राजकुमार कुम्भज की कवितायेँ

जैसे छू लो आसमान

जैसे छू लो आसमान
कुछ इतना ही आसपास थी मृत्यु
कुछ इतना ही आसपास नहीं था जीवन
कुछ इतना ही आसपास थीं पुकारती पुकार
और मैं पुकार रहा था जीवन की कविता
या कविता का जीवन
अंतिम शब्द नहीं है कविता में मृत्यु
अंतिम शब्द है मृत्यु में कविता
सुनिश्चित है कि मरूंगा मैं
सुनिश्चित है कि मरेगा मैं भी
लेकिन क्या वह उड़ान भी
जो मैं भरता हूं मृत्यु विरूद्ध
और जीवन के पक्ष में ?
शायद नहीं
संशय नहीं
जैसे छू लो आसमान
कुछ इतना ही आसपास थी मृत्यु
जब मैंने की थी कोशिश प्रेम
और आत्महत्या इत्यादि से मिलती-जुलती
जैसे छू लो आसमान।

अकस्मात् नहीं है कुछ भी

अकस्मात् नहीं है कुछ भी
अकस्मात् नहीं होता है कुछ भी
अकस्मात् होने से पहले-पहल भी
होता है, होता ही है, बहुत कुछ
सिगरेट के पैकेट पर लिखी होती है चेतावनी
लिखी चेतावनी पढ़ने के बावजूद
लोग पीते हैं सिगरेट
शराब के लेबल पर लिखी होती है चेतावनी
लिखी चेतावनी पढ़ने के बावजूद
लोग पीते हैं शराब
सड़कछाप दीवारों पर लिखी होती है चेतावनी
लिखी चेतावनी पढ़ने के बावजूद
लोग मूतते हैं वहीं
जहां-जहां लिखी होती है चेतावनियां
वहां-वहां अगर मूतते हैं लोग
तो यही है लोकतंत्र
प्रतिबंध हटाओ, लोकतंत्र बनाओ
प्रतिबंध हटाने या हटवाने में जाएगी जान भी, तो भी
अकस्मात् कुछ नहीं होता।

राजकुमार कुम्भज
331, जवाहरमार्ग, इंदौर
म.प्र.
पिन-452002
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