अंक-4-फेसबुक वाल से-संतोष श्रीवास्तव की फेसबुक वाल से

नज़्म

ये बारिश की बूंदें मुसलसल बरसती
निगाहों में कितनी असीसें उमड़ती
हरएक घर के आंगन की खुशहाली बारिश
महकते दिलों में है मतवाली बारिश
हवा के दरीचों में बूंदें थिरकतीं
सावन के झूलों में हीरें मचलतीं
है रांझे के दिल में शमा सी पिघलती
ये बारिश की बूंदें मुसलसल बरसती।
मुझे याद आती है बचपन की बारिश
वो कागज की कश्ती में नटखट सी बारिश
वो भुट्टों में सिंकती सोंधी सी बारिश
वो भीगे बदन में ठिठुरती सी बारिश
कहां है….कहां है वो बचपन की बारिश
मेरे जिस्मों-जां में भटकती सी बारिश
कहां है………..कहां है……….कहां हैं ?

संतोष श्रीवास्तव
की वाल से