीरोइन तो नहीं लगती थीं परन्तु कट जानलेवा था। कई बार उसे खुद के पंखा होने पर खीज सी महसूस होती थी। कहां साला छत से सारी जिन्दगी लटके रहो……और फिर सबकुछ देखते रहो छत से बंधे बंधे!
तीनों सहेलियां हमेशा बात करती थीं कि वो किस शहर में कलेक्टर बनेंगी। और अगर कलेक्टर न बन पायीं तो किस शहर में तहसीलदार बनेंगी। उनमें से एक जो जरा सांवली सी थी परन्तु बड़ी बड़ी हिरणी जैसी आंखों वाली, वह कहती थी कि -’ये क्या दिनरात पुस्तकों में घुसी रहती हो कलेक्टर तहसीलदार बनों न बनों परन्तु पुस्तक में दीमक बनकर लटकी जरूर रहना। अरे यार! सोचो, यदि ये परीक्षा पास न की तो भी कलेक्टर तो बन ही सकते हैं हम।’ उसके मुंह के चलने और हाथ के हिलने में काम्पीटीशन होता महसूस होता कि कौन ज्यादा मचल रहा है।
तभी उसके साथ की तोते की तरह नाक वाली शोभा पूछ बैठी -’वो कैसे मेरी सखी ? क्या कोई जादू की छड़ी है तुम्हारे पास ? जिसे दिखा कर छू छा, छू छा कर दोगी तो कलेक्टर बन जाओगी!’
’यार मेरी तोता! तुम कभी तो दिमाग लगाया करो, हमेशा तोते की तरह रट्टा मारती रहती हो। माना कि तोते जैसी नाक है इसका मतलब दिमाग भी वही है, ये मत साबित किया करो। वेरी सिम्पल यार! किसी कलेक्टर को लाइन मारों और उसे फंसा लो। और बन जाओ कलेक्टर से भी ज्यादा पावरफुल!’
’अच्छा! अल्पू, तू कलेक्टर बन जायेगी तो किसी ऐसे ही सामान्य लड़के से फंस जायेगी ?’ तोता यानी शोभा ने अपनी आंखें चौड़ी करके पूछा।
’तू मेरी बात छोड़ दे मैं तो कलेक्टर से भी न फंसूं! मेरी बात ही कुछ और है। और ये हमारी महारानी विक्टोरिया से पूछो जरा, आज कल ख्यालों में खोयी रहती हैं। इनका क्या हाल है, नहीं नहीं कुछ यूं…..हाल-ए-दिल कैसा है जनाब का!’
’महारानी विक्टोरिया या फिर बेगम अनारकली!’ शोभा ने प्रतिप्रश्न किया।
’हण्ड्रेड परसेंट सही कहा यार तूने तो। बेगम अनारकली! क्यों बेगम अनारकली उर्फ लता! क्या विचार है आपका! ये भूत कब तक उतर जायेगा ? या यूं ही प्रवाह के विरूद्ध चलने की कसम उठा रखी है ?’
शोभा और अल्पना के प्रश्न पर लता चुपचाप ही बैठी रही। उसके चेहरे के भाव को पढ़ने की कोशिश में दोनों सहेलियां थीं। पर शोभा इस मामले में शायद एकदम एक्सपर्ट थी। वह झट से उसके भावों को समझ गयी थी। जबकि लता उन दोनों की ओर एक दृष्टि फेंककर अपनी चप्पलों में अपना पैर डाल रही थी और अपने खुले बालों को पीछे से पकड़कर जूड़े की तरह घुमा रही थी।
’देख लता! इतनी आसान नहीं है ये मोहब्बत!’ हाथ में पकड़ा चाय का कप टेबल पर रखती हुयी शोभा कही। ’एक तो तू अपने मां बाप और भाई का विश्वास तोड़ रही है क्योंकि तू एकदम से विवाह को तैयार हो गयी है। मात्र लगभग पच्चीस दिनों में तुमने इतना बड़ा फैसला ले लिया वो भी खुद ही, एकदम अकेले! क्या ये न्याय है अपने मां बाप के प्रति अपने परिवार के प्रति ? और ये तुम्हारे चेहरे में छाये निर्लिप्तता के भाव हैं न, ये तुम्हारी सोच को बता रहे हैं कि तुम हमारी बातों से कोई इत्तेफाक नहीं रखती हो। तुम अपनी मंजिल छोड़ दोगी, कलेक्टर बनने का सपना तो तुम्हारा है न! तुम्हारे परिवार ने तो तुमको वहीं किसी जॉब को करने की सलाह दी थी। तुमने ही अपनी पढ़ाई के हिसाब से आई ए एस की परीक्षा की तैयारी करने की जिद की थी। तुमने तो प्री भी निकाल लिया है। और एकदम से, अचानक तुम्हारा विवाह का फैसला! ये क्या है ? चलो यहां तक भी ठीक है पर तुम्हारा एक जुदा…..एकदम अलग रहन सहन में विवाह करना, क्या उचित है ? क्या तुम शादी के बाद एडजस्ट कर लोगी ? तुम्हारे परिवार की मान मर्यादा का क्या होगा ? सोचा है न इन सारे विषयों पर या फिर सीधे कूद पड़ी हो आग के दरिया में ?’
लता खिड़की से बाहर देखती रही। उसकी पीठ पर बड़े गले का कुर्ता और पीठ पर एक काला तिल ही दिख रहा था….बगैर भाव प्रदर्शित किये। शायद लता अपने भीतर के भावो ंको उन दोनों सहेलियों को बताना ही नहीं चाह रही थी।
वह अचानक पीछे की ओर मुड़ी और कह उठी।
’ऐसे मामले खुद की जिन्दगी से जुड़े हैं इसलिये खुद को ही निर्णय लेना होता है। और तुम जाने किस युग की बात कर रही हो, जानती नहीं कि ये युग जेट युग है। इस प्रकार की दकियानूसी बाते सिर्फ अनपढ़ और गंवार करते हैं। जब मैं आइ ए एस की तैयारी कर रही हूं तो पूरे समाज के हित में फैसला लेना होगा न कि सिर्फ धर्म और जाति देखकर! उस स्थिति में मैं समझौता कर सकती हूं तो फिर आज क्यों अपने लिये ये काम नहीं कर सकती ? क्यों मैं धर्म की अंधेरी सुरंगों में भटकती रहूं। और फिर तुम जानती भी क्या हो अक्कू के बारे में। सिर्फ देखा ही तो है। उसके साथ तो समय मैंने बिताया है। मैं जानती हूं उसकी विचारधारा उसकी सोच। तुम्हे पता भी है कि वह कितना प्रगतिशील है ? वह मेरे लिये अपने धर्म को त्यागने को तैयार है। तुम लोग क्या सोचती हो कि मैंने अक्कू का रूप देखकर ही उसके साथ जीवन जीने का फैसला कर लिया है ? अगर तुम ऐसा ही सोचती हो तो निरी मूरख हो। वह मुझे दुनिया के सारे सुख दे सकता है। ये आइ ए एस की जॉब में क्या है अगर आदमी के जीवन मोहब्बत न हो।
उसके पास कार है। उसके पास बाइक है। उसका बड़ा सा घर है। चार नौकर काम करते हैं घर में। उसका बिजनेस ऐसा है कि उसे कुछ भी नहीं करना होता है। और सुनो तुम जिस पाइंट ऑफ व्यू से उसका विरोध कर रही हो न तो सुनो, मैं उसके घर जा चुकी हूं। दो दो दिन तक वहां रूकी हूं। उसकी भाभियों से मिली हूं। उसकी अम्मा से मिली हूं उसके बापू से मिली हूं। मेरा अक्कू वैसा नहीं है जैसा तुम साबित करने की कोशिश कर रही हो।’
शोभा ने उसके कंधे पर हाथ रखा तो लता एकदम से चुप हो गयी।
‘चल मान लेते हैं तेरा अक्कू वैसा नहीं है। पर क्या तू उनके रहन सहन रीति रिवाजों को झेल सकेगी ?’
’क्या मुझे ही रीति रिवाजों को झेलना है ? अक्कू नहीं झेलेगा ? उसे भी तो हमारे रीति रिवाजो ंको झेलना होगा।’ लता का चेहरा एकदम लाल हो गया। सांस धौंकनी की तरह चल रही थी -ये देखकर अल्पना ने उसका हाथ पकड़कर पलंग पर बैठाया और पानी का गिलास उसके मुंह में लगा दिया। और इशारे से शोभा को चुप रहने को कहा।
तभी पंखें की सोच में विघ्न पड़ गया। वह एकदम से पुराने दिनों से वर्तमान में आ गया। दरवाजे की दरार से भीतर आये अखबार को पढ़ती हुयी लता, अचानक से तेजी से अखबार को फाड़ने लगी। उसके टुकड़े टुकड़े कर डाले। इसके बाद भी मन न भरा तो वह उन टुकड़ो ंको उठाकर गैस के बर्नर पर रखकर जला दी।
’सारे के सारे मेरी जान के दुश्मन हैं। मेरे ही पीछे पड़े हैं। मुझे बिल्कुल बेवकूफ ही समझ रख है। अब ये अखबार भी वैसी ही खबरों से अंटे पड़े हैं। इनको भी बंद करवाना होगा। सब बनावटी खबरें बांटते हैं।’
वह तेज आवाज में हांफ रही थी। उसका चेहरा लाल हो गया था।
पंखा तेजी से घूमने की कोशिश कर रहा था परन्तु वह अपनी किरींच किरींच की आवाज को बढ़ाने के अलावा कुछ न कर सका। वह अपनी आंखें बंद करना चाह रहा था। इसके आगे का दृश्य देखने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। परन्तु विवशता उसके साथ थी इसलिये मजबूर था।
लता बिस्तर में आकर गिर सी गयी थी। उसके होंठ उसके ही दांतों से घायल हो रहे थे। उसके शरीर का सारा खून उसके चेहरे में दौड़ पड़ा था। उसकी ओढ़नी विहीन छाती भयंकर तरीके से ऊपर नीचे हो रही थी।
पलंग हिल रहा था चादर पलंग के बाहर थी। आंखें पूर्णरूप से बंद थीं।
हे भगवान! इस लता को ये अजीब सी बीमारी पिछले कुछ दिनों में ही लगी है। जाने कैसे ठीक होगी। पंखा बड़बड़ा रहा था परन्तु उसकी बातों को कौन समझता।
दस पंद्रह मिनट में तूफान शांत हो गया।
वह निढ़ाल सी पड़ी रही। शायद एक डेढ़ घंटे तक। वह बमुश्किल पलंग पर बैठी।
’ये दर्द कितना कातिल है मन चाहता है कि दर्द हो पर ये तन….अक्कू तुम मेरे हो। तुमको दुनिया की कोई ताकत दूर नहीं कर सकती है। चाहे कोई कितना भी समझा ले परन्तु नामुमकीन है मेरा तुमसे दूर होना। अभी मुझे तुम्हारी जरूरत है। तुम ही मुझे मेरे सपनों की दुनिया में ले जा सकते हो। मुझे तुम्…..हारी अभी जरूरत है।’ वह दर्द से कराह उठी, पर चेहरे पर मुस्कान थी।
पंखा अपनी आंखें फाड़े उसकी ओर देख रहा था। वह समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा विरोधाभास क्यों हो रहा है। वह अपनी मजबूरी पर खीज उठा, उसके हाथ न थे जिससे वह अपनी आंखें मल कर वास्तविकता का पता लगाता।
वह धीरे धीरे चलती हुयी टेबल पर रखे मोबाइल को उठा ली और फिर वापस पलंग पर पहुंच गयी। उसकी आंखों की मदहोशी के गवाह पंखे और तमाम थे जो उस कमरे में थे।
अगले ही पल फोन पर मधुर गीत बज उठा।
तुम मेरी जान हो, छीन लेती मेरा ईमान हो….
गाना पूरा बज ही न पाया उधर से आवाज आयी।
’मैं वृक्ष बन जाऊं और तुम मेरे पास आ जाओ लता बनकर! और एकदम सुबह सुबह कैसे याद आ गयी। सुबह की उनींदी आखों को काश देख पाता जिन्दगी सफल हो जाती…..’
’हुजूर फोन मैंने लगाया है मुझे कुछ कहने देगे या फिर अपनी ही कहते रहोगे!’
’तुम्हारी बातों को सुनने में जो नशा है ठीक वही तो तुम्हारे वजूद को देखने में है। वही सुरीलापन! वही सुगंध…!’
’सुनो! मुझे यूं अपनी बातों से निढ़ाल मत किया करो। मिलने आ जाओं अभी के अभी! मेरी बेचैनी मुझसे सहन ही नहीं हो रही है। मुझे वो सबकुछ चाहिये जिन्हें तुमने इशारों में जिया है। मैं तुम्हारे भीतर समाना चाहती हूं!’ लता की बातों में तड़प देखकर पंखें के पसीने छूट गये।
’सुनों! अपनी आंखें बंद करो। और सोचो मैं तुम्हारे अंग अंग में छा गया हूं। तुम…………….’
पंखा अपनी बेचैन होती आंखों को अपनी किरींच किरींच से भटकाने लगा। पर उसका मन तो वहीं था उनकी बातों में।
’तन का मिलन जरूरी नहीं है मन के भावों में ही सबकुछ है। तुम मेरे हाथों को अपने तन पर महसूस करो। जहां तक तुम्हारी सोच के पंछी दौड़ते हैं…..’
तभी लाइट गोल हो गयी। पंखा अगले ही पल शांत हो गया। लता ने अंधेरा होते ही अपने इष्ट को धन्यवाद ज्ञापित किया।
बाहर का उजाला बाहर से खिड़कियों से झांकने की असफल कोशिश में बाहर ही ठहर गया।
ढेर सारा पसीना उसके बदन से बहकर चादर और बदन पर पड़े कपड़ों (?) पर लिपट गया था।
लता की आंखें झटके से खुल गयीं। खुलती भी न कैसे, सामने एक काकरोच उड़कर उसके पैरों के पास आ गया था। वह उसी झटके से उठ गयी। फिर से उसका सामना खुद से हो गया आइने में।
वह हकबका गयी। शर्म से परे…..!
आलमारी के आइने के ऊपर लगी उसके पापा की फोटो पर नजर पड़ते ही पलंग की चादर खुद पर डाल ली। उस फोटो के टुकड़े गैस के बर्नर पर थे धुंधुवाते हुये।
’मैं अक्कू के बिना नहीं रह सकती भले ही आप न मिलो। मुझे मालूम है कि आप भी मुझे ही समझाओगे। मैं गलत हूं कहोगे। मैं गलत रास्ते में जा रही हूं कहोगे। मुझे अक्कू फंसा रहा है कहोगे। वो मुझे खास मकसद के लिये ही जाल में फांसा है कहोगे। मैं क्या छोटी बच्ची हूं ? मैं क्या समझदार नहीं हूं ? मेरी भी आंखें हैं दिमाग है। मुझे मेरे अक्कू से कोई भी अलग नहीं कर सकता है, आप भी! जो भी मेरे और अक्कू के बीच आयेगा उसकी ऐसी ही गति होगी!’
और उसके सीधे हाथ ने गैस का बर्नर एकदम से तेज कर दिया।
स्वयं की आवाज में यूं गुम थी कि उसे मोबाइल पर बज चुकी पूरी घंटी भी सुनायी नहीं दी। वह अब चिमटे से जले हुये कागज के टुकड़ों को मसल रही थी।
’अक्कू! तुम मुझसे कब शादि करोगे! मैं अब एक पल भी तुम्हारे बिना नहीं रह सकती। मैं अब तुम्हारे लिये पागल हो चुकी हूं। और मैं तुमको बता देना चाहती हूं कि मैं सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे प्रेम के लिये ही तुम्हारी बनना चाहती हूं। मुझे इस बात का जरा भी टेन्शन नहीं है कि तुम और मैं एकदम अलग सोच वाले धर्म के हैं, या फिर खान-पान, रहन-सहन अलग है। मैं तुम्हारे लिये अपना धर्म भी बदल सकती हूं! क्यों, जब तुम मेरे लिये धर्म परिवर्तन कर सकते हो तो क्या मैं तुम्हारे लिये ऐसा नहीं कर सकती।
न ही मुझे इस बात का भय है कि तुमने मेरे साथ अंतरंग संबंध बना लिये है, आदम और हौव्वा के बीच के संबंधों को छोड़कर। तुमने ही तो मुझे मना किया था। सच! संयम की परिभाषा तो बहुतों के मुंह से सुनी थी पर तुम्हें देखकर जाना कि तुम इसे जी सकते हो। मैं हार गयी हूं तुम्हारे सामने। तुमने ही मुझे बताया, समझाया कि जीवन का आनंद क्या होता है। वरना मैं तो जहां पड़ी थी वहां सिर्फ और सिर्फ नीरसता ही तो है।
कितने सुन्दर फोटो खींचे थे तुम्हारे दोस्त ने। क्या इनके फोटोग्राफों से हमारी जिन्दगी में असर पड़ेगा ? जब तुम्हारी होना ही है मुझे, तो फिर इन परदों का वैसे भी क्या औचित्य! मैं इन फोटोग्राफों के चलते भयभीत होकर तुम्हारे साथ आ रही हूं, ऐसा भी नहीं है। मैं तो….मैं तो….’
यूं कहती हुयी लता शरमा गयी।
तभी बिजली आ गयी। और लता भी किचन से अपने बेडरूम आ गयी। आइने के सामने जाने कब तक खड़ी रही।
तभी पुनः मोबाइल उठाया। मिस कॉल में अपने पिता का नाम देखकर वह उस नंबर को ब्लैक लिस्ट में डाल दी।
पंखा किरींच किरींच की आवाज के साथ मस्ती से भरा चलने लगा। हवायें लता के तन से सट सट कर चलने लगीं।
दीवार पर लगी ट्यूब लाइट उस पंखें की बेशरमी को अचरज भरी आंखों से देख रही थी। जो चिंता से भरा रहता था अब अचानक मस्ती से…..!

सनत सागर 

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