कहानी-नई कमीज -सनत कुमार सागर

नई कमीज


’धड़ाम!’
’आह!’
मेरी कराहने की आवाज ही मुझे सुनाई दी। उठने की कोशिश की मैंने पर मेरा शरीर जमीन से ही चिपका रहा मानो किसी ने कीलों से ठोंक कर चिपका दिया हो। मात्र आंखें ही स्वतंत्रता से घूम रही थीं। पर उनकी मजबूरी थी कि वे पीछे घूम कर नहीं देख सकती थीं वरना जान जाती कि ये शरीर जमीन से चिपका किस कारण है।
जाने कितना समय निकल गया यूं ही पड़े पड़े। मैं तनावग्रस्त होता जा रहा था। वाशरूम के सामने की टाइल्स में पड़ा था। और मेरे साथ ये फिसलने की जो घटना हुई थी वह पेंट की चेन लगाते समय हुई थी इसलिये मैं लगभग अर्धनग्न सा था। शर्म अनुभूत हो रही थी पर शरमाना भी मुश्किल था। किसी के आ जाने पर क्या होगा मन विचार कर रहा था। और किसी के आ जाने की संभावना भी बहुत थी। कार्यालय का वाशरूम था।
तभी अचानक मेरा सारा शरीर झटके से उठ खड़ा हुआ। मैं खड़ा हो गया। सबसे पहले चैन अच्छे से लगाया। तब अपने कपड़े झाड़ कर साफ करने लगा। आइने में देख कर अपने कपड़े ठीक किया। चौंक पड़ा मैं। पेंट एकदम से गंदी लग रही थी और उसके मुकाबले कमीज एकदम साफ, मानो अभी के अभी पहनी हो। कमीज का खूनी लाल चटक रंग चमक रहा था।
कमीज का रंग निहार ही रहा था कि ऐसा लगा कि मेरा शरीर जरा बलिष्ठ हो गया है। ताकत भी अनुभूत हो रही थी। मैं फिर से चौंक उठा। मेरा शरीर चाचा चौधरी और साबू वाले साबू की तरह दिखायी पड़ रहा था। यानी छाती वाला भाग एकदम से बड़ा और पैर सिर तुलनात्मक रूप से छोटे नजर आ रहे थे।
कमीज की कॉलर और गर्दन के बीच से शरीर का सौष्ठव झलक रहा था। मैंने अपनी आंखों को मिचमिचाकर देखा, फिर से वही दिखायी पड़ते ही आंखों को अबकी बार उंगलियों से रगड़ा। दीवार पर लगे आइने को अपनी हथेलियों से पोंछा।
सबकुछ वैसा ही दिख रहा था। असहज भाव से मैं वाशरूम से बाहर निकला। अपने केबिन पर पहुंच गया हौले से किसी ने नहीं देखा, ये सोचकर चैन की संास ली।
’सर!’
मैं चिंहूक उठा। पल दो पल भी न लगे और ये सायरा आ गई।
’सर! इस फाइल में आपके साइन चाहिये।’ उसने मुस्करा कर कहा। ऐसा कहती हुई मेरे एकदम नजदीक ही आ गयी। मैं अपनी कुर्सी पीछे खींचता हुआ दूरी मेंटेन कर रहा था। और वो मेरे और नजदीक आ गयी।
मैंने अपने आंखे उठाकर उसकी ओर देखा वह अब भी मुस्करा रही थी। वह साइन क्या करवा रही थी बल्कि मेरे ऊपर लगभग झुक ही गयी थी। उसकी सांसों से निकलती खुशबू मेरी नाक के छिद्रों में समा गयी थी।
’बिन तेरे कैसे जिउंगी……!
मोबाइल की धुन ने मोहक शमा क्यों तोड़ दिया। इतने मुश्किल वक्त के बावजूद मन सोच रहा था। मैंने बगैर नंबर देखे सीधे पूछा -’हां, बोलो रीटा! कैसे फोन किया ?’
’……..’
’हां, भई लेता आउंगा। सुबह भी तो आपने कहा था। अब रखूं फोन, और कुछ काम तो नहीं है न!’
’….’
’ओके, हां रखो फोन रखो।’
उधर फोन रखते ही मैंने सायरा से पूछा -’कहां साइन करना है ?’
उसने अपनी मुस्कुराहट में जरा भी कमी न की। मुस्करा कर पूछा -’सर! आपको कैसे पता चला कि जिसका फोन आया है वो आपकी पत्नी हैं ?’
’सो इजी! उसके नंबर की डायल टोन अलग सेट कर रखा हूं। अब बताओगी कि साइन कहां करना है।’
मैं समझ नहीं पा रहा था कि मुझे चिड़चिड़ाहट क्यों हो रही है, पत्नी का फोन ऐन वक्त में आने से या फिर बहुतकुछ लुट जाने का अहसास!
सायरा की महीन मुस्कान अब भी उसके चेहरे पर थी। मैं उसे कनखियों से देख रहा था। और वह भी देखने को नजर घुमा चुकी थी। नजरें मिलते ही संकोच में डूब गया।
उसके जाते ही अपनी टांगों को फैलाकर हाथों को सर के पीछे ले गया। कुर्सी में झूलते हुये सोच में पड़ गया कि ये आज हो क्या रहा है। ये सायरा तो कभी पिछले दो बरसों में लाइन नहीं दी फिर आज कैसे मुझ पर गिरी पड़ी जा रही थी।
मेरे केबिन की नीले रंग की छत देख कर बेहद सुकून सा महसूस हो रहा था। अपना सर ऊपर ही किये रहने की इच्छा बलवती हो रही थी। नीले आसमान में बहते बादलों को देखना सम्मोहित कर रहा था। रूईदार बादल धीरे धीरे बह रहे थे, यूं लग रहा था मानों लगभग स्थिर हों।
अरे! बादलों के बीच ये छिपकली कैसे ? मैं झटके से उठ बैठा। एक ही पल में समझ आया कि मैं तो अपने केबिन में हूं।
पर वो बादलों के बीच का अहसास सिर्फ झूठ न था वो तो सत्य था।
तभी उस घूमती छिपकली ने अपना काम किया और मेरे कंधे पर अपनी कारस्तानी दिखा दी। मैंने अपनी कमीज से उस गंदगी को साफ करने हाथ फेरा पर मेरे हाथ में कुछ भी महसूस नहीं हुआ। कमीज भी साफ लग रही थी। मैंने पुनः हाथ फेरा, कमीज के हर ओर हाथ लगा लगा कर देखा पर नतीजा शून्य ही रहा।
’चलें सर! साढ़े सात बज गये हैं।’
सायरा की आवाज थी। मैं एकदम निढ़ाल पड़ गया उसकी आवाज सुनकर। पिछले दो बरस में कभी भी ढंग से बात न करने वाली सायरा की आवाज थी।
’सर! आज मुझे आप छोड़ देना घर। मैं आटो से आयी थी।’ उसने सर झुका कर मनुहार की।
’ह…हां, क्यों नहीं। उसी रास्ते तो मुझे भी जाना है। फिर किस बात की रिक्वेस्ट!’ मैंने पल गंवाये बिना ही कहा।
इस बीच मैं अपनी कमीज साफ भी करता रहा जबकि वह एकदम चकाचक थी वाशरूम के बाहर फिसलने के बावजूद और छिपकली महारानी की कृपादृष्टि के बावजूद।
मधुर स्मृतियों की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी यूं सायरा के साथ अपनी कार में चलने से। अचानक उसकी चुप्पी और स्मृतियों की बुनाहट में विध्न पड़ गया।
’सर! अगर आप बुरा न मानें और यदि आपके पास समय हो तो दस मिनट रूक कर के शहीद पार्क चौपाटी कुछ खा पी लें। आज मेरा मन जरा भी नहीं है कि घर जाकर कुछ बनाऊं और खाऊं।’
उसका बोलना और कार का रूक जाना एक साथ ही हो गया। मेरी नजरें खुद से ही मिल गयीं कार में लगे बेक मिरर पर। मन के लड्डू साफ साफ उछलते दिखायी पड़ रहे थे। अपने धड़धड़ाते दिल को थाम कर कनखियों से सायरा को देखा।
हम दोनों चौंक पड़े। हम दोनों ही एक दूसरे को कनखियों से निहार रहे थे।
’क्या लोगी सायरा!‘
सायरा ने खट से जवाब दिया उसे मालूम था कि यही पूछेगा सामने वाला।
’सर! मैं आज आपकी मर्जी से खाउंगी। जो पसंद आपकी वही मेरी भी।’
मेरे पांव जरा कंपकंपाये। शायद एक साथ इतनी सारी खुशी बर्दाश्त नहीं हो रही थी। चेहरा सफेद सा पड़ गया, ऐसा महसूस हुआ।
’क्या हुआ सर! तबीयत तो ठीक है न! इस ठण्ड में आपके चेहरे पर पसीना आ रहा है।’ उसने मुस्करा कर चिन्ता जतायी। मैं समझ रहा था वो मुझे मेरी कमजोरी पर मजा ले रही है। पर मुझमें वो हिम्मत न थी कि मैं भी उसकी तरह कर सकूं। एक तो चौपाटी की भीड़ में यूं लग रहा था कि कोई परिचित न मिल जाये। ऊपर से तमाम तरह के नाश्तों से उड़ती मसालों की गंध बेचैन कर रही थी। हर ठेले में लगी भीड़ यूं लग रही थी कि शहर का हर आदमी भूखा है या फिर चटोरा है। घर के खाने को छोड़ कर यहां पिला पड़ा है।
अंतिम शब्द सोचकर चेहरे पर हंसी आ गयी।
’मेरी कैसी सोच है।’ मैं बड़बड़ा उठा।
’सर! आपने कुछ कहा क्या ?’ सायरा अपने चेहरे वही मुस्कान अब संजोये हुये थी जो आफीस में थी। मैं उसके प्रश्न को नजरअंदाज करके खुद की जांघ एक जोर की चुटकी काटी ताकि पता चले की कि ये कोई सपना तो नहीं। जोर की चुटकी ने जोर का दर्द पैदा किया। मैं उछल पड़ा। सायरा एकदम से पास आयी और मेरे कंधे पर हाथ रख कर पूछी- ’क्या हुआ सर आपको ?’
उसके प्रश्नो ंसे दूर मैं उस पल को रोकने के प्रयास में जुट गया। पर क्या यह संभव था!
’सर! ये आपका दो प्लेट दोसा!’ वेटर ने आकर उस ’खास पल’ को रोकने के प्रयास को विफल कर दिया और सबकुछ निष्फल ही कर दिया।
दो प्लेट मसाला दोसा सामने आ गया था। चमचे और कांटे अपने स्थान पर ही बाट जोहते रह गये मैंने हाथों से खाना शुरू कर दिया।
’तुम्हारे परिवार में और कौन कौन हैं ?’ एकाएक मैंने सायरा से पूछा। वह भी उस प्रश्न पर रूक गयी और मुझे एकटक देखने लगी।
’यूं जानना चाहता था। कोई बात नहीं मत बताओ। अच्छा बताओ ये दोसा कैसा बना है ?’ मैंने एक ही पल में हथियार डाल दिये।
’कोई नहीं है। दो बरस पहले ही मेरा तलाक हो चुका है अपने पति से। वह भी शादी के दो माह में ही। प्रेम विवाह था इसलिये परिवार ने संबंध तोड़ लिये। मां तो गुजर गयी एक भाई है वह भी दूर ही रहता है। मैं अकेली ही जी रही हूं। पर किसी की सिम्पैथी नहीं लेना चाहती। अकेले निडर होकर जीना चाहती हूं।’ एक ही संास में सारी स्टोरी उसने सामने रख दी। मेरी उंगलियों में फंसा दोसे का कौर मुंह में नहीं जा पा रहा था। अजीब कहानी थी सायरा की। अचानक सारे विचार धराशायी हो गये।
’बिन तेरे कैसे जिउंगी….’ मोबाइल चीख उठा। मैंने मोबाइल बाहर निकालने की चेष्टा भी न की। शून्य में खोया रहा।
’सर..सर! आपकी मैडम का फोन है। उठाइये वो परेशान हो रही होंगी। काफी देर हो चुकी है।’
मैं यंत्रवत सा जेब से मोबाइल निकालकर ’हलो!….हां, आ रहा हूं। चौपाटी से कुछ लेता आउं ? उसके पास ही हूं…..ओके दोसा लेते आता हूं। ठीक है रखो।’
मन तो जरा भी न था। दो बरस की हसरत पूरी जो हो रही थी। पर अब मुसीबत को आमंत्रण नहीं दिया जा सकता था। दो दोस और पैक करवा कर वापसी पर था।
’सर! एक बात कहूं ?’ सायरा ने पूछा। मैं सर हिलाकर सहमति दी।
’सर! आपकी कमीज तो गजब की लग रही है। आप पर ये रंग बेहद खिल रहा है।’
सायरा की आंखों की एक खासियत थी जो उससे मिले पहले दिन से ही आकर्षित करती रही। और वो खासियत थी उसके मुस्कराने पर उसकी आंखें भी मुस्कराने लगती थीं। आंखों के असपास की चमड़ी सिकुड़ कर मुस्कराहट के साथ चढ़ जाती थीं।
’सायरा तुम्हारी मुस्कराहट के साथ आंखें भी मुस्कराती हैं।’ मेरे मुंह से बेसाख्ता निकल गया।
वातावरण मानों एकदम सुनसान सा हो गया। बाहर सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों, लोगों की आवाजें एकाएक खामोश हो गयी। सायरा का चेहरा उतर सा गया। वह अपनी सीट पर लगभग घुुस कर बैठ गयी। वह मुझे देख रही थी और मैं उसे, उसी बैक मिरर पर। अबकी बार न तो उसकी पलकें झपकी न ही मेरी। न तो उसने खुद का चेहरा दूसरी ओर मोड़ा न ही मैंने।
उसके घर के पास ही मेरी कार खड़ी थी और मैं उस कार में बैठा ही रहा। वो कबकी जा चुकी थी। अगर घर से घरवाली का फोन न आता तो वहीं ही खड़ा रह जाता।
आसमान का चांद अपनी पूरी ताकत से शीतल चांदनी फैला रहा था। सड़कों के किनारे लगे पेड़ भी ठिठुरते लग रहे थे। उनकी अवस्था से मुझे अपनी अवस्था का अहसास हुआ। कार के ग्लास बंद किया। बंद होते होते मेरा घर आ गया था।
गली में कार किनारे करते हुये हार्न बजा दिया था। पत्नी दरवाजा खोले इंतजार कर रही थी।
’अच्छा हुआ डियर! तुमने आज दोसा ले आया। जरा भी मन न था खाना बनाने का। मैं तो सिर्फ तुम्हारा इंतजार ही कर रही थी।’ दरवाजा बंद करते करते ही रीटा मुझसे लगभग लटक ही गयी।
’मुंह हाथ धो लूं जरा!’ मैंने मुस्करा कर कहा। वह मुझसे अलग होने का नाटक करती रही।
’अच्छा चलो पहले ये दोसा खा लें वरना खा नहीं पायेंगे एकदम ठण्डा दोसा।’ मैंने उसे अपने से अलग करते हुये कहा। मैं अपने बेडरूम में जाकर अपने कपड़े बदलने शुरू किये सामने आलमारी में लगा आइना मेरा चेहरा दिखा रहा था। आज वाकई में मेरा चेहरा कुछ अलग ही आकर्षण पैदा कर रहा था।
’ऐसा थोड़ी होता है। वहम है। ऐसे अगर रोज चेहरे बदलते तो दुनिया में हंगामा हो जाता।’ यह बड़बड़ाते हुये कपड़े उतार कर कपड़ा स्टैण्ड में टांग दिया। बाथरूम जाकर पैर धोये दिनभर जूते ढोते हुये पैरों की हालत खराब हो चुकी थी। एक पैर को दूसरे पैर से रगड़ रगड़कर धोया। चेहरे पर पानी की थपकी दी। अब एकदम तरोताजा महसूस होने लगा।
बाहर रीटा ने डायनिंग टेबल पर दोसा सजा कर रख दिया था। और खुद शुरू भी हो चुकी थी।
’बहुत भूख लगी है ?’ मैंने मुस्करा कर पूछा।
उसने मुझे गहरी नजरों से देखा और अपना सर हौले से हां में हिलाया। मैं उसकी हरकत पर मर मिटा।
’सुना डियर! अब ये घर बच्चों के बिना अच्छा नहीं लगता है।’
मैं चिंहुक उठा। उसका हाथ अपनी छाती से हटा कर उसे देखने लगा।
’अरे! ऐसे क्या देख रह हो। हास्टल से बच्चों को घर ले आओ। और कुछ नहीं कह रही हूं। तुम भी न!’
मैं खिलखिलाकर हंस पड़ा। और ठंडी सांस भर कर बोला -’शुक्र है भगवान का। वरना मैं तो घबरा ही गया था।’ रीटा मेरी छाती पर धौल जमाकर हंसती हुयी बोली।
-’और हां, मां को भी अपने भाई के घर से बुला लो अब वह यहीं रहेगी उनके बिना मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता। वो रहती हैं तो घर में रौनक बनी रहती है।’
’वाह रे मां वाली! मां है मेरी, और दर्द तुमको हो रहा है। मैंने आज तक नहीं कहा कि मुझे के बिना अच्छा नहीं लगता परन्तु तुम ये बात अनेक बार कह चुकी हो। तुम तो मेरी मां को मुझसे ही छीन लोगी। चलो सो भी जाओ। सुबह मां से फोन पर बात करते हैं।’
उसने अपनी बड़ी बड़ी आंखों से मुझे देखते हुये हौले से अपना सर हिलाया और नींद के आगोश में पहुंच गयी।
वो तो सो गयी थी पर नींद मेरी आंखों की गायब थी। रीटा से निबटने के बाद अब खाली हुआ मन सायरा में जा घुसा था।
सायरा का अचानक मुझसे यूं बात करना, ऐसा लग रहा था कि वह मुझसे जुड़कर मुझे अपना बनाना चाहती है। वरना दो बरस में कभी भी अपनी आंखें उठाकर मुझे नहीं देखी और आज अचानक पूर्ण समर्पण पर उतारू थी।
बेचैनी सी हुयी, मैं करवट बदला।
करवट बदलते ही रीटा का भोला चेहरा चांदनी रात की रोशनी में चमक उठा। फिर मां की याद आ गयी। बच्चों के प्यारे प्यारे चेहरे दिखने लगे। उनकी भोली भाली बातें याद आने लगीं। दिन में जो गुजरा वो एकाएक अपराधबोध जागृत कर दिया। पुनः बेचैनी होने लगी। करवट बदल कर फिर पुरानी स्थिति में आ गया।
उस करवट में आते ही सायरा उसका इंतजार करती बैठी मिली। उसकी मुस्कराती आंखें उसके साथ गुुजरी हुयी दुर्घटना, ये सब मुझे उसकी गोद में खींचे ले जा रहे थे। मैं एक अलग ही दुनिया में था जहां प्यार ही प्यार की बरसात लगातार हो रही थी।
उसका मेरे कंधे पर रखा हाथ अब तक रखा महसूस हो रहा था। कार में मिली नजदीकी अब भी महसूस हो रही थी।
बेचैनी का आलम बढ़ता ही जा रहा था। मैं झटके से उठकर किचन पहुंच गया। चूहों को डराने के लिये जीरो बल्ब जल रहा था। एक गिलास पानी लेकर एक ही बार में गले से उतार दिया।
कुछ पल यूं ही गिलास पकड़े गुुजर गये।
चांदनी रात की चांदनी खिड़की से नजर आ रही थी।
’जागते रहो। जागते रहो।’
दूर कहीं चौकीदार ने नारा लगाया। मैंने गिलास प्लेटफार्म में रखकर समय देखा।
’चलो अभी भी समय है नींद पूरी की जा सकती है।’ बड़बड़ाते हुये अपने पलंग पर पसर गया।
पर ये रात तो कत्ल की रात थी। बेचैनी और रीटा सायरा के बीच झूलाती हुयी सुबह तक ले आयी। अब खिड़कियों में सूरज का राज था।
बगल में देखा रीटा उठ चुकी थी और किचन से आवाजें आ रहीं थी। यानी वह नहा धोकर तैयार हो चुकी है। अगरबत्ती की सुगंध बता रही है कि वह पूजा भी कर चुकी है। यानी लगभग साढ़े आठ बज चुके हैं। बिस्तर छोड़ना ही पड़ा।
मंजन करके फ्रेश हो गया। फटाफट नहा धोकर तैयार भी हो गया। कपड़े पहनने बेडरूम पहंचा तो कपड़ा स्टैण्ड में कपड़े ही नहीं थे। यानी सुबह सबेरे कपड़े भी धुल गये थे।
’रीटा भी न, मशीन है मशीन। दिनभर खुद को घर के कामों में उलझा कर रखती है।’ कहते हुये उसका चेहरा याद आया और मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गयी।
’क्या बात है डियर! मेरे रहते किसे याद करके मुस्करा रहे हो।’ रीटा बेडरूम में घुुसती हुयी पूछी।
’तुम्हारे रहते कोई दूसरा यहां जगह बना सकता है क्या जानेमन?’ मैंने कहा।
’अच्छा! ये बात है क्या!’
’तो ? और क्या बात है ?’ मैंने मुस्करा कर पूछा।
’कुछ नहीं तुम्हारी मनपसंद कढ़ी और बाजरे की रोटी बनायी हूं। जल्दी से खा लो।’ रीटा ने मुस्कराते हुये कहा।
’अच्छा तो यही बताने इतनी दूर बेडरूम में आयी हो।’ कहकर उसकी ओर लपका।
’न…नहीं अभी दूर रहो। ये सब रात को। घर में मां नहीं है तो एकदम छुट्टे सांड हो गये हो। दूर रहो मुझसे खाना बना रही हूं देख नहीं रहे हो। साफ सुथरे ढंग से रहोगे तो घर में रिद्धि सिद्धि आयेगी। समझे न!’ दो पल रूककर फिर बोली।
’आओ पियो और आफीस फूट लो। समझे।’
’जी समझ गया मेमसाब!’ मैंने उसके सामने अपने हाथ जोड़े और हंसने लगा। वह अगले ही पल किचन में थी।
’मौसम है बहार का…………..’ मेरे मुंह से यह गाना निकल रहा था। एक हाथ स्टीयरिंग पर और दूसरा हाथ गियर पर था और नजरें बाहर आती जाती भीड़ पर थीं।
तभी मेरी नजर उसी फुटपाथ वाली दुकान पर पड़ी। जहां कपड़े बेचे जा रहे थे। उस दुकान को देखते ही कार के ब्रेक मानो स्वमेव ही लग गये। मैंने कार किनारे खड़ी की। कपड़े खरीदने वालों की भीड़ बातें कर रही थी।
’ये सब पुराने कपड़े हैं लोगों के पहने पहनाये हुये। विदेश में लोग नये कपड़े भी फेंक देते हैं। बाजार में नये फैशन के पकड़े आये और लोगों ने अपने कपड़े फेंकने शुरू किये।’ ’वो लोग तो औरतें भी ज्यादा समय तक नहीं रखते, फिर इन कपड़ों की क्या औकात!’
दोनों के हंसने की आवाजें भी सुनायी पड़ीं।
’लोगों से पुराने कपड़े खरीदने की दुकानें होती हैं वहां जाकर लोग अपने पुुराने कपड़े बेच देते हैं। उन्हीं कपड़ों को दलाल खरीद कर गरीब देशों में उंचे दामों में बेच देते हैं। जो ज्यादा पहने हुये नहीं होते हैं उनका भाव ज्यादा और जो ज्यादा पहने हुये पुराने से होते हैं उनका भाव कम। धो धा कर बढ़िया पेकिंग करके भारत जैसे बाजार में उतार देते हैं। और यहां कार से उतरने वाले भी इन कपड़ों को खरीद कर पहनते हैं।’
फिर दोनों की हंसी मेरे कानों में घुस गयी। घुस क्या गयी चुभ गयी। वो दोनों मेरा ही मजाक बना रहे थे। मेरे हाथ एकदम चटक लाल पेंट था जिसे पकड़ने के बाद वो हाथों से मानों चिपक गया हो, छूट ही नहीं रहा था।
’वहां जाने कौन कौन इन कपड़ों को पहना होगा पता नहीं। क्या मालूम किसी मरे हुये आदमी के कपड़े भी उठा लाते होंगे। उसकी आत्मा भी इसमें समायी होगी।’ इतना कह कर वो बात करने वाला अपने हाथ में पकड़ी कमीज फेंक दिया। उसके साथ वाला भी अपने हाथ में पकड़े पेंट को कपड़ों के ढेर में उछाल दिया।
पर मैं वैसा ही खड़ा रहा जबकि मेरे मन में भी उनके विचारों से सहमति थी।
’भैया! दे दूं क्या ये पेंट!’ काफी देर तक मुझे उस पेंट को पकड़े देखकर कपड़ा बेचने वाले ने मुझसे आखिकार पूछ ही लिया।
मैं कुछ बोलने की जगह उस पेंट को ही निहार रहा था।
’ओ भैया! क्या दिन भर दुकान घेर कर खड़े रहोगे ? जल्दी बताओ देना है या नहीं।’ दुकानदार ने लगभग मुझे चमका ही दिया। गुस्सा आने के बावजूद मैं निर्विकार भाव से खड़ा रहा।
मेरी हरकत पर वो दुकानदार मेरे पास आकर वो पेंट मेरे हाथों से खींच कर कपड़े की ढेर में फेंक दिया।
’जा भाई घर जा, एक घंटे से खड़ा खड़ा भेजा टााइट कर दिया। जब लेना होगा तब आना।
इतनी देर में वो पेंट कपड़ों के बीच विलुप्त सा हो गया। भारी कदमों से कार में आकर बैठ गया और ऑफिस की ओर चल पड़ा।
मुख्य द्वार से भीतर कदम रखते ही यूं लग रहा था कि मैं किसी नदी के सुनसान किनारे पर आ गया होउं। अपने केबिन तक पहुंचते हुये भी वहीं अनुभव बना रहा। टेबल पर अपना ब्रीफकेस रखा और कुर्सी पर पसर गया। अगले ही पल घंटी पर मेरी हथेली थी और उसके अगले ही पल ऑफिस प्यून सामने थे।
’सायरा मैडम को भेजो।’ मैंने पलांश में कहा। सामने रखे गिलास से पानी के दो घूंट मारकर गला तर किया। सामने लगी घड़ी पर नजर गयी। साढ़े बारह बज रहे थे। मैं चिंहुक उठा। घर से साढ़े नौ बजे निकला था। बीस मिनट का रास्ता और मैं साढ़े बारह बजे यानी लगभग ढाई घंटे में आफिस पहुंच रहा हूं। ढ़ाई घंटे उस फुटपाथी दुकान में गुजार दिये।
मेरी सोच चल ही रही थी परन्तु सायरा अब तक नहीं आयी थी। मन बेचैन था और वह थी कि अब तक आयी ही नहीं।
केबिन का दरवाजा खुलने की आवाज आयी।
’मे आई कम इन सर!’
आवाज वही थी परन्तु उसमें वो रस न था।
मेरे जवाब की प्रतिक्षा के बिना वह प्रवेश कर गयी।
उसके हाथों में फाइलें थीं। नजरें मेरे चेहरे पर थीं जिनमें किसी भी प्रकार के भाव न थे।
मैंने कहा। ’बैठो!’
’ठीक है सर! कुछ काम था क्या ?’ उसने प्रश्न पूछा। मैं उसके इस प्रश्न पर चौंक गया। अद्भुत प्रश्न था।
मैं पुनः बोला ’बैठो तो सही। इन फाइलों का बोझ उठाये क्यों खड़ी हो। शांति से बैठ जाओ फिर फाइलें भी निपटा देंगे।’
वह मेरे आग्रह और आदेश के बावजूद खड़ी रही। उसकी इस हरकत पर मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि उससे आगे और क्या बात करूं। विगत दो वर्षों का उसका रूखापन पुनः हरा भरा हो गया था।
पर कल की ही तो बात है, कल शाम की। इतनी जल्दी पलट गयी।
अब मुझे लगने लगा मुझसे ही कोई गलतफहमी हो रही है। कल कुछ हुआ ही नहीं था।
उससे फाइलें मांग कर जहां जहां साइन करने थे कर दिया। और वह साइन होते ही गधे के सर से सींग की तरह गायब थी।
मैं थका सा महसूस कर रहा था। चेहरा धोकर फ्रेश होने वाशरूम गया।
वहां सबसे पहले उसी स्थान पर नजर गयी जहां पर कल फिसल कर गिरा था। आज देखा वहां की टाइल फूट गयी थी।
’बापरे! इतनी जोर से गिरा था मैं!’ मेरे मंुह से निकला। ’बावजूद इसके कोई चोट नहीं, दर्द नहीं।’
आइना पर अपना चेहरा देखते ही चकरा गया। मेरा शरीर सूखा सा, गाल पिचके से और बाल रूखे से लग रहे थे। कहीं से भी ऐसा नहीं लगा कि मैं नहा धोकर और तैयार हो कर आया हूं। साबुन से चेहरा धोया। वहां रखी स्कीन क्रीम चेहरे पर रगड़ा। पावडर की एक डोज छिड़का। सेंट का फुहारा कपड़ों पर मारा।
कहीं इसलिये ही तो सायरा……!
नहीं ऐसा नहीं हो सकता। न तो एक दिन में ही चेहरा सुंदर हो सकता है न ही बदसूरत। जैसा है वैसा ही रहेगा।
पर ये आइने में दिखने वाला मरीयल से चेहरा मेरा तो नहीं।
मेरा तनाव बढ़ता जा रहा था।
तभी कॉमन वाशरूम का दरवाजा चरमराया। मैं अपने विचारों को रोककर आगंतुक का इंतजार करने लगा। दरवाजा खुलने के साथ ही आवाज भी आयी।
’सर! मैं जरा सायरा मैडम को घर तक लेकर जा रहा हूं। मैडम अपना पर्स घर में भूल गसी हैं। लेने जाना है। वो कह रही हैं मुझसे साथ चलने को।’ ऑफिस प्यून का दरवाजे से अंदर झांकता हुआ चेहरा जानकारी दिया।
मैं आश्चर्य से भरा हुआ दयनीय स्थिति में खड़ा था।
प्यून बगैर इंतजार किये मेरे मौन को स्वीकृति मानकर चला गया।
मैं झट से वॉशरूम से निकला और बाहर खिड़की से झांक कर देखा।
प्यून की स्कूटी पर सायरा बैठ रही थी। बैठ क्या रही थी वेताल बनी उस पर लटकी थी। उसके चेहरे की मुस्कराहट ठीक वैसी ही थी जैसी कल मेरे साथ कार में थी।
मैं अपनी किस्मत को कोस रहा था। तभी मेरी नजर प्यून पर पड़ी। उसके बदन पर चटक लाल खूनी रंग की कमीज नजर आ रही थी।
’अरे! यह तो मेरी कमीज है।’ मेरे मुंह से निकला।

सनत कुमार सागर