काव्य -धरनीधर सिंह

हंसना-जीवन का वरदान


हंसी पुष्प है जीवन का
मोहक और वरदायक
मानव की पहचान
प्रसन्नता सुरभि यह जीवनदायक
है सुधा सम मधुर
तरसते पाने का दानव-सुर
मिला न किसी अन्य प्राणी को


यह अमृतमय-नूर
नव-ज्योति है अंतर का
प्रेम सहज स्निग्ध ऋजु
मुखरित होता जब हास-हर्ष
हरता विषाद, विष-दंत-कटु
होता उपहास से से भला नहीं
तारे खगोल सम क्षणिक-लघु
आत्मभाव से जीकर हंसना सीखो
खिले जीवन का सच्चा सुमन मधु।
मुसकानों से प्रभा फैलती
निर्मल निश्छल, निर्वर मृदु
सुप्रभात की उषा बने
लेकर आये कल्पतरू
फूलों से प्रेमल, हंसना सीखो
भ्रमरों सा गुंजार करूं।
हंसते-हंसते जीना।
मरते क्षण भी हंसना सीखूं
बाल-सुलभ किलकारी भरूं।

धरनीधर सिंह
प्रबंधक
माता रूक्मिणी सेवा संस्थान
डिमरापाल,
जगदलपुर
मो.-9174690997