अंक-1-बहस-साहित्यिक थ्रिलर

साहित्यिक थ्रिलर

साहित्यिक पठनीयता का संकट, भाषा की समस्या सम्बंधी चुनौती जैसी आज महसूस की जा रही है, वैसी चुनौती और संकट पहले हमने नहीं देखा है. एक सर्वे के मुताबिक दुनिया में लगभग सात हजार भाषाएं / बोलियां बोली जाती है. जिनमें लगभग पांच हजार भाषाएं/बोलियां लुप्तप्राय हैं. लिखित या प्रकाशित शब्दों पर निःसंदेह एक गंभीर संकट है, क्योंकि फिर भाषा-बोली को बोलना और सुनना एक समस्या होगी और इस, तथ्य को हम अपने आस-पास देख सकते हैं. हमारी भाषा हिन्दी दुनिया की बड़ी संख्या में बोले जाने वाली भाषाओं में से एक है- मगर बाजार के प्रभाव में इसके रूप-स्वरूप में आ रहे परिवर्तन भी गौर किए जाने योग्य हैं. लिखित भाषा एक प्रामाणिक दस्तावेज हैं-अपने समय का, अपने भाषा स्वरूप का. ऐसा नहीं है कि भाषा या बोली या संस्कृति में बदलाव लक्षित नहीं होते हैं-या मातृबोली में बाहरी भाषा का घुल-मिल जाना एक संकट है, बल्कि संकट यह है जब भाषा का मानक रूप, उसका सौंदर्य, उसकी परंपरागत विशिष्टताएं हमारे आचार-व्यवहार से निष्कासित हो जाए. प्रेमचंद के समय में लिखी या बोली जाने वाली भाषा आज नहीं है, पिछले दस साल पूर्व लिखी-बोली जाने वाली भाषा में आज खासा अंतर दिखाई दे रहा है. इंटरनेट और ‘फेसबुक’ जैसी सोशल साइट का प्रभाव स्पष्ट दिखता है.
जब-तक हमारी लोकबोलियां, लोककथाएं, लोकगीत इत्यादि की परम्परा छिन्न नहीं होती भाषा का संकट ऊपरी तौर पर ही लक्षित होगा. लेकिन ज़मीनी साहित्यिक धरोहर के कमजोर होने का अर्थ ही है- भाषा का संकट!
साहित्य और वह भी अपनी मातृभाषा से युवाओं का पृथक होना निश्चित ही दुःखद है. आज युवा-पीढ़ी, खासकर मध्यमवर्ग पढ़ने, लिखने और सोचने के लिए अंग्रेज़ी का सहारा ले रहा है. हिन्दी उसके लिए सिर्फ ‘कम्यूनिकेट’ करने की भाषा है, फिल्म देखने की, फिल्मी गीत गाने भर के लिए. यह सोच-विचार या शोध की भाषा नहीं. साहित्य कितने लोग पढ़ते हैं- यह आंकड़ा किसी संपादक या प्रकाशक के पास नहीं है. हां, उन्हें यह जरूर मालूम होगा कि लैटिन अमेरिका में कौन सा साहित्यिक आंदोलन होनेवाला है (अभी हुआ नहीं है).
कभी-कभी हिन्दी साहित्य का पाठक होने के नाते सोचना पड़ता है कि क्या यही वो हमारी हिन्दी है जो हिन्दी फिल्मों में बोली जाती है- मुम्बईया, कोंकणी टोन से लेकर इधर पूर्वी-भोजपुरी टोन तक और हमारा मनोरंजन करती है. तमाम दक्षिण के सुपरस्टार से लेकर कैटरीना कैफ तक सभी हिन्दी बोलना सीख लेते हैं और इसी हिन्दी की बदौलत वे करोड़ो कमाती/कमाते हैं.
फिर, हिन्दी कमज़ोर कैसे ? ना हिन्दी में पाठकों का पता चलता है ना लेखकों की रॉयल्टी का! अजीब विडंम्बना है! सत्य क्या है, या भ्रम ही भ्रम………!
मगर आश्चर्य नहीं जो परिवेश यहांॅ है- साहित्यिक दुनिया में. आश्चर्य तो तब होता है जब हिन्दी लेखक, प्रकाशक, संपादक, विचारक सभी संतुष्ट दिखते हैं. देखा जाए तो जब तक अपनी कमियों की तरफ हमारा ध्यान नहीं जाता, या हम अपनी तुलना अन्य से नहीं करने लगते, असंतुष्टि का विचार नहीं आता. हम संतुष्ट क्यों हैं यह समझ के परे है. (शायद छोटे-छोटे ग्रुप बनाकर हम अत्यंत सक्रिय हैं- वाह! वाह! करते हुए! हर गु्रप का अपना-अपना क्रांतिकारी लेखक/लेखिका हैं- भले पाठक न हो…)
इस कुंए से तभी निकलने की सोची जा सकती है जब हम अपनी दशा पर शर्म महसूस करें. (मगर कमबख़्त शर्म है कि हमें आती नहीं!)
खैर……!
यह संकट किसी एक का संकट नहीं. बात सिर्फ लेखकों, प्रकाशकों तक ही सीमित नहीं, सवाल वृहत निकाय, स्वाभिमान, परम्परा, अपनी भाषा और अपनी सोच का भी है. कोई एक उपाय, कोई एक जादू की छड़ी भी नहीं कि घुमाया और ‘रोग’ दूर….!
हमारे पास साहित्य में पाठकों का संकट न भी हो तो भी बदलते युग में और ‘चैटिंग’ और ‘फेसबुक’ में समाती युवा पीढ़ी जो कल इस मिट्टी की धरोहर है- उसकी सोच, उसकी संस्कृति का संकट अवश्य है. युवा पीढ़ी कहां जा रही है या कि वह पूरी तरह अपनी धारा से कट गई? वह कैसा मानव या कैसा नागरिक होने जा रही है. एक टाईधारी सैल्समैन ? एक कोट की उर्जा तो वहीं जा रही हैं और ऐसा करते हुए हम सिर्फ उन्हें ‘देख’ रहे हैं. बड़े तटस्थ भाव से. साधु भाव से. मजा कि हम लेखक व विचारक हैं. बौद्धिक हैं. कवि-कथाकार हैं.
युवा पीढ़ी बेशक कॉरपोरेट वर्ल्ड के लिए नौकरी करे, (फिलहाल क्या विकल्प हो सकता है ?) मगर अपनी सोच अपनी तो हो. वे जाने कि ‘हम’ क्या हैं ? हमारी परंपरा क्या हैं. हमारी विरासत कहांॅ से चली आ रही है ?
हमारी परंपरा में बहुत सारी बुराइयॉं भी हैं – जात-पात छुआछूत इत्यादि- वे इस माडर्न जीवन में हमसे छूट जाएं तो उत्तम! पर, परम्परा के निर्वाह में, आधुनिकता के चक्कर में…, इसे कौन स्वीकार करेगा. वे प्रबु़द्ध लोग भी नहीं जो कुंए में जी रहे हैं. (सच तो ये है कि कुंए में जाना भी एक आवश्यकता है, क्योंकि बाहर मजबूत साहित्यिक लठैत लाठी में तेल लगाकर बैठे हैं.आ जा बेटा! तेरे सर पर दूं एक गिनकर….,गंवार के लाठी कपारे बीच, कि बेटा कभी उठ ही न पाओ…)
सोचना पड़ता है कि आखिर वो कौन सी ताकत है जो गोरी कैटरीना को हिन्दी बोलने पर मजबूर करती है, बड़े प्रोड्यूसरों को महाभारत और रामायण पर फिल्में या टेली-फिल्में बनानी पड़ जाती है. बहुत सारी लोककथाओं पर सीरियल बनाए गये हैं.
हिन्दी करोड़ों लोगों की भाषा है मगर आश्चर्य कि इसका (साहित्यिक) प्रकाशन उद्योग निहायत ही असंगठित और बेजान! यहां औघड़ कबीर की वाणी याद आती है- साधो यह मुर्दों का देश…! कब्रिस्तान में जाओ तो कोई ना कोई भूत-प्रेत चलता-फिरता मिल जाएगा मगर हिन्दी की करोड़ो जनता एक सामूहिक कब्रिस्तान में सोती प्रतीत होती है- यहां कोई हलचल नहीं.
फिलहाल लेखक यह विचार करें कि क्यों न अपनी कहानियां एक थ्रीलर की तरह लिखें. भले ही वे किसी सामाजिक एजेंडे पर लिख रहे हों, स्त्री विमर्श कर रहे हों, पुरूष विमर्श कर रहे हों, एक-दूसरे का सर फोड़ रहे हों, जो भी विषय हों, वे ‘लिटररी थ्रीलर’ लिखने पर विचार कर सकते हैं.
थ्रीलर या रोमांच पर थोड़ा विचार कर लेना सही होगा. असल में कहानी में जो ‘कहानीपन’ होता है वो पाठकों को रोमांचित करने के लिए होता है. वरना हम कहानी के प्रति क्यों आकर्षित होंगे. कहानी तो तभी बनती है जब किसी सामान्य सी घटना में असामान्य बात बता दी गयी है. या घटना ही इतनी आसामान्य है कि उसे बताने के लिए किसी तकनीक की ज़रूरत महसूस नहीं की गयी. सीधी घटना ही पाठकों को रोमांचित कर रही है. जैसे एक चोर की कहानी कि कैसे उसने सेठानी के गले से हार चुराया-खासकर तब जब सभी जाग रहे थे. कोई स्त्री बाज़ार गयी और खरीददारी कर वापस घर आ गई, घर में बच्चों के संग टीवी देखने बैठ गयी, यह कहानी नहीं हुई, यह भी कहानी नहीं हुई कि एक व्यक्ति रिटायर हो गया और घर के बाजू में एक परचून की दुकान खोल लिया, या खूब कमाए पैसों से समुद्र किनारे रहने लगा. इसमें कोई घटना नहीं. कहानी तब बनेगी जब बाजार जाती स्त्री के साथ अनहोनी होती है, सेल्समैन ठगी करता है – या छः सौ रूपए का बिल काटता है मगर वह स्त्री भुगतान हजार रूपए करती है. वह विरोध करती हैं और एक अलग सत्य, एक छोटा सत्य उजागर होता है. उसी तरह रिटायर पुरूष के जीवन में ‘मोड़’ तब आता है, जब उसे वहां कोई स्त्री मिलती है- दोस्ती होती है और एक कहानी में खूबसूरत ‘ट्विस्ट’ आता है- उम्र के इस पड़ाव पर पुरूष के लिए असामान्य घटना है – प्रेम और रिश्तेदारी एक अलग कहानी बनाती है. यहां पुरूष और स्त्री दोनों का पृथक अपना आंतरिक संसार बनता-खुलता है.
थ्रीलर आवश्यक नहीं कि जासूसी कहानियों की तरह लिखा जाए पर एजेंडाबद्ध रचनाएं जैसा हिन्दी साहित्य में घिसे-पिटे तरीके से लिखी-छापी जाती हैं- कहानियॉं वे भी नहीं हैं. स्त्री लेखिका है, स्त्री है तो पुरूष द्वारा शोषित! वह कार्यालय में काम करती है तो सहकर्मी उसे ‘कुदृष्टि’ से देखेंगे ही, बॉस उसे अपने चेम्बर में बुलाएगा ही, पति उस पर लानत भेजेगा ही, अपशब्द कहेगा ही. वह जिससे शिकायत करने जाएगी वह भी पुरूष होगा, उसकी महिला सहकर्मी मित्र भी उसे ‘चलता है’ कहकर चलता कर देगी क्योंकि ऐसा तो होता ही है. संभव है जीवन में ऐसा होता हो, कटु सत्य है, मगर यहांॅ एक कहानी बन तो जाती है मगर सिर्फ बनती भर है. ऐसे यथार्थपरक हिन्दी की सैकड़ों कहानियॉं लिखी व छापी जाती हैं.(पल्प फिक्सन की तरह ?)
जीवन का यह सत्य पाठकों को पढ़ते हुए ऐसी कहानियांॅ नकली लगती हैं. इस पर विचार आवश्यक है. असल में यह वह यथार्थवादी ढॉंचा है जिसके सॉंचे में ढालकर आधुनिक कथाएं गढ़ी जा रही हैं.
सार संक्षेप में कि पाठक इन कहानियां के अंजाम जानता है – पाठक उन कहानियां के अंजाम जानता है जो लोकथात्मक तरीके से लिखी जाती हैं कि नायक जीतेगा ही- कि हनुमान पहाड़ उठा लाएंॅगे और लक्ष्मण को प्राण मिलेगा. पर यहांॅ एक फर्क है- जीवन के प्रसंग और कथा कहने के तरीके में.
अब ऐसे सामाजिक सत्य किस तरह लिखे जाने चाहिए ? इस पर यही कहना समीचीन प्रतीत होता है कि लेखक स्वयं अपना तरीका इज़ाद करे. वह अपनी कथा के साथ अपने चरित्रों के साथ कैसा बर्ताव करना चाहता है – वह बेहतर जानता है. फिर यह कला/साहित्य का क्षेत्र है जहॉं अनंत संभावनाएं हैं.
थ्रीलर लिखने के कई तरीके हैं – कुछ लेखक ‘पेज टर्नर’ किताबों की तरह लिखते हैं – अर्थात् हर पृष्ठ में रोमांच मौजूद रहता है. जैसे रमेश और सुरेश स्कूल से भागकर फिल्म देखने जाते हैं. सहपाठियों से किस तरह बहाना बनाते हैं, किस तरह स्कूल कैंपस से निकलते हुए सबकी नज़र बचाते बस अड्डे पहुंचते हैं- जहांॅ स्कूल ड्रेस में सबकी निगाहें उनकी ओर जाती है. यही हाल उनके सिनेमा हॉल तक पहुंचने पर होता है. उनके बाहरी और भीतर द्वन्द के लिए इस प्लॉट में खूब संभावना है. हास्य, जीवन का सच, स्कूल लाईफ में आजादी की तलाश आदि विषय सम्बंधी प्रश्न यहां उठाए जा सकते हैं, वह भी मनोरंजक तरीके से. यानी ‘थ्रील’ का इस्तेमाल करते हुए.
सिनेमा हॉल में लौटते हुए उनकी मास्टरजी से मुठभेड़ हो ही जाती हैं. (वे किस तरह उनका सामना करते हैं, वे क्या बहाना बनाते हैं- पाठक को रोमांचित करेगा.)
दूसरा तरीका है जिसमें कहानी सामान्य सी लगती प्रवाहित होती है – पाठक को कहानी पढ़ते वक्त लगता है जैसे कोई
साधारण सी बात, साधारण सी घटना का विवरण पढ़ रहा हो, मगर कहानी के अंत तक आते आते उसके समक्ष ऐसा रहस्य खुलता हैं कि वह भौंचक रह जाता है. ऐसा तो उसने सोचा भी न था. मनुष्य जीवन के भीतरी या बाहरी घटनाओं के मर्म यहॉं कुछ इस तरह खुलते हैं कि पाठक का पढ़ना सार्थक हो जाता है. साहित्यिक थ्रीलर ज्यादातर इसी टेकनीक से लिखे गये हैं. हालांकि उन्हें साहित्यिक थ्रीलर की श्रेणी में हमने अभी तक विचार नहीं किया है- महान कहानी ‘बड़े भाई साहब’ (प्रेमचंद) को याद कीजिए जब कहानी के अंत में बड़े भाई साहब का भावनात्मक पक्ष खुलता है. पाठक रोमांचित हो जाता है. ईदगाह कहानी में बालमन में जिस तरह तीन पैसे के साथ तमाम मेले में हामिद को संघर्षरत देखा जाता है, यथार्थ और बाल सुलभ इच्छाओं के बीच द्वन्द देखा जाता है वह किसी थ्रीलर से कम नहीं. ‘पूस की रात’ के अंत में ज्ञात होता है एक दुर्लभ मगर कटु सामाजिक सच हमारे सामने खुल गया है. ‘सदगति’ में कोई कल्पना भी नहीं कर पाता कि यह ‘सद्गति’ कैसी होगी. ‘कफन’ में तो बिल्कुल आसामान्य सी घटना है जिस पर आज तक विमर्श जारी है. अमरकांत की ‘जिंदगी’ और ‘जोंक’ में बिल्कुल कथा के अंतिम वाक्य से ही कहानी का वास्तविक मर्म, या कहें जीवन का सत्य उजागर होता है. मोपासां की ‘द रिंग’ और उनकी अधिकांश कथाएं उसी तरह बुनी गयी हैं. अतः कहानी में क्या होगा के भाव के साथ-साथ कहानी का अंत कैसा होगा, वह अज्ञात ही रहता है. और यही कहानी का आवश्यक तत्व है. चाहे वे कहानियां साहित्यिक हों या पल्प फिक्सन!
इन तमाम कहानियों में लोककथाओं के तत्व मौजूद हैं. इसलिए चाहे जितनी बार पढ़ी जाएं, सुनी जाएं कम हैं.
इधर इस सनातन तत्व के विरोध में आधुनिक लेखन में कहानियों में ‘स्लाईस ऑफ लॉइफ’ की तकनीक ने कहानीपने का बहुत कबाड़ा कर दिया है. दुनिया और देश में चंद दर्जन भर लोगों द्वारा इसे एक ‘मानक’ या स्टैंडर्ड मान लिया गया है कि कहानी ये ही है. असल में, इसने सिर्फ एक ही काम किया है- आम पाठकों को साहित्य से दूर करने का. सच तो ये है कि ये सफल इसलिए हुए कि लोगों ने इसे नये प्रयोग के तौर पर पढ़ा, मगर आनेवाली पीढ़ी ऐसी रचनाओं से तुरंत किनारा कर लेती हैं.
प्रयोग से परहेज नहीं, मगर कोई इक्का-दुक्का प्रयोग धारा के विपरीत जाकर सफल होता है तो उसे मानक मान लेना हमारी भूल होगी.
इस तरह थ्रीलर टेकनीक शिल्प के स्तर पर, चरित्र या विषय के भीतर प्रवेश के स्तर पर एवं अंततः चरित्र के मानस या आत्म तक पहुंचने के लिए आवश्यक द्वन्द- ये अंतिम ऐसा थ्रीलिंग तत्व है जो कहानी के रूप या स्वरूप के स्तर पर घटित न होकर चरित्र या कहानी के बिल्कुल भीतर घटित होता है. जिसे ज्यादातर हम आत्मा का द्वन्द कहते हैं, द्वन्द या स्व से संघर्ष नाम देते हैं. इनका स्वरूप पूरी तरह थ्रीलिंग होता है क्योंकि ऐसे प्रश्न चरित्र के साथ-साथ पाठक के भीतर भी उसी समभाव से आंदोलित होते हैं. यही वो स्थल है जहां एक साधारण साहित्य ‘क्लासिकल’ बन जाता है. ये दृश्य ही मानव धरोहर है-आत्मा को जगाने वाला, प्रेरक और कहे तो वास्तविक साहित्य! यह सच ऐसा सच होता है कि पाठक का न केवल विवेक जागृत कर देता है बल्कि जीवन या विश्व को देखने का नज़रिया ही बदल जाता है. चाहे वो सच सामाजिक सच हो या आत्मिक-इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. मगर ऐसे सत्य का प्रकटीकरण ही बड़ा थ्रीलिंग होता है.
उदाहरण के तौर पर यही कहना चाहूंगा कि हमारी तमाम पौराणिक विरासत इस थ्रीलिंग तकनीक से भरी पड़ी है. महाभारत से अधिक ‘थ्रीलर’ शायद ही दुनिया में कोई अन्य साहित्य हो. रामायण में भी इसके सुन्दर प्रयोग हुए हैं पर सर्वश्रेष्ठ थ्रीलर का उदाहरण मैं दो उदाहरणों से स्पष्ट करना चाहूंगा. वैसे तो तमाम महाभारत कथा शुरू से आखिर तक रोमांच से भरी पड़ी है – इस कथा में रूप से लेकर पात्र, चरित्र के अन्तस तक ऐसा कोई कोना नहीं जहांॅ थ्रीलर कथाएं नहीं कही गयी हों. कल्पना कीजिए कौरव-पांडव आमने सामने अपनी-अपनी सेनाओं के साथ खड़े हैं. कृष्ण अर्जुन को युद्ध स्थल के बीच लाते हैं जहां उनके शत्रु सामने दिखते हैं- जिनपर अर्जुन को बाण चलाना है. कहना न होगा कि गुरू, पितामह इत्यादि अपनों को देख अर्जुन धनुष रख देते हैं. अब कृष्ण की बारी है – अर्जुन को कर्तव्य-अकर्तव्य का पाठ पढ़ाने की.
कृष्ण अतिमानव थे, अर्जुन के भीतर चल रहे द्वन्द को समझना उनके लिए आसान था – इसलिए उसे समझाना और अर्जुन को कर्तव्य पथ पर लाना भी उनके लिए सहज कार्य ही था पर, महाकवि ने इस अल्प समय में जो ‘गीता ज्ञान’ दिया वह समयातीत साबित हुआ. वैसे तो उस अल्प समय के गूढ़ ज्ञान को हम आज तक समझने का प्रयास कर रहे हैं और आगे भी यह सिलसिला जारी रहेगा. मगर कथा टेकनीक के तौर पर यह दृश्य आज तक मानवता को रोमांचित कर रहा है- हमारी आत्मा, हमारी संवेदना, हमारी बुद्धि को. कुछ लोगों का ख्याल है कृष्ण ने जादुई प्रभाव से सूर्य का ढलना, अर्थात् पृथ्वी का घूर्णन तब-तक के लिए रोक दिया था जब-तक अर्जुन ने दुबारा गांडीव न उठा लिया. अगर ऐसा था तो वाकई इससे अधिक थ्रीलींग और क्या हो सकता है. वैसे देखा जाए तो कृष्ण अतिमानव थे और अर्जुन श्रेष्ठ मानव- जैसा महाकाव्य में बताया गया है. अतः संभव है मात्र एक शब्द से भी कृष्ण अपनी बात चक्र की तरह भेदते हुए अर्जुन के हृदय में बात का मर्म समा सकते थे. मगर- महाकाव्यकार-आम लोगों को गीता का पाठ पढ़ा रहा है. अतः समय का ठहरना जरूरी है. क्योंकि गीता ज्ञान सुनते हुए ‘समय’ स्थिर हो जाने का ही अहसास होता है – और यह थ्रीलर है. सबसे बड़ा थ्रीलर. यही समय यहॉं हमें बताता है कि समय-चक्र कहीं नहीं घटता. वह बाहर नहीं हमारे भीतर है. हमारे भीतर समय-चक्र है, हम बीतते हैं, हम रीतते हैं- दुनिया का सूर्य या चांॅद सिर्फ एक आईना भर हैं.
थ्रीलर का दूसरा सुन्दर उदाहरण रामायण में लक्ष्मण के तीर लगने के उपरांत हनुमान द्वारा राजवैद्य सुशैण से वार्तालाप, उनकी सेवा लेना, संजीवनी लाने आकाश मार्ग से उड़ जाना- मात्र अगले दिन के सूर्योदय तक का समय उनके पास है. मार्ग में हनुमान को कई विघ्न-परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है, सुरसा, गुप्तचर, संजीवनी पहचानने का संकट और अंततः वापसी पर भरत के बाण से घायल होना. यहां भी समय अल्प है और इसी अल्प समय में जीवन के गूढ़तम रहस्य उद्घाटित होते हैं. इन तमाम रूपकां का महत्व सनातन है जो आगे भी मनुष्य जाति को आत्मिक प्रकाश देता रहेगा.
इस तरह, हमारी महान् साहित्यिक विरासत में कथा का यह बुनियादी तत्व-जिसे ‘थ्रीलर’ शब्द से सम्बोधित करना चाहूंगा- भरी पड़ी है. आप चाहे तो जहां से, जैसा भी कोना उठा लें.
और अंत में, राजा जनक से जुड़ी एक लोककथा से अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा जिसमें थ्रीलर तकनीक से आत्म-दर्शन होते हैं. यहां इसलिए कुछ स्फीति चाहूंगा कि यह थ्रीलर व्यक्ति चरित्र के बिल्कुल भीतर घटित होता है- और आगे सत्य कहांॅ है- कैसा है- किस रूप में है- का सुन्दर तात्विक विचार प्रकट होता है. कथा इस प्रकार है-
एक बार राजा जनक किसी अमात्य से रूष्ट थे. सभासद़ों के बीच राजा जनक ने उसे देश निकाला की सजा दी. अमात्य ने विनम्रतापूर्वक राजाज्ञा स्वीकार की और पूछा महाराज! मुझे आपका दण्ड स्वीकार है मगर आपके राज्य की सीमा कहांॅ तक है- ताकि वह उस निर्धारित सीमा से बाहर अपना शेष जीवन व्यतीत करे. राजा जनक सोच में पड़ गये. वास्तव में यह गहरा सवाल था कि राज्य की सीमा से लगे कई सामंतों की सीमाएं थीं जो उनकी अधीनता तो स्वीकार करते थे, मगर स्वतंत्र हैसियत रखते थे. क्या उन सीमांत प्रांतों को अपना अधिकृत राज्य कहना उचित होगा ? राजा जनक सोच में पड़ गये और इसके सही उत्तर के लिए आमात्य को दूसरे दिन सभा में बुलवाया. राजा जनक रात-भर उस प्रश्न पर विचार करते रहे और दूसरे दिन इस निर्णय पर पहॅुंचे कि सीमांत-प्रांतों को अपना अधिकृत क्षेत्र कहना उचित नहीं होगा. अतः वह दोषी अमात्य चाहे तो उन प्रांतो में रह सकता है. मगर फिर उनके भीतर हलचल हुई कि क्या वे जो उनके अधीनस्थों के मार्फत क्षेत्र शाशित हैं- उन्हें अपना वास्तविक सत्ता-क्षेत्र कहना उचित होगा ? वे सब क्षेत्र नाममात्र के उनके अधीन हैं- सच तो यह है कि उन पर वास्तविक सत्ता अधीनस्थ राजाओं की है. राजा जनक उस दिन निर्णय नहीं कर पाए और सतत् चिंतन करते रहें ताकि दण्डित करते वक्त किसी के साथ अन्याय न हो. तीसरे दिन राजा जनक ने यह फैसला किया कि नहीं वे अधीनस्थ प्रांत भी उनकी प्रत्यक्ष सत्ता के अन्तर्गत नहीं आते मगर फिर सवाल उठा कि क्या उनका राज्य उनके अधीन है ? वहॉं भी तो आमात्यों का शासन चलता है जो उनके प्रतिनिधि हैं. तब यह फैसला लिया गया कि नहीं, यह नगर ही है जहॉं उनकी वास्तविक सत्ता मौजूद है और दोषी आमात्य मात्र नगर छोड़कर कहीं बस जाएं. मगर-राजा जनक की नींद उड़ गयी थी क्योंकि विचार करने पर उन्होंने पाया कि नगर का कोतवाल है जो नगर का वास्तविक शासक है राजा जनक नहीं. और अंततः राजा जनक ने यह माना कि यह राजभवन ही वास्तविक सत्ता क्षेत्र है- यही वो स्थल या क्षेत्र है जहांॅ उनकी पूरी सत्ता सार्वभौम रूप से मौजूद है मगर हरम की स्थिति आड़े आ गयी, राजा जनक का आधिपत्य अपने हरम में कतई नहीं था, वहॉं तो रानी की हुकूमत थी. तब अंततः यही विचार हुआ कि यह सदन ही है जहॉं उनकी वास्तविक सत्ता गोचर होती है- पर कहॉ ं! वहांॅ भी तो भॉंति-भांॅत के मंत्री और पार्षद-मौजूद थे जिनकी चलती थी. थककर राजा जनक ने एक दिन एलान किया कि यह उनका शरीर है जिस पर उनका अपना वास्तविक आधिपत्य है. पर बात जैसे उनके स्व के शरीर पर टिकी, उन्हें प्रतीत हुआ कि उनका मन तो सबसे प्रबल विरोधी है. उनका कहा तो सुनता ही नही,! जब स्वयं के मन पर जिस प्राणी का काबू नहीं वह कैसे अपना अधिकार क्षेत्र नगर, प्रांत या राज्य घोषित कर सकता है!
कहना न होगा कि तत्व ज्ञान की बातें भी यहांॅ थ्रीलर के साथ-साथ बड़ी सुन्दर रूपक में कही गयी हैं.
जीवन के जटिल और गूढ़तम प्रसंग को सरल व रोचक बनाकर कहना-यह हमारी परंपरा है. आज आधुनिक हिन्दी साहित्य अपने महान पोथियों के करीब होते हुए भी कितना दूर चला गया है, कहने की आवश्यकता नहीं!