काव्य-जयश्री शेंडे

बड़ा बनना सीखो

बड़ा बनना है तो झुकना सीखो
ग़मों से समझौता सीखो
पराए को अपना बनाना सीखो
धरती पर ही खड़े हो
खजूर में अटके हो
अरे आसमान में उड़ना सीखो
लड़कर बॅंट जाते हो क्यों
बच्चों की तरह लड़ना सीखो
नमक की तरह घुलना सीखो
खुशियों को जोड़ना सीखो
दूसरों के दुःख घटाना सीखो
ज्ञान का गुणा करना सीखो
अवगुणों को भाग देना सीखो
जीवन की सरल परिभाषा सीखो
अपने हाथों से स्वर्णिम इतिहास बनाना सीखो
खंजर न रखो पीठ पर किसी के
दिल से दिल मिलाना सीखो
नदियां नहीं देखती जात-पात
उसकी तरह बन जाना सीखो
बड़े-बड़े ओहदों पर तो पहुंॅच जाते हैं लोग मगर
पहले आदमी बन जाना सीखो
सभी तो खुदा के बन्दे हैं
सबको अपनाना सीखो
हममें सब हैं, सबमें हम हैं
सबको अपना बनाना सीखो
करो प्यार अपने देश से
देश के लिए मर जाना सीखो
बेटे-जैसे हम तुम्हारी देखभाल करते हैं
तुमको खिलाते-पिलाते हैं
वैसे ही जब हम बूढ़े हो जाएंगे
तब तुम हमको खिलाओगे-पिलाओगे
हमारी देखभाल करोगे इसीलिए
तो मम्मी दादा-दादी भी तो बूढ़े हो गए हैं
उनकी देखभाल तो आप नहीं करते
वे आश्रम में क्यों रहते हैं
मेरे पास कोई उत्तर नहीं था
मैं बगले झॉंक रही थी
और बेटा लगातार पूछ रहा था
बताओ न मम्मी, बताओ न मम्मी
मैं अनुत्तरित रह गई थी


जयश्री शेन्डे
व्याख्याता(नगरी निकाय)
शास0बहु0उ0मा0शा0 जगदलपुर