काव्य-कमलेश्वर साहू

क्या समय रहते जाग जायेंगे बच्चे ?

सदी का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है यह कि
बारूद के ढेर पे सो रहे हैं बच्चे
देख रहे हैं सपने
सुन्दर मीठे रंगीन पारदर्शी.

वह सब कुछ
जो देखा जा सकता है बचपन में
देख रहे हैं बच्चे..

बच्चे सब कुछ देख रहे हैं सपनों में
एक बारूद के ढेर के सिवा
जिस पर सो रहे हैं वे

बारूद का ढेर लेकर नहीं आए थे बच्चे
और मांगते भी नहीं
बच्चे तो रेत का ढेर मांगते हैं
घरोंदे बनाकर उजाड़ने के लिए
मांगते है शंख-सीपी खिलौने-गेंद जैसी चीज.

बारूद का ढेर तो
हम बड़ों की गलती है
हम बड़ों का काम है
विकास की विद्रूपता.

अब बेहिचक कहना पड़ेगा
बारूद का ढेर
हम बड़ों का रचा गया षड़यंत्र है
बच्चों के खिलाफ़
हम बड़ों का बोया गया दुर्भाग्य है.

मुझे इंतजार है
हमारे द्वारा बोये गये दुर्भाग्य
हमारे द्वारा रचे गये षड़यंत्र के खिलाफ़
बच्चों के द्वारा खोले जाने वाले मोर्चे का
फ़िलहाल बच्चे सो रहे हैं.

क्या समय रहते जाग जायेंगे बच्चे ?

सोचना

मैं चुप हूं
तुम्हें भी चुप रहना चाहिए

मैं सोच रहा हूं
तुम्हें भी सोचना चाहिए

और

चार साल का मासूम बच्चा
सोचने लगता है
पापा के बारे में
पापा की चुप्पी के बारे में
पापा की सोच के बारे में.

मित्रों!
कितना ख़तरनाक
कितना विस्फोटक हो सकता है
किसी बच्चे का चुप रहकर
यूं
इस उम्र में सोचना!

क्या कभी चखा है आपने बच्चे को ?

प्यारा होता है बच्चा
मीठा भी
बहुत ही मीठा
दुनिया की तमाम मीठी चीजों से
अलग होती है
बच्चे की मिठास
क्या कभी चखा है आपने बच्चे को ?
बच्चा बढ़ता जाता है जैसे-जैसे
मिठास में आती है कमी
कड़वा होता जाता है बच्चा धीरे-धीरे
हमारे समय में बच्चा बढ़कर
जवान होने के साथ
होता है कड़वा भी
क्या कभी चखा है आपने बच्चे को ?

नींद से जागा बच्चा

तेजी से बदल रही इस दुनिया में
बहुत तेजी से
बहुत कुछ खो रहे हैं बच्चे.
मसलन
नींद से जागा बच्चा
चाहता है
मां का प्यार
दुलार पुचकार.
नींद से जागा बच्चा
चाहता है मां का आंचल
मां की गोद
दूध से लबालब मां के स्तन.
पहले जो कुछ भी चाहता था
नींद से जागा बच्चा
मिल जाता था उसे.
अब कहां
अब तो बच्चे को
नींद से जागते ही मिलते हैं
कुर्सी में पसरे
चिन्तामग्न पस्त
सोच में गुम पिता
दरवाजे की ओट में खड़ी सहमी हुई मां!

बच्चा दूर की नहीं सोचता

बच्चा दूर की नहीं सोचता
सोचता है
अपने आसपास की चीज़ों के बारे में
अपने आसपास की दुनिया के बारे में
बच्चे के आसपास की दुनिया
बच्चां की अपनी दुनिया
जिसमें शामिल होते हैं बड़े
बड़े बनकर नहीं
बच्चे की दुनिया में
होते ही क्या हैं
सिवा मां-पिता फूल-पौधे
तितली-भंवरे चिड़िया-खिलौने
सपने कोमल और जादुई
बच्चा दूर की नहीं सोचता
दूर की सोचना तो
बड़ों का काम है
बच्चें का काम नहीं!
बच्चा
दूर की सोचने लगेगा जिस दिन
नहीं रह जायेगा बच्चा
यदि ऐसा हुआ
तो फूल नहीं रह जायेगा फूल
तितली, तितली नहीं रह जायेगी
नहीं रह जायेगी
चिड़िया, चिड़िया
खिलौने, खिलौने
सपने, सपने
इन सबके वैसा न रह जाने से
नहीं रह जायेगी दुनिया
वैसी कोमल और जादुई
रह भी गई तो
आधी-अधूरी
नीरस
रंगहीन!

कमलेश्वर साहू
702 साकेत कालोनी,
वार्ड-57 कातुलबोड़ दुर्ग छ.ग.
मो-9424109943