बस्तर पाति कहानी प्रतियोगिता-1, द्वितीय पुरस्कार-बकुला पारेख

काश…!

प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व की मंद-मंद चलती हवा, उड़ते हुए पक्षियों की चहचहाहट की मधुर ध्वनि, कहीं दूर मंदिर में आरती के समय होने वाले घंटनाद ने मन को एक अदम्य प्रसन्नता से भर दिया। छत पर प्राणायाम करते हुए सूर्यदेव के आगमन से पूर्व फूटने वाली रश्मियों का आभास किया तन ने, और संपूर्ण तन, मन एक अलौकिक ऊर्जा से भर गया। ‘भ्रामरी’ करते हुए ‘‘ऊँ’’ की ध्वनि के साथ मंदिर में बजने वाली घंटी की धीमी आवाज मिलकर साक्षात शिवजी के रूप में आभास करा रही थी। प्रतिदिन प्राणायम के पश्चात ‘ध्यान’ के दौरान दिन से संबंधित देवता का ध्यान करना मेरी दैनिक दिनचर्या में शामिल है। आज सोमवार है आँखें बंद कर शिवजी का ध्यान कर रही हूं चंद सेकंड पश्चात ‘शिवजी’ का स्थान विचारों ने ले लिया।
’’सच मन की चंचलता को कोई भी नहीं माप पाया होगा, कितनी जल्दी विचारों के विषय बदल जाया करते हैं। और आखिर हम हैं मायावी जीव, साधु सन्यासी तो हैं नहीं सो हमारे मन की चंचलता परिवार के आसपास ही केंद्रित हो जाया करती है। और क्यों न हो ? आज का दिन विशेष खुशी का दिन जो है। मेरे आलोक का अमेरिका जाने का स्वप्न जो सच हो गया है। हां, डगर वह प्राप्त नहीं कर सका जो वह चाहता था यानी वह ‘स्टुडेन्ट वीजा’ पर वहां जाना चाहता था, लेकिन परिस्थितिवश ग्रीनकार्ड धारी लड़की से शादी रचाकर गृहस्थी की डगर पकड़ अमेरिका जा रहा है।
पिछले दो सालों में कहां-कहां, कैसे-कैसे संजोगों से पाला पड़ा है यह सोचते हुए मन की चंचलता ने 2 वर्ष पूर्व के विचार सागर में गोते लगाना शुरू किया, और साथ ही उपजी विचारों की श्रृंखला! जुलाई का महीना होते हुए भी तेज तपन, फुल स्पीड पर पंखा चलाकर दोपहर में लेटी ही थी कि फोन की घंटी घनघनाई ‘‘जरूर आलोक का होगा, आज उसका कैम्पस इंटरव्यू जो था,’’ सोचते हुए रिसीवर उठाया, बिलकुल सही अनुमान था, फोन आलोक का ही था।
‘‘मम्मी मेरा चयन हो गया है, 5 लाख का पैकेज एवं 2 साल का बान्ड भरना है।’’ आलोक की आवाज में छिपा मेरी अनुमति का संदर्भ पहचानते हुए मैंने कहा- ‘‘बेटा अपने प्रोफेसरों एवं मित्रों से सलाह कर लो।’’ अनुमति देने में मेरे असमंजस का कारण था आलोक का स्वप्न, विदेश जाकर आगे की पढ़ाई करना जब से ठण्म्ण् में एडमिशन हुआ था, बस एक ही रट लगाए था ‘‘मुझे मास्टर डिग्री के लिए न्ण्ै जाना है। ’’
इस महत्वाकांक्षा के साथ उसने फायनल में आते ही टोफेल, एवं जी.आर.ई. की परीक्षाएॅ पास कर ली थीं, स्कोर भी अच्छा हासिल कर लिया था। मित्रों के साथ कॉलेज में कैम्पस के तहत इंटरव्यू में पास हो कर स्वयं की योग्यता साबित कर दिखाई, लेकिन मैं जानती थी कि, उसकी रूचि कहां पर केन्द्रित है! शाम को त्रिवेदी जी ऑफिस से आए, टाई ढ़ीली कर थोडा रिलेक्स होकर बैठे, चाय के साथ बिस्कीट, मठरी ले कर मैं उनके पास बैठी, थोडा उत्साहित होकर समाचार सुनाया।
‘‘आलोक का छै लाख के पैकेज पर चयन हो गया है’’
‘‘अरे वाह!’’ चुस्की लेते हुए मुस्कराकर बोले, ‘‘यह तो बहुत अच्छी खबर है। कहाँ है आलोक ?’’ एक गर्व की झलक देखी मैंने त्रिवेदी जी के चेहरे पर जो पितृ-प्रेम का स्पष्ट भाव प्रकट कर रही थी।
‘‘आलोक तो अभी आया नहीं है।’’ मैंने प्रश्न का उत्तर दिया, दोपहर से मन में घुमड़ सी रही आस को जुबां पर लाते हुए बोली- ‘‘सुनिये, जब से आलोक इंजीनियरिंग में गया है, एक ही सपना रहा है उसका, आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका जाना। कैम्पस में चयनित हो कर उससे अपनी योग्यता तो साबित कर दी, लेकिन उसकी महत्वकांक्षा का क्या ?’’
‘‘यह सब तो ठीक है, ममता!’’ त्रिवेदी जी गहरी सोच लिये बोले ’’बहुत खर्च होता है, वहाँ पर जाने के लिये, विशेष रूप से उन छात्रों को जिन्हें वहां पर सरकारी मदद जो फीस के लिये होती है, नहीं मिल पाती है।’’
कुछ आशा संजोते हुए मैंने पूछ लिया ’’और बैंक ऋण सुविधा ?’’ ऋण संबंधी मेरे अल्पज्ञान पर तनिक मुस्कराते हुए वे बोले ’’अरे ऋण के बगैर तो कुछ संभव ही नहीं है। ऋण की सुविधा देते जरूर है, लेकिन ब्याज दर भी बहुत ऊँची होती है।’’
इतनी जानकारियां लेते रहे और कभी मुझे बताया नहीं सोचते हुए मैंने कहा- ‘‘कम से कम थोड़ी बातचीत इस बारे में होती रहती तो आलोक भी सोचता अपने इस उद्देश्य के बारे में।‘‘
‘‘उसे सब मालूम होगा ममता।’’ आलोक के आते ही इस विषय पर बात करने की मैंने ठान ली! शायद मैं भी मन ही मन डर गई थी, उन आर्थिक खर्चों की सच्चाईयों से।
’’5 लाख का पैकेज कम नहीं होता। यह तो कम्प्यूटर लाइन है वर्ना आर्थिक मंदी के इस दौर में अन्य क्षेत्रों में कहां इतना पैकेज भी मिल पा रहा है ? आगे होगा तकदीर में तो कंपनियां भी स्वयं के खर्चे पर विदेश भेजती हैं।’’
रात 9 बजे आलोक आया, खाना परोसते हुए मैंने बात छेड़ ही दी। ’’बेटा भारत में भी अब नौकरियां अच्छी हैं तुम्हारी लाइन के लिये।’’ बात का संदर्भ समझते हुए वह बोला- ‘‘मेरा अपना एक उद्देश्य है। उसे मैं पूरा करना चाहता हूँ। रहा सवाल आर्थिक मामले का मैं शिक्षा ऋण पर ही जाऊँगा। मम्मी, सब स्वयं चुकाऊंगा।’’
‘‘बच्चे का उद्देश्य पूरा करने में हम साथ न देंगे तो कौन देगा ?’’ उसके दृढ़ निश्चय पर हमने भी सहमति की मुहर लगा दी। और आलोक ने अपने प्रयासों का श्री गणेश किया। 1150 ळण्त्ण्म्ण् के स्कोर के साथ सिलसिला शुरू हुआ, आवेदन भेजने का। एक आवेदन जो विदेशी विश्वविद्यालय में भेजा जाता है, के साथ तरह-तरह के प्रमाणपत्र, विभिन्न ऑथारिटीज के हस्ताक्षर एवं जाने कितने ही दस्तावेज। तौबा! आलोक की व्यवस्तता को देख मैं दंग ही रह जाती, पूरे तन-मन धन से वह अपने उद्देश्य के पीछे लगा हुआ था, खाने-पीने की सुध तक नहीं थी उसे। उसकी मेहनत को देखते हुए त्रिवेदी जी भी उसे आर्थिक संबल प्रदान कर रहे थे।
‘‘एक वह युग था, एक परिवार नियोजन चलन में नहीं था, व्यक्तिगत रूप से किसी बच्चे पर ध्यान देना असंभव सा ही था।’’ त्रिवेदीजी चाय पीते हुए बोले, ‘‘अब यह युग है प्रतियोगिता का! देखो मानसिकता भी समय के साथ कैसे बदल जाती है न ममता ?’’
‘‘आप ठीक कह रहे हैं।’’ मैंने उत्तर दिया।
दिन पर दिन बीतते जा रहे थे। एक उम्मीद रूपी सूर्य बादलों से बाहर आकर रश्मियां बिखेरना चाहता था, बस इंतजार था धीरे-धीरे बादलों रूपी समय के सरकने का। कुल 6 विश्वविद्यालयों में आलोक ने आवेदन भेजे अब इंतजार था वहाँ से जवाब आने का। लगा समय बहुत धीरे जा रहा है। एक मिशन जिसमें कुछ भी निश्चित नहीं था, अभी तो सिर्फ पैसे ही लगाए जा रहे थे। कभी यह प्रमाणपत्र तो कभी वह। त्रिवेदी जी क्रेडिट कार्ड ले कर खर्चों का हिसाब लगा रहे थे।
’‘और कितना बाकी है आलोक ?’’ संदर्भ समझते हुए कुछ झिझकते हुए आलोक बोला।
‘‘बस एक आवेदन और पापा।’’
दोपहर को लेटी, कपिल याद आया, कपिल, बड़ा बेटा, दिल्ली में है, अपने परिवार का खर्च ही पूरा नहीं कर पाता, वह भी इंजीनियर है, लेकिन उसे मिलने वाली तनख्वाह से वह संतुष्ट नहीं है। एक कारण यह भी है कि वे आलोक की इच्छा पूरी करने में साथ दे रहे हैं।
विदेश जा कर स्कॉलरशीप पर पढ़ना और कमाना मध्यमवर्ग के एवं उच्चवर्ग के छात्रों के लिए एक आम बात है आजकल। अपनी ऊंची पढाई का प्रतिफल वे ऊंचा चाहते हैं, यही कारण है कि भारत में वे रहना नहीं चाहते। लेकिन वहां जाने से पूर्व की कोशिश इतनी महंगी होगी इसका अंदेशा मात्र भी नहीं था मुझे। दस्तावेजों को बनाने में, काउन्सलर की फीस के साथ 1 लाख रूपया लग चुका था, अगर वहाँ पर फायनान्सीयल सहायता मंजूर न हुई तो एक सेमिस्टर की फीस 4 लाख 65 हजार है, बाकी खर्च अलग…. तो स्वयं पढाई के साथ कमाना अत्यंत जरूरी है। विभिन्न तथ्य सामने आते-आते मुझे हकीकत का आभास होने लगा वह हकीकत थी ‘पैसा!’
दिन गुजरते गए, अब आलोक को इंतजार था, भेजे गए आवेदन पत्रों के उत्तर का। एक महीने के अंदर उसके साथ वाले सभी मित्रों द्वारा भेजे गए आवेदनपत्रों के प्रत्युत्तर में कॉल मिल गए, किसी को एक तो किसी को 2 यूनिवर्सिटी द्वारा। आलोक के 6 आवेदनपत्रों से 5 के निरस्तपत्र प्राप्त हो चुके थे। अब एक ‘सेमलीना’ युनिवर्सिटी से लेटर आना शेष था बस उसी पर आस बनी हुई थी। आलोक को पूर्ण यकीन था कि वहां से उसे अवश्य कॉल मिलेगा, इस यकीन का कारण यह था कि सचिन, उसके मित्र को यहीं से कॉल प्राप्त हुआ था जबकि उसके नंबर आलोक से कम थे। पूर्ण रूप से निशि्ंचत था आलोक, और उसके साथ हम भी। दिन में तीन बार ‘नेट’ पर मेल चेक करने बैठता। तनाव एवं भागादौड़ी के कारण दुबला गया था आलोक।
मुझे ठीक याद है, उस दिन मंगलवार था, दोपहर में लेटी थी तभी बेल बजी। बाई थी।
’’आज बहुत जल्दी ?’’
‘‘हाँ 11 नंबर का बेटा विदेश जा रहा है, सब छोड़ने मुंबई जा रहे हैं, सो जल्दी बुला दिया था।’’ सुन तो रही थी उसकी बातें, लेकिन मन की सोच दूसरी तरफ गति ले रही थी। ‘‘हम भी जल्दी ही छोड़ने जाएंगे आलोक को।’’ सोचते हुए आलोक की तरफ देखा, पत्रिका के पन्ने पलटते सो गया था।
बाई को बर्तन दे कर टी.वी. खोलकर बैठी। ‘पड़ोसन’ पिक्चर चल रही थी, कितनी ही बार देखी थी, फिर भी देखी, मनोरंजक फिल्में दिमाग के तनाव को कम करती है। पिक्चर खत्म हुई घड़ी देखी। घड़ी 7 बजा रही थी शाम के। टाइम पता ही नहीं चला, मच्छरों की भनभनाहट शुरू हो गई थी। खिड़कियां बंद की, आलोक के कमरे की ओर गई देखकर अवाक् रह गई दिल धक् से बैठ गया। कम्प्यूटर खुला पड़ा था, आलोक उल्टा लेटा हुआ था, किसी आशंका से भयभीत हो मैंने पूछा ’’आलोक बेटा बहुत थक गया है क्या ?’’ करवट लेते हुए फूट-फूट कर रोने लगा।
‘‘मम्मी लास्ट यूनिवर्सिटी से रीजेक्शन लेटर आ गया है।’’ सुनकर हतप्रभ हुई मैं, लगा कहीं से अचानक फिसल कर गिर पडी हूँ मैं और साथ में मेरा आलोक! जैसे किसी फूलों के बगीचे में फिसल कर गिर पडे़ हों काँटों पर और वह कांटे की चुभन, मिल गई गहरे दुःख के साथ, जो महसूस हुआ मुझे। आलोक की स्थिति समझते हुए मैंने उसे सांत्वना दी।
‘‘कोई बात नहीं बेटा, कोशिश करना हमारा काम है।’’
फूट पड़ा आलोक ’’इतने पैसे खर्च हो गए और कोई फल नहीं निकला।’’
‘‘तू पैसों की चिंता मत कर, फिर जमा हो जाएंगे। यहाँ पर भी नौकरी तो मिल ही रही है न ?’’ येनकेन प्रकार से मुझे उसकी मानसिक स्थिति को संभालना था, घबड़ा रही थी, आलोक को सदमा न लग जाए। क्या करूँ ? कैसे समझाऊँ आलोक को ? अचानक तनाव बढ़ने से मुझे मेरा बी.पी. बढ़ता हुआ महसूस हो रहा था, तभी बेल बजी। रवि, आलोक का मित्र था, वह दिल्ली में नौकरी करता है, पूरी हकीकत से वाकिफ होकर वह आलोक का मूड बदलने हेतु उसे पिक्चर ले गया।
मैं हतप्रभ सी सोफे पर बैठ गई। लगा जैसे मंजिल तक पहुंचने पर धक्का खा लिया, और बेबस हो मैं धक्का देने वाले को देखने के लिये मुड़ी। हां, मैं आलोक के दुःख को आत्मसात कर उस कारण तक पहुँचने की कोशिश करने लगी, विचारधारा ने अपना प्रभाव बनाया, शशीकांत की बात याद आ गई, ‘‘आंटीजी, विदेश में शिक्षा पास करना ‘भाग्य’ पर निर्भर करता है।’’ पता नहीं क्या और कैसा क्राइटेरिया होता है उनका, कम स्कोर’ प्राप्त करने वाले भी ‘वीजा’ प्राप्त कर लेते हैं, और उसी लाइन में अधिक नंबर पाने वाले भी नहीं जा पाते हैं- मैं भी स्नातक हूँ हर बात की तह तक जा कर समझने लायक दिमाग रखती हूं। बात घूमती रही दिमाग में। ‘‘नहीं कुछ तो होगा। लेकिन क्या ? आलोक का संपूर्ण एकेडेमिक रिकार्ड भी अच्छा ही रहा है। फिर ? ऐसा क्यों हुआ ?’’
शाम हुई त्रिवेदीजी की राह देखकर बैठी थी, तभी अरूण, आलोक का स्कूल मित्र आया बातचीत के दौरान उसने कुछ और तथ्य बताए ‘‘आंटीजी पिछले साल मेरे भाई के मित्र का न्ण्ैण् कॉलेज से कॉल आया था। कॉल तभी आता है जब कॉलेज वाले आर्थिक दस्तावेज चेक करते हैं। सभी खाना पूर्ति के पश्चात ‘वीजा’ के लिए साक्षात्कार दिया तो ‘आर्थिक दस्तावेज’ के मामले पर ही ‘वीजा’ रीजेक्ट कर दिया!’’ मैं शांति से उसकी बातें सुन रही थी, वाकई महत्वपूर्ण जानकारियां थी। आगे उसने बताया, ‘‘अगले दिन उसके एक मित्र का ‘वीजा’ हेतु साक्षात्कार था बिलकुल वैसे भी दस्तावेज थे, लेकिन उसे ‘वीजा’ मिल गया। यहाँ तक कि उसके दस्तावेज देखे भी नहीं गए। आंटीजी, उसमें आलोक की स्थिति अच्छी है कि वह कॉल पर ही अटका।’’
‘‘हाँ बेटा, तुम ठीक कह रहे हो।’’ सोचने लगी, जीवन में कहां, कब, कैसी परेशानी आएगी किसी को भी ज्ञात नहीं होता है। अखबार लेकर बैठी, पर दिमाग में विचार कुछ और चल रह थे, आलोक की मनःस्थिति को कैसे संभाला जाए ?
कुछ याद आया मुझे, पिछले महीने मीरा के बेटे की शादी थी, उसे भी विदेश जाना था, लेकिन ‘वीजा’ नहीं मिल पाया था, उसने ग्रीनकार्ड होल्डर लड़की से शादी रचाई, वो अब अमेरिका में हैं। सोच आगे बढ़ी इस विषय पर क्यों न आलोक से बात की जाए ? शाम को त्रिवेदी ऑफिस से आए, मन की बात लाख छुपाने पर भी चेहरे पर आ ही गई।
‘‘क्या बात है ?’’ संक्षेप में बताते हुए आँखें डबडबा गई। थोड़े तनाव में आ गए वे, स्वयं को संयत करते हुए बोले ‘‘हम मध्यमवर्गीय के लिए नौकरी बहुत मायने रखती है, विदेशी शिक्षा पैसों का खेल तो है ही, लेकिन ‘भाग्य’ का भी है यह साबित हो गया। पाई-पाई जोड़ते हैं, फिर भी बच्चों की महत्वकांक्षा देखते हुए साथ भी देते हैं, लेकिन अब आर्थिक नुकसान के साथ आलोक को भी संभालना होगा।’’
पिक्चर देख कर आलोक रात को आया। मूड देखकर त्रिवेदीजी ने बात छेड़ी, ‘‘यहां पर भी नौकरी है तुम्हारे लिये’’, ‘‘नहीं!’’ बीच में ही बात का संदर्भ समझते हुए आलोक बोला, ‘‘मैं दुबारा, कोशिश करूँगा।’’
इस अटल निर्णय की तह पाकर मैंने पूछ ही लिया ’’क्या हम ग्रीनकार्ड होल्डर लड़की की तलाश करें ? मीरा का बेटा समीर भी वैसे ही गया, अब वहां वह काम के साथ पढ़ रहा है।’’
‘‘सोचूँगा……’’ आलोक अपने कमरे की तरफ गया।
अगले दिन उसने अपनी रजामंदी दे दी। मैं समझ रही थी, उसे अपना उद्देश्य पूरा करना था। अब सिलसिला शुरू हुआ ग्रीनकार्ड होल्डर लड़कियों के बायोडाटा से रूबरू होना। ग्रीनकार्ड होल्डर लड़कियां भारतीय लड़कों के अच्छे चरित्र को मानते हुए या माता-पिता की इच्छावश मूल भारतीयों से शादी करना चाहती है। 4 लड़कियों की तस्वीर आई थी, इनमें से रीना की तस्वीर पसंद आई। शक्ल के साथ उसकी उम्र, पढ़ाई आदि का मेलजोल भी ठीक बन रहा था। आलोक को रीना की तस्वीर, बायोडाटा से अवगत कराया गया। भारतीय मूल की रीना कानपुर की थी। संयोगवश रीना के माता-पिता मेरे मायके के पड़ोसी के रिश्तेदार निकले। 2 वर्ष पूर्व बेटी के पास अमेरिका चले गए। ‘तत्काल’ में टिकट बुक करवा कर हम तीनों कानपुर पहुंचे। वहां जाने की मेरी जिद् थी, ताकि घर-परिवार से थोडा परिचित हो जाए।
देखने में सामान्य लेकिन व्यावहारिक तौर पर खुलेपन से रीना ने अपनी बातें रखीं, उसने बताया कि वह भी भारतीय संस्कृति को ही पसंद करती है, वहां पर भी काफी भारतीय हैं, लेकिन मैच जम नहीं पाया। 23 साल की उम्र में, गहरी समझ जो जीवन साथी के संबंध में थी मैंने उस लड़की में महसूस की। बार-बार वह ‘चरित्र’ एवं ‘संस्कार’ पर जोर डाल रही थी, जबकि इन शब्दों के मायने कुछ अधिक अर्थ नहीं रखते हैं वहाँ पर। चलो अपनी-अपनी संस्कृति है प्रत्येक देश की, बुद्धिमानी इसी में है कि प्रत्येक अच्छी प्रणाली को हम ग्रहण करें।
हम लोग चारों अभिभावक बातचीत करते रहे, वे दोनों बाहर घूमने गए, लौटने पर दोनों की ‘हाँ’ पर सगाई की रस्म सादगी से पूरी की। कोर्ट में मेरेज दाखिला दे कर दस्तावेज बनवाने दे दिये गए। हम खुश थे आलोक की खुशी से, बोला ‘‘मम्मी बस एक बार चला जाऊँ, अपनी पढ़ाई मैं वहाँ जरूर पूरी करूँगा।’’
‘‘अरे आज चाय नहीं मिलेगी क्या’’ ? लो ‘ध्यान’ करते हुए मैं विचारों के समुद्र में गोते लगाने लगी थी, आई, कहते हुए दरी उठाई तह बनाते हुए नीचे उतरी। शादी का मुहुर्त जल्द ही निकाल लिया गया। मेहमानों से घर भर गया ! धूमधाम से शादी हुई। रीना के पास छुट्टियाँ कम थी सो 15 दिन पश्चात् वे लोग चले गए।
बालकनी में कुर्सी डाल कर हम लोग बैठे थे, तभी आलोक का फोन आया। आलोक वह बहुत खुश था, उसने बताया कि उसे एक सॉफ्टवेर कंपनी में काम मिल गया है, थोड़ा समय, पैसा जोड़कर वह आगे पढाई की इच्छा पूरी करेगा।
आलोक मेल करना सीखा गया था, सो दो दिन में एक बार मेल कर लिया करती थी, विज्ञान की प्रगति ने दूरियों को मिटा दिया है सो अमेरिका भी अब दूर नहीं लगता है।
त्रिवेदीजी की नौकरी के 2 साल बाकी है, आलोक-रीना बुला रहे हैं, रिटायरमेंट के बाद हो आएंगे, पीछे वाली सक्सेना जी बखान करते नहीं अघाती, यह विदेश का है, तो वह विदेश का हैं, सभी चीजें इम्पोर्टेड बताती रहती है, पहले तो सीधे मुँह बात नहीं करती थी, अब आ कर बैठती हैं, आलोक के बारे में पूछती रहती हैं। सब विदेश का ‘मायाजाल’ है, सोचते हुए मैं लेट गई।
‘‘अरे आपने आज के केलेन्डर पर तारीख देखी ?’’ हर्ष मिश्रित आवाज में मैंने त्रिवेदीजी से पूछा चश्मा उतारकर केलेन्डर पर नजर डाली ‘6 जुलाई’,
‘‘अरे हाँ, आज तो आलोक की शादी की सालगिरह है न! चलो बेटा-बहू को बधाई देते हैं!’’
तभी फोन की घंटी बजी, पता नहीं क्यों, एक पल के लिये मेरा दिल धड़का, फोन की घंटी कुछ अधिक तेज महसूस हुई, तेज कदमों से चलते हुए पहुंची, रिसीवर उठाया, सामने आलोक था। मुझे महसूस हुआ, जैसे वह कुछ कहना चाह रहा है, लेकिन कह नहीं पा रहा है, मन की घबराहट को काबू करते हुए मैंने बोला, ‘‘बधाई हो बेटा!’’ कोई प्रत्युत्तर न पा कर मैं बोल पड़ी, ‘‘क्या बात है बेटा, सब ठीक है न ?’’
‘‘नहीं मम्मी! रीना को प्रेगनेंसी थी, टेस्ट करवाए, रिपोर्ट में एचआईवी पॉजिटीव है, और कल मेरा भी परीक्षण करवाया… बोलते हुए फफक पड़ा आलोक।
‘‘बस बेटा, मैं आगे की बात समझ गई।’’ आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा।
काश…काश…!
एक डॉक्टर का लिखा हुआ आलेख पढ़ा था-‘‘शादी के पूर्व कुछ बीमारियों के टेस्ट अवश्य करवाना चाहिए।’’ उसे फालो किया होता, लेकिन अब ‘काश’, काश ही रहेगा।


श्रीमती बकुला पारेख
18, जूनियर एम.आई.जी.
जयबजरंग नगर,
छोटी बमोरी, इंदौर
मो.-09826952602