अंक-20- पाठकों से रूबरू-गांव एक सुगंधित हवा

गांव एक सुगंधित हवा

ये सांस ही तो लेनी है इस दुनिया में
फिर क्यों है यूं, भाग-दौड़ इस दुनिया में,
यूं दौड़-भाग कर बची-खुची सांसों को
किसके लिए व्यर्थ गंवायें, कब रूकें, कब समझें।
यूं तो दुनिया में पलायन का एक ही कारण होता है और वो होता है भूख। इस भूख के चलते दुनिया का भूगोल भी बदल जाता है और समाज भी। और तो और संस्कार भी, संस्कृति भी।
सदियों पुरानी मानवीय आदत कही जाये तो गलत न होगा कि भूख के चलते मानव का पलायन होता रहा है। मजबूरी और आदत में जमीन और आसमान का अंतर होता है। लगातार की विपदाओं का सामना करते भटकते हुए आदतन मानव पलायन करने लगता है। जहां रहता है वहां अपने लिए अनुकूलता क्यों नहीं खोजना चाहता है और क्यों नहीं मेहनत करके परिस्थितियों को अनुकूल बनाना चाहता है ? जबकि पलायन करते हुए जहां पहुंचता है वहां उसे अपने जीने, खाने, रहने के लिए मेहनत उतनी करनी होती है जितनी उसे अपनी जन्मभूमि में करनी होती थी। बल्कि कई बार तो मेहनत बहुत कम ही करनी होती है। फिर भी ?
मानव मन की उत्सुकता के चलते उसका पलायन होता है और फिर जहां पहुंचे, वहीं जमने की कोशिश। वास्तव में पलायन के सदियों पुराने कारण के अलावा वर्तमान में पलायन का महत्वपूर्ण कारण है जीवन में पैसा कमाने की शार्ट कट खोज! हर कोई चाहता है कि किस तरह अपने जीवन में जल्दी से जल्दी पैसा कमाये और आगे बढ़े। दूर के ढोल सुहावने होते हैं ये बात बाद में समझ आती है। तब तक तो काफी देर हो जाती है। गलती का अहसास होते ही शर्म, समाज के तिरस्कार की कल्पना वापसी के बचे खुचे रास्ते बंद कर देती हैं। नशे और बुराइयों का साथ भी वापसी पर रोक लगाता है।
बाजारवाद के आकर्षण में आदमी की जिन्दगी भी बिक जाती है। शहरों का आकर्षण, बगैर रोक-टोक के जीवन की चाहना, नौकरी को विशेष सामाजिक मान्यता, खेती और ग्रामीण रोजगार को योजनाबद्ध तरीके से तिरस्कृत बनाया जाना, मेहनत की जगह वाइट कॉलर जॉब की सामाजिक स्थापना में आदमी जाने कब जिन्दगी जीने की जगह अपनी कीमती जिन्दगी को खपाने लगता है उसे पता ही नहीं चलता। उसके मन में स्थापित झूठे अदृश्य मानस्तम्भ उसे जब तब समझाते रहते हैं कि अगर वो रूक गया तो दुनिया उसे धकेल कर गिरा देगी और फिर उसके ही ऊपर से चढकर आगे बढ़ जायेगी।
वास्तव में जिन्दगी है क्या ? सुखों को पाने की चाह में उन्हीं सुखों का उपभोग ही न करके दूसरे दुखों को आमंत्रित कर लेना? आखिरकार मानव की आवश्यकता है क्या ? इस विश्वव्यापी महामारी में करोड़ों लोगों की शहरों से वापसी, उनका अपने घर की लौटना; ऐसा नहीं लगता कि यही मानव जीवन की सच्चाई है ?
अगर मरना भी है तो अपने ’देश’ अपने ’गांव’ अपने ’लोगों’ के बीच ही मरना है। जिसके लिए सैकड़ों हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा वो भी अपने बच्चों, अपनी औरतों और बुजुर्गो के साथ। इस एक महामारी ने कितनी आसानी से जीवन का सच समझा दिया हम सबको। अपनी जमीन, अपने लोग, अपनी हवा, अपनों की प्रताड़ना, अपनों के बीच रूखा सूखा खाना ही इस जीवन का सच है। नहीं चाहिए हमें तुम्हारी ये ऊंची ऊंची अट्टालिकाएं, नहीं चाहिए शहरी लकदक उजाले, गांव के सूरज-चांद के उजाले ही हमारे लिए सबकुछ हैं।
शायद इस महामारी ने सबको अपनी अपनी औकात समझा दी है जिन्दगी के झूठे मुखौटे जो हमने खुद ही चेहरों पर लगा रखे थे, उतार फेंकने को मजबूर कर दिया है। मजबूर नहीं किया बल्कि हिम्मत दी है कि हम अपने इन झूठे मानकों को कुचल दें अपने ही पैरों से। अपनी गलती स्वीकार करने की ताकत दी है।
मानव को खुद की ओर मुड़ने का इशारा प्रकृति ने कर दिया है और अपनी ओर से धक्का भी दे दिया है। ये सबक बहुत समय तक अपनी पैठ बना कर रखेगा, ये तो निश्चित बात है। अब शायद उन्हीं बातों की चर्चा होगी जिसे अब तक पिछड़ेपन की निशानी साबित करने में जी जान से सभी लगे थे। अब जीवन का सच साबित करना होगा अगर किसी भी कारण से मौका मिला है तो।
यहां सबके सामने यहीं यक्ष प्रश्न मंडरा रहा है कि इतने सारे लोगों की घर वापसी को पुराने गांव कैसे झेल पायेंगे ? किस तरह से इतने लोगों को रोजगार और जीने का साधन मिलेगा ? किस तरह इनका भार सहन करेगी वह धरती जिसके भरोसे ये सारे लोग वापस आ गये हैं। ये रूकेंगे अपनी जन्मभूमि में, ये तो सौ प्रतिशत सच्ची बात है। समय की मार और सामूहिक वापसी ने उनकी शहरों की ओर न होने वाली वापसी पर मुहर लगा दी है। शहरों का क्या होगा ? वहां की फैक्टरियों का क्या होगा ? ये वक्त बतायेगा, पर इन करोड़ों जानों के बचने और बचे रहने की कोशिश, सामाजिक जिम्मेदारी आन पड़ी है।
वैसे तो जिस तरह शहर किसी को भूखा नहीं मारता तथ्य स्थापित किया गया था जबकि सत्य तो ये है कि गांव आज भी किसी को भूखा नहीं सोने देते हैं। आज गांवों की बदौलत ही इस भयंकर महामारी में भारत आत्मनिर्भर है। गांवों की मेहनत, खेती और खेती से जुड़े उत्पाद जो वास्तव में जिन्दा रहने के लिए आवश्यक हैं, उनकी हद से ज्यादा उपलब्धता वरदान बन गई है। जिस खेती को कपड़े खराब करने वाला बता कर, किसानों को निकृष्ट निगाहों से देखने का चलन बनाकर सामाजिक व्यवस्था बनायी गयी थी वही आज सबसे ऊपर और सम्मानित बनकर सामने आयी है। किसानों का वास्तविक सम्मान लोगों की नजरों में आज दिख रहा है जब शहर को भूख लगी है। गांव निश्चित रूप से किसी को भूखा मरने नहीं देगा पर इसके लिए कुछ उद्यम तो करना ही होगा। ग्राम रोजगारों को छोड़कर जाने वालों को फिर से उन रोजगारों को जीवंत करना होगा। फिर उस सूखे वृक्ष को पानी, खाद और प्रेम भरी नजरों से देखना होगा। उसे सहलाना होगा प्यार से, प्रकृति की गोद फिर से अपने बच्चों के लिए हरी भरी हो जायेगी।
वर्तमान दौर अजीबोगरीब है एक ओर जहर भी बेचा जाता है और दूसरी ओर उस जहर से बचाने के लिए उपाय भी किये जाते हैं। जैसे कि शराब, कीटनाशक, रासायनिक खाद। जीवन में जहां भी रसायन पहुंचा है वहां नुकसान ही हुआ है चाहे वह दवा के रूप में ही क्यों न हुआ हो। आज इसका जीवंत उदाहरण हमारे सामने है विश्वव्यापी महामारी से बचने में रसायन अभी हारे हुए है और प्राकृतिक उपाय अदरक, गिलोय, हल्दी, जीरा आदि ने महामारी के खिलाफ अपना मोर्चा सम्भाला हुआ है। आज देश में जैविक खाद के उत्पादों का बहुत बड़ा बाजार है। समस्त सक्षम समाज जैविक खाद के उत्पादों को अपनी जीवनचर्या में शामिल कर चुका है। अगर गाय के गोबर की खाद और नीम के पत्तों की दवा से अनाज और सब्जियां उगायी जायें तो इनको बहुत आसानी से बाजार में बेचा जा सकेगा।
इसी प्रकार गाय का शुद्ध दूध और घी का मार्केट है। अगर इसमें शुद्धता है तो मानकर चलिए इसे मुंहमांगे दाम पर बेचा जा सकता है। शहरों में मिलावट का मार्केट है लोग दूध के नाम जाने क्या पीते हैं उनको खुद ही नहीं पता है।
गौपालन एवं कृषि एक दूसरे के पूरक हैं। जैविक खाद की आपूर्ति गाय के माध्यम से होती है दूध घी आदि भी मिलता है। गोबर के कंडों में सूखे पत्ते और टहनी आदि मिलाकर ईंधन की व्यवस्था की जा सकती है। बैलों का प्रयोग करके डायनमों के माध्यम से बिजली पैदाकर बैटरी में एकत्र करके घरों को रोशन किया जा सकता है।
जंगल में पड़े पत्तों को झाड़ कर किसी गढ्ढे में भरकर खाद बनाई जा सकती है जिसे पैकेटबंद करके गमलों के पौधों के लिए बेची जा सकती है।
आज कल फूलों का बहुत बड़ा बाजार है। फूलों की खेती के साथ मधुमक्खी पालन किया जा सकता है। मदरस और फूलों से कमाई होगी। बचे और सड़े फूलों से खाद बनाई जा सकती है। या फिर सड़ने से पहले उनका अर्क निकालने के साथ अगरबत्ती निर्माण किया जा सकता है। अगरबत्ती का मार्केट इस देश में बहुत बड़ा है। बताने वाले तो बताते हैं कि अभी इसमें चिता की राख और अंगारों के चूरे का प्रयोग किया जाता है। क्या शुद्धता का मार्केट आपके आसपास नहीं है ?
वैसे भी गांव अपने आप में एक संपूर्ण इकाई होती है। एक दूसरे को रोजगार देते हुए बंधुत्व बढ़ाती भी है। गांव के नाई, बढ़ई, राजमिस्त्री, गाय चराने वाले, किसान, किराना व्यापारी, गौपालक आदि की चैन एक दूसरे को बांधकर रखती है। गांव के उत्पाद इतने हैं कि उनको बाजार हाथो हाथ मिल सकता है। महुआ शराब के अलावा कई जगह सुखाकर आटे के रूप में प्रयोग की जाती है। दवा के रूप में उपयोग की जाती है। नीम के पत्तों का अर्क दवा, कीटनाशक, टहनी दातून के रूप में उपयोग की जाती है। दातून के लिए नीम की खेती की जा सकती है।
यज्ञ सामग्री का बाजार कितना बड़ा है इस देश में। इस यज्ञ सामग्री में आम की लकड़ी, गिलोय, छड़िला, बेर, आदि का प्रयोग किया जाता है। क्या इन सामग्रियों की खेती द्वारा औद्योगिक इकाई नहीं बनाई जा सकती है ?
तेल साबुन में उपयोग की जाने वाली नई सुगंधियों और वनस्पतियों का उपयोग कर साबुन के मार्केट पर कब्जा नहीं जमाया जा सकता है ?
शहतूत, तेंदू, रामफल, सीताफल आदि कितने ही फल हैं जिनका आज के समय में व्यवसायिक उत्पादन नहीं हो रहा है जबकि इनकी डिमांड हर शहर में है, पैसे वाले लोग इसे शौक से खाते हैं। ड्रेगन फल आयात किया जाता है जिसने भी खाया होगा जानता होगा कि उसका स्वाद कितना विचित्र है फिर भी शौक से खाते हैं लोग। क्या शहतूत, काजूफल, जैसे फलों को कोई खाना नहीं चाहेगा ?
हमारे बस्तर में एक विशेष तरह का अनाज होता है जिसमें कैलोरी कम होती है और अद्भुत बात है इसे उगाया नहीं जाता बल्कि मरहान में उग जाता है। क्या ऐसे अद्भुत उत्पादों का उत्पादन नहीं किया जा सकता है ?
आज लौंग, काली मिर्च, इलायची केसर आदि का दाम कितना ज्यादा है। अगर इनका उत्पादन व्यवसायिक स्तर पर किया जाये तो इनके दाम भी गिरेंगे और लोगों को रोजगार भी मिलेगा।
पान के पत्तों के साथ उपयोग किया जाना वाला कत्था यानी खैर का पेड़, इसका उत्पादन किया जा सकता है।
गिलोय का जूस, आइसक्रीम, शरबत जैसे नवीन प्रयोग किये जा सकते हैं। गिलोय के और क्या उपयोग हो सकते हैं जो हमारे खान पान में आसानी से सम्मिलित किये जा सकते हैं, इस पर अनंत सम्भावनाएं हैं। खाने के शौकिन भारतीय समाज ने जब पिज्जा, बर्गर, ब्रेड जैसे बासी-तिबासी गैस बनाने वाले बगैर स्वाद के भोज्य पदार्थों का स्वागत किया है, हाथों हाथ लिया है तो फिर हमारे भारतीय टेस्ट को कैसे नहीं सर पर बैठायेगा। ये सुनहरा मौका है बल्कि भारतीय संस्कृति की सेवा के साथ भारत को विश्व पटल पर उभारने का। पूरा विश्व आज भारत की ओर अचरज से देख रहा है कि भारत के ये लोग क्या खाते हैं अपने दैनिक जीवन में, जो जान लेने वाली महामारी यहां पर कसमसा कर रह गयी है। ये सोच वर्तमान में कमाने के साथ ही साथ सेवा करने के लिए मौका है। अदरक, नींबू का अचार, आंवले का मुरब्बा, आम का मुरब्बा, न जाने क्या-क्या खाया जाता है इस देश में।
इन सबके अलावा लकड़ी के उत्पाद, बांस के उत्पाद टोकरी सूप, झाडू का प्रयोग लोगों ने इसलिए बंद कर दिया क्योंकि ये सब अब बाजारों में नहीं मिलता है। प्लास्टिक को गले लगाकर रोगों को आमंत्रित कर लिया है।
पत्थरों के उत्पाद सिल और लोढ़ा आज भी बिकते हैं।
जंगल में इतने उत्पाद होते हैं जो अपने आप उग कर अपने ही आप नष्ट हो जाते हैं। उनको कोई उपयोग ही नहीं कर पाता है। जैसे बस्तर के आम, इमली, महुआ, टोरा, तेखूर, पेंग, अगर इनका पूरा का पूरा उपयोग किया जाये तो बगैर किसी की नौकरी करे जीया जा सकता है।
यहां दो बातें मन में आती हैं कि अगर इतने सारे उत्पाद हमारे आसपास ही थे तो गांव के लोग शहर क्यों गये ? दूसरी बात मन में आती है कि ये सब बनाकर बेचा कहां जायेगा ? ये दोनों बातें विचारणीय हैं और महत्वपूर्ण भी हैं।
पहली बात का यह उत्तर कि गांवों से शहर की ओर पलायन होने का कारण क्या है ? पलायन का रोजगार से सीधा संबंध न होकर ये है दिखावा, शहरी आकर्षण और एक बार शहर जाकर तीन-तेरह में उलझ जाना, शहर से वापसी में शर्म महसूस होना। शहर जाकर तीन सौ रूपये कमा लेना और गांव में दो सौ कमा लेना, दोनों में कौन सा सुखकर है ?
शहर जाकर असुविधा में रहना, पानी से लेकर अनाज के लिए भागदौड़, भागती जिन्दगी में भागते जाना और इस बीच सोचने का मौका ही न मिलना। सपनों के सच होने के इंतजार में जिन्दगी ही सपने में बदल जाना।
मेरी बातचीत एक व्यक्ति से हुई थी जो शहर में किसी कंपनी का मैनेजर है और उसे पंद्रह हजार रूपया मिलता है। वो आई ए एस की तैयारी करने आया था और उसके दोस्त का सलेक्शन हो गया। वो तैयारी करते हुए शहर में काम करने लगा और फिर असफलता में गांव की ओर नहीं गया। क्योंकि इतने वर्षां में वह गांव के वातावरण और जीवन से हट सा गया था। उसके पास गांव में जगह है पर खेती करके आइ ए एस का प्रत्याशी कैसे घर वापसी करे। समस्या ये थी।
ठीक इसी तरह गांव के लोग शहर में उलझते जाते हैं। और गांव छोड़ते जाते हैं। गांव में दो सौ रूपया कमाने पर भी खर्चे कम होते हैं इसलिए उसका जीवन आसान होता है। परन्तु जाने किस दिवास्वप्न में खोया वह शहर में भटकता ही रह जाता है। दिल्ली में दसों दिन रहकर मैने देखा कि गंदगी और असुविधा के बीच, बगैर परिवार के लोग जानवरो ंसे भी गंदे ढंग से रह रहे हैं। उनको देखकर लगता है कि वे पोल्ट्रीफार्म के ब्रायलर हैं। जिनको खाना है इसलिए सिर्फ मांस का गोदाम बनाया जा रहा है। और इंसानों को काम करना है इसलिए सिर्फ जिन्दा रहने की सुविधा दी है। सड़कों में सोना, सुलभ शौचालय में फ्रेश होना, किराये के खाट पर सोना, दिन भर अपनी 3 बाई 5 की दुकान में खटते रहना, या रिक्शा खींचना, हमाली करना और फिर थककर नशे में डूब जाना। तिस पर भी गांव में रहना मंजूर नहीं। इतना तो कोई भी एक एकड़ में सब्जी उगाकर ही आराम से कमा लेगा और अपने बीवी बच्चों के साथ रहेगा। सरकारी स्कूल में बच्चा पढ़ लेगा। सरकारी अस्पताल में बीमार ठीक हो जायेगा। तो फिर क्यों शहर की दौड़ ?
पलायन का दूसरा कारण है आलस। अपनी जमीन पर मजदूर जाने क्यों काम नहीं करना चाहता है। सिर्फ नागा और छुट्टी। मरनी, त्यौहार और आलस। खेतों में काम करने से गर्मी लगती है परन्तु शहर की भट्टी के सामने शायद एसी जैसी हवा आती हो।
तीसरा कारण है लालच। सुविधाभोगी चीजों के मिल जाने की संभावना। जबकि दिवास्वप्न ही साबित होता है। गांव में ग्यारह बजे से काम करेंगे और शहर में सुबह आठ बजे से रात के आठ बजे तक। शहर में तीन सौ बहुत है पर गांव में पांच सौ चाहिए। वर्तमान दौर में गांव में खेती के लिए आदमी ही नहीं मिलते हैं। भवन निर्माण, सड़क निर्माण करने के लिए ठेकेदार भटकते रहते हैं। अनेक दुर्घटनाएं होती है कि ठेकेदार पिकअप में लेबर भर कर ला रहा था और पिकअप पलट गई।
बस्तर के लेबर ईट बनाने उडिसा जाते हैं और उडिसा के लेबर बस्तर में ईट बनाते हैं। ये कटु सत्य है। आप आकर देख सकते हैं।
खैर!
उत्पादों के लिए बाजार कहां है ? ये जमीनी सोच का दिमाग में आना आवश्यक है। क्योंकि उत्पादन आसान है पर बाजार मुश्किल है। दिल्ली में सब्जी ट्रेन से जाती है बिहार के गांवों से। क्या ऐसी व्यवस्थाएं हर जगह बनायी नहीं जा सकती हैं ? विकेन्द्रीकृत व्यवस्था में दलालों की भूमिका नगण्य हो जायेगी। और उत्पादक अपने उत्पाद खुद बेचेगा। जब एक मजदूर अपने परिवार के लिए शहर में 10000 रूपयों में काम कर लेता है तो वह अपने गांव में आठ हजार कमा कर संतुष्ट क्यों न हो। यानी उत्पादक अपने सामान की मार्केटिंग खुद करे। या फिर समूह बनाकर नजदीकी शहर जाकर घर-घर में अपना माल बेचे। क्वालिटी होगी तो माल बिकने से कोई नहीं रोक सकता है। किसी व्यापारी को अपने उत्पाद न बेचकर खुद बेचने पर लाभ उसे ही मिलेगा, भले माल कम बिकेगा।
शहर जाकर इंसानों का कीड़े-मकोड़ों में बदल जाने से अच्छा है कि गांवों में रूखी-सूखी के साथ आनंद से जीना।
गांवों की ओर लौटने की हिम्मत आज कोरोना ने दी है। अपने अपमान और अपने तिरस्कार को अपनी ऊर्जा बनाकर गांवों में फिर से नागर फांदने की जरूरत है। शहर के नाले की बदबू से ज्यादा अच्छी गांव के खेतों के कीचड़ और गोबर से आती खुशबू है। सनत जैन, संपादक बस्तर पाति