अंक-29 बहस-पूंजीवाद और पर्यावरण

पूंजीवाद और पर्यावरण

पूंजीवाद, तकनीक और पर्यावरण दुर्भाग्यवश एक ऐसा अनदेखा विषय है, जो हमारे अस्तित्व को ही समाप्त करनेवाला हो सकता है. निश्चित रूप से पानी खतरे के निशान से ऊपर बह चला है. पर सवाल ये है कि मनुष्य नाम का प्राणी जो समस्त कृतियों के लिए जवाबदार है, इस ओर क्यों सचेत नहीं हो पा रहा है..? ज्यादा से ज्यादा वह जल में आर्सेनिक और वायु में कार्बन मोनोआक्साइड और मिट्टी में अम्ल या क्षार तक बात कर चैप्टर क्लोज़ कर रहा है. यह कौन सा चुतियापा है या फिर उसके स्वार्थ ? स्वार्थ कहना स्वार्थ की बे-इज्जती होगी, ये उसके आगे अंधत्व है. अँधा कहना भी अंधे की बदनामी होगी, यह तो अंधरागिरि है…! आँख है, दिमाग है, लैब है, रिसर्च है, लेंस है, चश्मा है, दूरबीन है, एक नहीं हज़ार आँखें हैं, पर सालों को अपने सर का गंजापन नहीं दिखता और बाज़ार में मादरजात कंघी बेच रहे हैं…!
इस अंधी सभ्यता में यदि सबसे ज्यादा क्षति किसी की हो रही है तो वो खुद मानव है.
बच्चा अभी साल भर का नहीं हुआ कि ममता से भरी माताएं अपने बच्चे को बेबी निप्पल थमाने के साथ साथ स्मार्ट फ़ोन का कलरफुल नज़ारा प्रस्तुत कर देतीं हैं. अब बच्चा चुपचाप मुंह चलाने लगता है और उसकी निगाहें स्क्रीन पर, लाल-पीले रोचक दृश्य!
आज एक नहीं हज़ार, दूर नहीं पास अनेकों ऐसे उदाहरण, ज़िंदा उदाहरण आपको मिल जायेंगे कि बच्चा बगैर वीडियो देखे खाना नहीं खाता. बड़ी मुश्किल से सोता है. सोते वक़्त भी उसे स्मार्टवाला फोन चाहिए. बिना मनपसंद फोटो देखे उसे नींद नहीं आनेवाली. दिनभर मोबाइल मोबाइल करता है. बिना इसके मुंह में दो चम्मच भी नहीं डालेगा.
किशोरवय के प्रकाश, हरीश, उमेश, सुरेश या मिलिंद या पकिया या जानी, या जीवन…, दिन भर, रात भर लैपटॉप या स्मार्ट फोन..! मेरा बेटा तो दिनभर अपने कमरे से कहीं निकलता ही नहीं, पढता रहता है, बहुत सीधा है, कोई दोस्त नहीं.
ये है आधुनिक स्मार्ट फोन वाली मम्मी की ममता!
बेटा लैपटॉप को अपने लैप से छोड़ना ही नहीं चाहता. पोर्न से लेकर फुटबॉल तक, पेमेंट से लेकर प्लेसमेंट तक.., भूगोल की जलवायु से लेकर स्थानीय मौसम तक, और हो सका तो सोशल मीडिया पर आंटी आंटी- चाट चाट!
दोस्त-दोस्त, दुश्मन-दुश्मन सब खेल हाज़िर! गांजा, कोडेक, मारजुआना आदि ड्रग्स से भी ज्यादा खतरनाक!
ये आधुनिक उच्च सभ्यता के जो महल हैं न, वहाँ के बच्चे पैदल नहीं चलते, बैठे -बैठे ‘क्लिक’ करते हैं और ’औऊडर’’ हो जाता है. पे करो, आर्डर करो, डेलिवर हो गया.
क्रांति…क्रांति…! फास्ट…, ग्रोथ ही ग्रोथ..!
प्रे- पेड, पोस्ट- पेड ..सब! ऐसी दुनिया कहाँ..!
बड़े क़रीबी मित्र और सॉफ्टवेयर इंजीनियर सोनू कहते हैं कि वो एक दिन में 2 साड़ी यानी 10 मीटर से ज्यादा पैदल नहीं चलते.
वल्लाह…, क्या बात है! इनकी शान में चाँद सितारों की रौशनी बरसे!
सवेरे उठा, बिस्तर पे चाय, फिर बाथरूम, अटैच्ड, फ्रेश होकर अपने कमरे में ही पोहा या पाव-बटर- कॉफी का नाश्ता किया. कपडे पहने, कमरे में ही, बाहर बरामदे में ही बाइक, बिना किक किये चाभी से स्टार्ट…! और वे दफ्तर पहुंचे. दिनभर स्क्रीन के सामने. सभी काम बैठे बैठे. जब ये अपना पांवं लम्बा करते हैं, जम्हाई लेते हैं, अंगड़ाई लेते हैं, समझिये आराम कर रहे हैं.
दो साड़ी न सही, ये अति मानव चार साड़ी वाले हैं, इससे ज्यादा नहीं.
जब 12 साल के बच्चे को दिल की बीमारी हो जाये, 20 पहुँचते- पहुँचते डायबेटिक हो जाएँ, 25 पे हार्ट ऑपरेशन की नौबत आ जाये तो अचरज नहीं होना चाहिए.
सड़क का आवारा कुत्ता सायकल नहीं चलाता, शेर बाइक या कार नहीं चलाता. पंछी अपने पर फैलाते हैं और हवा में उड़ते हैं. तेलचट्टा, चींटी, मकड़ा अपने पांव का इस्तेमाल करते हैं. एक हम ही हैं जो सिर्फ 4 साड़ी में अपना जीवन समेट लेना चाहते हैं. womens replica watchquien invento el barco de vaporelf bar vape cream tobaccoelf bar 600handyhüllen deburga phone casesthe revolutionary r and m 6000 taking vaping to the next level
दुनिया में कैंसर, मोटापा, डायबटीज़, हार्ट प्रॉब्लम… इसके तथ्य इकठा करने में हमारी रुचि नहीं, खुद आप देख लीजिये. इनका कारण भी आपको पता है, मगर यह भी सच है कि दफ्तर से लौटकर 2 साल का बच्चा आपको परेशान न करे, यह आप भी चाहेंगे. भले ही वो वीडियो- गेम्स में मशगूल हो.. आप थके हैं, आराम चाहिए. बच्चे को कहानी कौन सुनाये, कौन बाज़ू के पार्क जाकर उसके साथ समय दे. एक गरम चाय मिल जाय बहुत है.
यहीं पर, ठीक यहीं पर पूंजीवाद का घात है, सीधे आपके पेट पर. नाभि पर, जहां हमारी धुरी है. अस्तित्व की धुरी! हमारे मूल्यों का केंद्र! हमारे मनुष्यता का कोर…! जब केंद्र ही नहीं, तो परेकेंद्र का क्या मतलब!
मगर नहीं, आज हमारी पहचान है- ए ग्लोबल सिटीजन. हम तो विश्व नागरिक ठहरे!
आज विश्व एक है. आज हम रूस या यूक्रेन किसी के साथ, जिसकी आपकी इच्छा हो, साथ हो सकते हैं. अफ्रीका, यूरोप, साइबेरिया या लन्दन कुछ दूर नहीं. एक क्लिक बस!
इस डिजिटल क्रांति पर क्यों न कुछ डिजिटल तोपों की सलामी हो जाए!
युद्ध में मृत लोगों, उनके परिवार के लिए श्रद्धांजलि, मोम मार्च, मतलब सहानुभूति दर्शाना कैंडल मार्च से..! राष्ट्र-राज्य की अवधारणा अब कहां, अब कहां हम यहां वो वहां. सब यहां के वहां, वहां के यहां हो चले. ग्लोबल गांव! डिजिटल दुनिया! ईमेल, हिमेल. शीमेल… फीमेल…! सारे मेल-मिलाप इनबॉक्स..!
बस हमारे कम्पार्टमेंट में कौन कहां रहता है, नहीं पता..
सोनू सिर्फ 2 मीटर चलता ही नहीं, 4 सेंटीमीटर अपने पत्नी-बच्चों के साथ बात भी नहीं करता. चाय पीनी होती है तो वाट्सअप कर देता है. कोई फरमाइश हो तो डिजिटल क्रांति ज़िंदाबाद! कोई कहानी, कोई घटना, कोई श्रद्धांजलि, कोई आदरांजलि भेजनी हो तो लिंक शेयर.
घर में मिंया-बीबी के अलावे सोना मोना दो बच्चे भी हैं. वे अब बड़े हो रहे हैं. मोना जल्दी बड़ी हो रही है. अब तो दो बेडरूम वाले घर से गुजारा नहीं होने वाला. सबके अपने- अपने कमरे, लेट-बाथरूम अलग अटैच्ड चाहिए. अपना सेल्फ, अपनी अलमारी, किताबों, कपड़ों के लिए. अपना-अपना लैप टॉप, अपने वाहन, टूव्हीलर या कार… क्षमतानुसार. सबके अपने-अपने बैंक एकाउंट्स, डेबिट क्रेडिट कार्ड, अपनी ज़रूरते अपनी बिलिंग.
ये है एक मध्यमवर्गीय परिवार की तस्वीर!
सब के सब ग्लोबल वल्र्ड के प्राणी हैं, खबरदार, यहां कोई लोकल नहीं…!
इसे कहते हैं इ-मेल और फी- मेल क्रांति …!
बस्तर पाति फीचर्स