काव्य-खदीजा खान

चलना है तब तक

चलना है तब तक
पैरों की थकन टूटकर
चूर न कर दे
पैरों तले रौंदकर
अपने ही छालों को
धूल न कर दे.
कड़ी धूप झुलसा भी दे अगर
काली धुंध बिखरा भी दे अगर
उखड़ती साँस जब तक
छोड़ न दे साथ
अंतिम आस जब तक
छोड़ न दे हाथ
चलना है तब तक.
जब तक बचा है
देह की मिट्टी में
एक भी बीज
जो बन सकता है वृक्ष
एक भी विचार
जो रच सकता है सृजन
बची हुई एक किरन
जो ला सकती है उजाला
जमी हुई एक बूँद
जो बन सकती है धारा
बस एक विश्वास है जब तक
चलना है तब तक.

स्वयं सिद्ध

ये किस मरूभूमि से
ग़ुजर रहे हैं हम
जहाँ न छाँव है
न गाँव है कोई
न कोई निशान
न पहचान है कोई
यहाँ ढूँढ़ना है स्वयं
अपना रास्ता
स्वयं को यहाँ
खु़द पुकारना है
कि-आओ
चले आओ
अपना ईमान
अपना मान बचाकर
इन तपती हुई राहों पर
सच की इन राहों पर
पर यहाँ न छाँव है
न गाँव है कोई
यहाँ अपना रास्ता
हमें खु़द तलाशना है!

बुज़ुर्गवार

एक उम्र दराज चेहरा
आँख की धुंधलाती रौशनी में
ज़िन्दगी की चमक
पूरे कुनबे का भूगोल
अपने इर्द-गिर्द समेटे
जीवन की साँझ को
यादों में लपेटे
उम्र की सिलवटों में
तजुर्बों की दमक
दुआओं की तरह
एक बुजुर्ग का साया
घर में रहता है
अपने धीमे क़दमों से
चहलक़दमी करते हुये
सबकी ख़बर रखता है
बस दुआ है यही
इस दुआ का हाथ
सबके सर पे रहे
काश! हर बुज़ुर्ग का ‘मान’
हर एक घर में रहे!


ख़दीज़ा ख़ान
धरमपुरा न0- 1
चित्रकोट रोड
अशोका पार्क के पास
जगदलपुर (छ.ग.)
494005