काव्य-श्रीमती गुप्तेश्वरी पांडे

गुलदान

पहली मुलाकात
ससुराल में पति से
शादी के बाद जब
हाथों में गुलदान लिए
किसी चहकते पंछी की तरह
शादी की उमंग
नई दुल्हन पर इम्प्रेशन की चाह
और मां को पटाने का तरीका
कि हमें बाहर जाने की अनुमति दे
पता नहीं क्यों सूझी
उन्हें गुलदान की बात
बड़े प्यार से बुलाकर मुझे
जब निहारते हुए
गुलदान आगे बढ़ाया
तो मैंने भी
लजाते हुए उनके पास आकर
घूंघट थोड़ा सरकाया
गुलदान उनके हाथों से छिटक कर
जमीन पर बिखर गया
और एक अर्थपूर्ण हंसी के साथ
हम दोनों का चेहरा भी निखर गया

वसंत में युवा मन

सुबह की स्वर्णिम धूप
शाम की ठण्डी हवाएं
मन में
प्यारी सी चुभन का अहसास दिला जाती हैं
कभी तन्हाई काटने को दौड़ती है
तो कभी वही तन्हाई रास आती है
मन कभी प्रीतम से मिलने
उससे बातें करने
उसकी बाहों में सिमट जाने
जैसे मचल सा जाता है
पर तभी उसे दुनिया की दीवार
अपना परिवार
और उसको मिले संस्कार
एक मजबूत डोर से बांध लेते हैं
मन की यह अवस्था
बहुत ही कठिन
एक दुसाध्य-सा रोग बन जाती है
बहुत मुश्किल होता है जीना
जब मौसम वसंत का आता है


श्रीमती गुप्तेश्वरी पाण्डे
ग्राम एवं पोस्ट-जैबेल
जिला-बस्तर छ.ग.
मो.-09424286016