करमजीत कौर की कहानी-बीजी

बीजी

पहाड़ों में जिस तरह वर्ष भर मौसम ख़ुशगवार हुआ करता है कुछ ऐसा ही हमारे शहर का मौसम हुआ करता था। परन्तु समय ने करवट ली और यहाँ भी पर्यावरण मानवीय क्रियाकलापों से अछूता नहीं रहा। अब गर्मियों में यहाँ का तापमान भी 45-46 डिगरी तक पहुँच जाया करता है। गर्मियों के ऐसे ख़ुश्क दिनों में घर से बाहर निकलना बेहद मुश्किल सा लगता है। पर नौकरी करनी है तो सब कुछ सहना ही पड़ता है। और ज़िन्दगी की हर मुश्किल को सहजता से लें तो सब सरल हो जाता है, ऐसा मेरी बीजी कहा करती थीं।
बचपन से ही पिताजी की अपेक्षा मैंने स्वयं को बीजी के करीब महसूस किया। बेहद कर्मठ व्यक्तित्व। सारा दिन काम-काज में लगी रहने वाली बीजी। कल उन्हें देखा तो मन एक कोना भीग सा गया। बाहर बरामदे में कुर्सी डाले हर आते जाते को देखकर तसल्ली करती हुई बीजी का मन भी शायद भागदौड़ करने का होता है। सोचती हूंँ यही तो बीजी हैं जो सारी दोपहरी चहलकदमी करती थकती नहीं थीं। उम्र का ये पड़ाव मानों सबकुछ हाथों से ले उड़ा है। बेहद खुशमिज़ाज़, जितना पहनने ओढ़ने की शौकीन उतना ही खाने पीने की शौकीन। चौबिसों घंटे परिवार और दोस्तों के बीच रची बसी, खिलखिलाती जीवन से भरपूर बीजी।
गर्मियों की चिलचिलाती धूप में स्कूल की ओर दौड़ती मेरी गाड़ी की रफ़्तार से भी कहीं तेज बीजी के विचारों ने मेरे अंदर उथल पुथल मचा दी थी। वक्त कब किसी का साथ देता है वह तो अपनी रफ़्तार से दौड़ता सबकुछ पीछे छोड़ता जाता है। और इसी वक्त ने बीजी का सबकुछ जैसे छुड़ा दिया। डाक्टरों ने मिर्च मसाले, शक्कर, टमाटर जैसी हर चीज जो बीजी को प्रिय थी, उनसे परहेज रखने को कहा। पर बीजी जिस चीज से परहेज नहीं कर सकीं वो थी उनके इर्द-गिर्द घूमती हम सब के सुख-दुख की चिन्ताएं, वे अवसाद के क्षण जो शायद किसी के साथ बाँट नहीं पाती थीं। दो बार माइनर हार्ट अटैक को सहन कर चुकीं बीजी, आज भी जब पूरा परिवार कारों में सवार कभी होटल तो कभी पिकनिक और कभी सैर सपाटे के लिए निकलता तो पीछे नितांत अकेली खड़ी बीजी, शायद वैसा ही दिल पर झटका एक बार फिर से महसूस करतीं।
मेरा स्कूल आ चुका था। विचार एक झटके से मेरे दिल से अलग हो जाते हैं। प्रार्थना के लिए छात्रों की लाईन बनी हुई है। मैं गाड़ी वहीं करके नम आँखों से राष्ट्रगान के लिए वहीं सावधान खड़ी हो जाती हूँं, और फिर उपस्थिति रजिस्ट्रर लेकर बोझिल कदमों से कक्षा की ओर चल पड़ती हूंँ। उपस्थिति रजिस्ट्रर को खोलते ही हठात् बीजी का चेहरा मेरे पूरे अस्तित्व में समा जाता है, उपस्थिति लेना भूल फिर बीजी की यादों में गुम होने लगती हूंँ।
हम जब पढ़ा करते थे, हमारे स्कूल आने-जाने में बीजी कितनी तत्परता से सहयोग दिया करती थीं।
एक कक्षा भी नहीं पढ़ीं बीजी हम सभी को स्नातकोत्तर करा पाईं थीं। कभी भी उन्हें हमारे लिए शाला तक नहीं आना पड़ा था। कभी किसी भी तरह की शिकायत का मौका हमने शिक्षकों को नहीं दिया। बीजी के दिये संस्कारों ने हमें कभी उदण्ड नहीं बनाया। परीक्षाओं के समय हमारे सामने कुर्सी पर चुपचाप बैठी बीजी लाख कहने पर भी सोने नहीं जातीं, कहतीं यदि मैं सो गई तो तू भी सो जायेगी। फिर तेरी परीक्षा की तैयारी कैसे पूरी होगी। और आज…..हम शायद एक रात भी बीजी के साथ जाग नहीं पाते हैं। उन्हें नींद की गोली खिलाकर खुद अलमस्त सो जाते हैं।
मेरी हर जरूरी-गै़र जरूरी जिद को पूरा करती बीजी हर समय मेरे आसपास रहतीं। उनके साथ मानसिक और आत्मिक रूप से जुड़ी हुई मैं उनसे दूर जाने की कल्पना मात्र से घबरा जाती। कहा करती ’’बीजी आपसे दूर नहीं जाना है मैंने।’’ तो बीजी बेहद लाड़ से कहती ’’ठीक है तेरी शादी मैं यहीं अपने पास करूंँगी।’’
और ईश्वर ने मेरी सुनी भी। मेरी शादी नई दिल्ली में हुई पर मैं यहीं बस गई। अपनी बीजी के पास। इन्होंने अपना काम यहीं शुरू कर लिया। सबकुछ मेरी इच्छानुसार हुआ। मुझे ऐसा लगने लगा कि बीजी के पास-पास रहकर भी मैं एकाएक बीजी से बहुत दूर हो गई हूँं। मैं चाहकर भी बीजी को वो खुशियांँ नहीं दे पाई जो उन्होंने मुझे दीं। उनकी तक़लीफ में उनके पास रहना चाहा तो घर अपना सा नहीं लगा, महसूस हुआ शादी के बाद सचमुच घर ही नहीं, घर के लोग भी पराये हो जाते हैं।
आँसुओं से लबालब आँखों को स्टूडेंट की नज़रों से बचाकर उपस्थिति रजिस्ट्रर खोलकर उपस्थिति लेना शुरू करती हूंँ।
क्या बात है नरेश बहुत दिनों से अनुपस्थित है, पूछने पर जवाब मिलता है, उसकी माँ अस्पताल में एडमिट है, अतः वह पिछले पंद्रह दिनों से स्कूल नहीं आ रहा है। हठात् बीजी फिर नरेश की शक्ल में मेरे सामने आ जाती है। पिरीयड समाप्ति की घण्टी बजती है। अफ़सोस स्टूडेंट को आज कुछ नया नहीं समझा सकी। पर एक बात समझ कर आ रही हूंँ कि मैं भी बेटा होती तो शायद उनके पास पंद्रह दिन रूकने का वक्त निकाल सकती थी। फिर सोचती हूंँ ये सब मन का छलावा मात्र है, बीजी के दो बेटे बीजी के पास ही तो हैं, वे दिन के बारह घंटों में, क्या बारह मिनट भी बीजी को दे पाते हैं ? और बीजी भी बस इतना सा वक्त ही उनसे चाहती है। पर चाहने से क्या होता है, बीजी के बेटों की अपनी जरूरतें हैं। पत्नी और बच्चों के बीच खपते, वे माँ को कहाँ वक्त दे पाते हैं।
वक्त न दे पाना उनकी मजबूरी है और उनका साथ चाहना बीजी की विवशता है। ग़लत दोनों ही नहीं हैं पर मुझे सबकुछ ग़लत क्यों लगता है। बीजी की भीगी पलकें देख मेरी आँखें क्यों नम हो जाती हैं जबकि बीजी के दुखते घुटनों में चाहकर भी तेल की मालिश नहीं कर पाती हूँं। मेरे पति, मेरे बच्चे और मेरी नौकरी क्यों मेरे चारों ओर घेरा बना खड़े हो जाते हैं। कैसी विडंबना है ? पर बीजी के साथ ऐसा कुछ नहीं था, वो अपनी गायों के व्यवसाय के साथ, भैया के लकड़ी के टॉल की पूरी देख रेख के साथ कभी हमें समय न दे पाईं हो, ऐसा तो हुआ ही नहीं। कभी उनकी भीगी आँखों के जरिये उनके अंतर्मन में जाकर पूछना चाहती हूंँ, बीजी हम छै भाई बहिनों के लिए आप इतना वक्त कैसे निकाल पाती थीं, हम छै में से एक भी आपके लिए समय क्यों नहीं निकाल पाता है ?
ऐसे अनेक प्रश्नों में उलझी मैं वापस स्टॉफ रूम में आकर निढाल अपनी कुर्सी पर बैठ जाती हूंँ। और सोचती हूँ बेटी को प्र्रश्न पूछने का हक भी कहाँ बनता है। एक बार मायके की दहलीज पार कर प्रश्नोत्तर की सीमाओं से तो परे हो जाती है, एक मूदर्शक की भांँति अपनी बीजी के सुख दुख को आँकने की हैसियत लेकर। दो बूँद आँसू गाल तक यूँ ही ढलक आते हैं। लगता है बीजी का प्यार मैंने अपने आँसुओं में ही समाहित कर लिया है।

करमजीत कौर
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धरमपुरा, जगदलपुर-494001, छ.ग. मो.-9425261429