वक्रदृष्टि-लेखा-जोखा

वक्रदृष्टि

दिनांक-22 अगस्त 2022
(एक वक्र दृष्टिपात समाज के चरित्र पर )
लेखक- सनत सागर, संपादक बस्तर पाति त्रैमासिक

लेखा-जोखा

चित्रगुप्त जी तीनों के जीवन के पुण्य और पाप कर्मों का लेखा जोखा बना रहे थे। पर उनको ऐसा अनुभव हो रहा था कि इस लेखा जोखा के कार्य में कुछ अधिक ही समय व्यतीत हो रहा है। उन्होंने पुनः एक बार उन तीनों का विवरण क्रम से पढ़ा।
सुमीत करोड़पति व्यक्ति था। उसने अपने जीवन में अत्याधिक दान किया था। शायद ही कोई मंदिर हो शहर का जिसमें उसके दान का पैसा न लगा हो।
मनसाराम लखपति था उसने भी बहुत दान दिया था। परन्तु उसने मानव सेवा में ही दान किया था। कोई भी दीन, दरिद्र, अभावग्रस्त और रूग्ण उसके यहां से रिक्त हाथ नहीं जाता था।
और चंदू एक दीन मानव था। उसने अपने जीवन में बहुत कम दान दिया था। उसके जीवन में वैसे भी खाने के लाले पडे़ रहते थे वो निसहाय कैसे दान कर पाता। फिर भी उसने थोड़ा बहुत दान किया था।
और उन तीनों का लेखा जोखा उनके सामने रखा था। तीनों अपने कर्मों के कारण स्वर्ग के द्वार पर खड़े थे। उन तीनों में से किसे पहले द्वार से भीतर भेजा जाये ये बड़ी समस्या थी।
उन्होंने उनके कर्मों के विवरण को पढ़ कर पुनः क्रम तैयार किया। वो सुमीत बहुत धनवान था उसने अपने जीवन में करोड़ों रूपये दान किये थे परन्तु उसको प्राप्त लाभ की अपेक्षा में वो बहुत कम थे। जबकि चंदू निर्धन होने के बाद भी दान में सुमीत के अनुपात में अधिक दान किया था। उसने अपने जीवन में लगभग दो लाख रूपये की आय प्राप्त की थी और उसमें से उसने लगभग छै हजार रूपये दान में खर्च करे थे। जबकि सुमीत ने अपने जीवन में एक सौ निन्यानबै करोड़ रूपये कमाये थे और दान में तीन करोड़ रूपये ही दान किये थे। यानी प्रतिशत में देखा जाये तो सुमीत ने अपनी आय का डेढ़ प्रतिशत ही दान किया था। और चंदू ने अपनी आय का तीन प्रतिशत दान किया था।
चंद्रगुप्त जी की एक समस्या तो हल हो गयी थी। अब मनसाराम का कैसे निपटान हो विचार कर रहे थे।
सुमीत और चंदू ने तो मंदिरों में दान किया था और मनसाराम ने दीन दरिद्रों और अभावग्रस्त जनों की सहायता की थी।
तभी चंद्रगुप्त जी के समक्ष आकाशवाणी हुयी। उनको ऐसा अनुभव हुआ मानों भगवान स्वयं कह रहे हों।
’मैंने ये तो नहीं कहा था कि मेरे मंदिर बना कर मेरी सीख को भूल जाओ। मेरे मंदिर और मेरी मूरत देखकर हमेशा मानवसेवा में रत रहो इसलिये मेरे मंदिर बनाये गये। अब तो मात्र सिर्फ मंदिर बनाने को ही धर्म मान लिया है। मेरे गुणों की पूजा के स्थान पर मात्र मेरी पूजा हो रही है। एक प्रकार से ये मनुष्य तो अपने पाप कर्मों के एवज में मुझे घूस दे रहे हैं जिससे कि मैं उनके पापों को भूल जाऊं। अनेक प्रकार के पाप कर्मों में लिप्त रह कर धन अर्जित करते हैं और तब वे मेरा मंदिर बनाकर प्रसन्न हो जाते हैं कि चलो अब तो भगवान का मंदिर बना दिया है कौन हमारे पापों को देखेगा। परन्तु ऐसा कदापि नहीं है।’
आकाशवाणी अब थम गयी थी। चित्रगुप्त अब तनाव मुक्त दिखाई पड़ रहे थे।
मनसाराम, चंदू और फिर सुमीत के क्रम से स्वर्ग में उनके प्रवेश की तैयारी के निर्देशपत्र तैयार कर दिये।

उर्दू शब्दों की सूची जिनका छनन कर हटाया-
जिन्दगी-जीवन
हिसाब किताब-लेखा जोख
ज्यादा-कुछ अधिक
इंसान-मानव
बेहद-
गरीब-दीन हीन, अभावग्रस्त
बीमार-रूग्ण
खाली-रिक्त
बेचारा-निसहाय
वजह-कारण
महसूस हुआ-अनुभव हुआ
अमीर-धनवान
मदद-सहायता
सिर्फ-केवल
रिश्वत-घूस
बंद होना-थमना