संस्मरण-अमरुद की चोरी-छत्रसाल साहू ‘क्षितिज’

अमरूद की चोरी

बचपन शायद यथा, अन्यथा कुछ नहीं समझता वह तो बस जो तत्काल है, वर्तमान है, वही समझता, करता और देखता है। इसमे उसे उचित अनुचित का भी भान नहीं रहता ।
अमरूद एक ऐसा फल है जो बहुत ही साधारण है, स्वादिष्ट है और काफी प्रचलित भी है। यह बच्चों को भी बहुत आकर्षित करता है। यह मुख्यतः आँगन में ही होता है, लेकिन इसके बाग भी होते हैं।

ऐसा ही एक बाग हमारे मोहल्ले में भी था। बस्ती मे चार-पाच हजार घर परिवार ही होंगे अतः परिवेश ग्रामीण था। घर काफी बिखरे हुए थे।
हम चार मित्र मैं, श्याम, मानक और अनिल थे। मैं, श्याम और अनिल कक्षा चार में और मानक कक्षा छह का छात्र था। मानक एक साल अनु- उत्तीर्ण भी हो चुका था सो हम चारों मित्रों में सीनियर था।

फरवरी का माह अमरूद फल का पकने का मास होता है। बड़े, गदराए, हल्के पीत-हरे फल पेड़ पर लटके मन को मोह लेते हैं।
जब हमने भी बरुआ काका के बाग में यही फल शाला से आते जाते देखे तो मानक के मुंह से निकला-’देखो बरुआ काका के अमरूद!!! चलो काका से मांगते है”!!!

फिर जब हम बाग में गये तो उनका बेटा बाग के फाटक पर ही खटिया पर गमछा लपेटे बैठा था। वह काका से तुलनीय स्वभाव में रुखा था ।यह हम जानते थे। हमने यह कल्पना नहीं की थी कि काका की जगह वह मिलेगा । हम में से कोई उससे अमरूद माँगना नहीं चाहता था।लेकिन लालच कुछ भी करा सकता है।
फिर काफी विचार विमर्श के बाद एक दो तीन गिनने पर और जिस पर दस आयेगा, वह अमरूद माँगेगा यह तय हुआ। मानक थोड़ा तेज था अतः उसने ही गिनती की और अनिल को टार्गेट कर उसका नंबर निकाला । अनिल डर रहा था, लेकिन नम्बर है तो मांगना ही पड़ेगा । अन्ततः डरते डरते वह उसके पास गया और हम सब उसके पीछे थे।
अनिल ने सकपकाते हुए कहा कहीं मना न कर दे बोला -‘ भैया अमरूद दे दोगे।”
बेटा-‘पैसे है?’
अनिल-‘नहीं!’
बेटा–‘तो भाग !!फोकट मे खायेगा!’
और वह हमारे तरफ दौड़ा । हम सब वहां से भाग आए । मानक गुस्से में था उसका सोचना था कि अगर वह हमें चार अमरूद दे देता तो
उसका क्या जाता।
मानक अचानक बोल उठा -‘सुनो अमरूद खाने है।’
हम सब ने हां मे सिर हिला दिया ।

तो वह बोला – ‘फिर मेरे पीछे आओ।’
और हमने पूरे बाग की बाड़ का चक्कर काटा।
उसके बाद मानक ने सब को संबोधित करते हुए कहा-‘हम रात मे अमरुद तोड़ेंगे । फिर वह हमें बाड़ के पास एक जगह ले कर गया और वहां से शायद छोटे जानवर जैसे कुकुर या लोमड़ी के आने जाने की जगह थी, दिखाकर हमें समझाने लगा-‘इस जगह से हम सब रात आठ बजे अंदर घुसेंगे। पहले वह फिर अनिल और मैं, श्याम बाहर ही रहेगा और हम अमरूद तोड़ कर बाहर फेकेंगे जिसे वह इकट्ठा करेगा।

मानक की प्लानिंग से हम प्रभावित थे सो सबने हां कहकर कर सहमति दी ।

वह थोड़ा रुका और सबको फिर पीछे पीछे आने का इशारा कर बाड़ के साथ आगे चलने लगा और होठों पर उंगली रख सबको चुप रहने का इशारा किया। शायद उसको बरुआ काका के हमारी खुसर-पुसर या पदचाप सुन लेने का अंदेशा था।
खैर! वह फिर एक जगह रूक कर हमें उसी तरह रास्ते को समझाने लगा। यह रास्ता कठिन था कांटे की बाड़ थी और साथ ही झुक कर ही अंदर या बाहर आ सकते थे, वो भी एक आदमी एक समय में।
मानक ने समझाया की अगर हम उस रास्ते से, आकस्मिक बाग मे किसी के आ जाने से, नहीं निकल पाए तो भाग कर इस रास्ते से निकलना है। यह रास्ता पहले वाले रास्ते से बिल्कुल 180 अंश पर था ।

इंतजार लम्बा था । अमरूद खाने की इच्छा शक्ति घट सकती है, इसका मानक को आभास था सो सबको उसने शपथ दिलाई की सब छह बजे टप्पू गेंद खेलने इकट्ठा होगे और आठ बजे तक पंचायत के बिजली के पोल के प्रकाश मे खेलेंगे फिर बाग मे चलेगे।
इस तरह का उत्पात हम सभी ने कभी नहीं किया था सो डर लग रहा था ।

फिर ‘हम सभी दोबारा मिलते है’ का संकल्प ले कर घर चले गये।

जब जाने का समय आया तो मैने सोचा नहीं जाता दोस्तों को बता दूँगा कि अम्मा ने खेलने आने नहीं दिया, फिर लगा बाकी सभी आ गये तो इससे अपमानित होना पड़ेगा । बचपन सोचता है कि अमरूद चुराने से ज्यादा अपमान मित्रता न निभाना है।
अन्ततः अम्मा से आँख न मिलाते हुए खेलने जाने की अनुमति ली । अम्मा बेचारी को क्या पता उसका पूत क्या करने जा रहा है । उसने अंधेरा होने से पहले आ जाना कहकर ‘हां’ कर दी ।
और मैं आँगन से होते हुए बिजली के पोल की तरफ सरपट भागा। वहा सभी इन्तजार कर रहे थे। हम खेल कम अमरूद खाने का मन ही मन ज्यादा विचार कर रहे थे और उसके स्वाद का काल्पनिक आनंद ले रहे थे।
जब प्लानिंग के अनुसार जैसे जैसे समय आ रहा था थोडी घबराहट बढ़ रही थी, मुझे ऋणात्मक विचार ही आ रहे थे कि बरुआ काका के बेटे ने हमे पकड़ लिया और बहुत पीट रहा है। लेकिन शायद सब भी यही सोच रहे होंगे सोचकर हिम्मत आ गई ।
जब अंधेरा हो गया तो हम सब बाड़ के पास उस पहले घुसने वाले रास्ते पर आ गए, रास्ता संकरा था सो पहले बहुत सावधानी से मानक बिना आवाज़ किए अन्दर गया उसी तरह मैने और श्याम ने प्रवेश किया। प्लानिंग के अनुसार श्याम बाहर ही था। लेकिन कुछ दिख नहीं रहा था, चंद्रमा भी शायद शुक्ल पक्ष की छट के आसपास पास का था। जब आँख गड़ा कर देखने का अभ्यास हो गया तो कुछ लटके हुए अमरूद तोड़े और बाहर फेंके तो श्याम से रहा नहीं गया और धीमी आवाज़ मे बोला -‘कच्चे हैं।’
मानक ने भी सुना तो साहस का परिचय और हमारा नेता सिद्ध करने के चक्कर मे मानक एक पेड़ पर पके अमरूद तोड़ने के लिए चढ़ गया। वह थोड़ा और ऊपर चढ़ा तो अमरूद का छोटा पेड़ उसका भार बर्दाश्त नहीं कर सका और जिस डाली पर वह था भरभरा कर मुख्य तने को चीरती हुई नीचे गिर गई और काफी आवाज़ हुई । अनिल भागता हुआ जिस रास्ते से आया था निकल गया इसी तरह फुर्ती के साथ मानक भी चूंकि पेड़ की डाल से मानक भी रास्ते की तरफ ही गिरा था सो आसानी से निकल गया। मैं पेड़ के दूसरी तरफ था और टूटी डाली मेरे और रास्ते की बीच में थी। अतः मैं दूसरे रास्ते की तरफ भागा और नीचे से निकलने लगा लेकिन मैंने अनुभव किया कि मुझे कोई पीछे से खीँच रहा है । मुझे तो मानो सांप सूंघ गया, यह तो बरुआ काका का बेटा है । मैंने तत्काल जो समझ में आया किया और तुरंत उसके सामने अपनी निर-अपराध होने की सफाई देने लगा ।
मैं बुदबुदाया –भैया! ऐ सब मानक ने किया मैंने नहीं ।मुझे घर जाना है. औऱ रोने लगा। साथ ही भगवान को याद करने लगा। पिताजी कहते थे मुश्किल घड़ी में हनुमान जी सहायता करते हैं, मैं उनका ध्यान करने लगा। लगा भाग कर तुरंत मां के पास पहुँच जाऊं। वह कह देगी -कोई बात नहीं, अमरूद ही तो तोड़ रहा था। पैसे ले लो।’
इस तरह मां ने मुझे पहले भी अध्ययन का परिणाम आने पर पिता जी के क्रोध से बचाया है।

मुझे पूरा भरोसा था यह मुझे मारेगा, लेकिन मुझे पकड़ कर वह बरुआ काका के पास ले गया, उनको कम दिखता और कम सुनाई देता था । वह कहने लगा -‘कक्का! मास्टर बाबू का बेटा और उसके दोस्त अमरूद चोरी कर रहे थे बाकी भाग गये । मास्टर बाबू का लड़का पकड़ में आया है।’
बरुआ काका ने मुझे पास बुलाया और बेटे से कहा मास्टर बाबू को बुलाओ ।

मैंऔर डर गया और उनके पैर पर गिर गया और कहने लगा-‘कक्का! पिता जी को मत बताओ, बहुत मारेंगे ।’ साथ ही तेजी से रोने लगा बचपन का यह भी एक बचने का हथियार है।

शायद उनका दिल पिघल गया और अपने बेटे से कहा -‘इसको घर पर छोड़ आओ।’
मुझे फिर लगा यह मां या पिता जी को बता देगा। बचपन में दिमाग बहुत तेजी से सोचता और निर्णय लेता है क्योंकि परिणाम की चिन्ता नहीं रहती।
मैंने रोते हुए कहा -‘मैं अकेला ही चला जाऊँगा।’
खैर! उन्होंने फिर ऐसा न करने की हिदायत दे कर मुझे छोड़ दिया।

मैं देर से घर पहुँचा तो चुपके से मां के पास ही गया और रोने लगा। वह घबरा गई और क्या हुआ पूछने लगी। तभी पिता जी जो टेबुल लैम्प की रोशनी में कुछ कार्यालय का काम कर रहे थे आ गये।
उन्होंने भी डांटते हुए कहा- ‘इतनी रात तक खेलते रहते हो पढोगे कब।’
मां ने कहा -‘यह रो रहा है।’
पिता जी ने कहा-‘सब देर से आने का बहाना है।’ इससे मुझे थोड़ी तसल्ली हुई कि किसी को कुछ मालूम नहीं है। और मां से कहा -‘तेज भूख लगी है।’ मां को लगा मै भूख की वजह से रो रहा हूँ।

रात कब नींद आ गई पता नहीं। दूसरे दिन रविवार था मेरी शाला और पिता जी के कार्यालय की छुट्टी थी। सुबह उठा तो लगभग सब भूल गया था। अचानक देखा बरूआ काका और उनके पीछे उनका बेटा सिर पर टोकरी ले कर आँगन में फाटक से प्रवेश कर रहे हैं और उन्होंने पिताजी को आवाज़ लगाई -‘मास्टर बाबू घर पर हैं ?’
पिता जी सुबह की धूप में कुर्सी पर बैठे अखबार पढ रहे थे ।
उन्होंने भी आवाज लगाई कि -‘काका! आ जाओ।’ और काका को कुर्सी पर बैठने का इशारा किया । बेटा नीचे ही बगल मे बैठ गया।
काका-‘सोचा अमरूद पक गये हैं आपको दे आऊँ।’
पिता जी- ‘इसकी क्या जरूरत थी मैं खुद ही आकर ख़रीद लेता।’
फिर काका ने मुझे दहलान में दीवाल की आड़ में खड़ा देखा तो इशारे से बुलाया ।

मैं डरते डरते पिता जी के बगल में खड़ा हो गया।
काका-‘लो बेटा! जितना चाहो अमरूद खाओ । मास्टर बाबू के पास खरीदने के लिए बहुत पैसे है।’
मैं थोड़ा रुआंसा हो गया । लगता है अब काका रात की बात बताने वाले हैं।
लेकिन देखा पिता जी पैसे दे रहे हे लेकिन काका लेने तैयार नहीं हैं और मेरे सिर पर हाथ फेर कर कर चले गये। पीछे से उनके बेटे ने मुझे हाथ से पीटने का इशारा किया और हँस रहा था।
अमरूद मेरा अभी भी सबसे पसंदीदा फल है।
जब भी मैं इसका सेवन करता हूँ तो बरुआ काका और उनका दिया सबक याद आ जाता है।

 

छत्रसाल साहू ‘क्षितिज’
मुंबई

मो-7407304888