बस्तर पाति कहानी प्रतियोगिता-1, द्वितीय पुरस्कार-कुमार शर्मा अनिल

पुरस्कार

साहित्य अकादमी का ऑडिटोरियम काफी भरा हुआ नजर आ रहा है। वर्ष 2014 के साहित्य अकादमी पुरस्कारों की घोषणा का अवसर है। मैं चुपचाप बाहर खड़ी रही। हाथ में अकादमी का निमन्त्रण पत्र पसीने से चिपचिपा उठा। ऊपर बड़े बड़े अक्षरों में मेरा नाम लिखा है – श्रीमती मीरा शर्मा (पत्नी स्व. अभिमन्यु शर्मा) मन भर आया तो आंखों को साड़ी के किनारे से पोछ लिया। अभी कुछ पल ही गुजरे होंगे कि स्वयं निदेशक ने आकर मुझसे ‘नमस्ते’ की। ‘अरे मीरा बहिन! आप बाहर क्यों खड़ी हैं ?’ फिर बड़े आदर भाव से मुझे विशिष्ट मेहमानों के साथ पहली पंक्ति में ले जाकर बिठा दिया। जानती हूॅ। यह सम्मान अभिमन्यु की वजह से ही है वरना गांव की पाठशाला में कक्षा आठ तक पढ़ी मीरा को इतने सारे विद्वानों में बैठने को कौन बुलाता।
शुरू-शुरू में कितनी कोशिश की थी अभिमन्यु ने मुझे पढ़ाने की। पर मैं तो जैसे सब कुछ भूल जाना चाहती थी उन्हें पाकर। वे मुझे कोई कविता कहानी सुनाते, फिर पूछते-‘कैसी लगी ?- ‘अच्छी, बहुत अच्छी’-मेरा रटा रटाया उत्तर होता। शुरू-शुरू में वे हंस कर टाल जाते, बाद में मेरी प्रतिक्रिया ही मांगनी बंद कर दी। मुझे भी बुरा नहीं लगा। कौन सुनता उनकी इतनी लम्बी-लम्बी कहानियां।
‘सनी’ के जन्म के बाद तो जैसे मैं और भी उनसे दूर हो गई। वैसे भी उनकी दिनचर्चा कुछ इस तरह की थी कि शायद ही कोई वक्त वह मेरे लिए निकाल पाते। घंटों लेखन में डूबे रहते, आसपास से बेखबर। मुझे भी उन्होंने एक नियति मानकर अपना लिया था वरना कहीं ना कहीं उनके दिल के भीतर एक ऐसी पत्नी की चाह थी जो उनके ‘साहित्यिक मन’ को समझ सके, उनकी रचनाओं पर बहस कर सके। किन्तु मुझ जैसे कमपढ़ के लिए क्या यह सम्भव था ? इन पांच वर्षों में मुझे कभी नहीं लगा कि वे मेरा हाथ पकड़ कर चल सके हैं, बार-बार मैं पीछे छूट जाती। पहले यह ‘पीछे छूट जाना’ अनायास होता था। परन्तु बाद में यह सप्रयास होने लगा। दरअसल ‘पीछे लौटना’ उनके स्वभाव में नहीं था। जबकि मैं उनके इस स्वभाव को सब कुछ खो देने पर ही समझ सकी। बाद के दो वर्षों में तो छोटी-छोटी बातों पर मैं उनसे उलझ पड़ती – ‘ये कपड़े हैंगर पर क्यों नहीं टांगे, कागज फर्श पर क्यों बिखरे पड़े हैं, इन्हें रद्दी की टोकरी में क्यों नहीं डाला।’ वे चुपचाप सुनते रहते फिर पैन कागज हाथ में ले घर से निकलते तो रात को ही घर लौटते। चुपचाप खाना खाते फिर अपनी ‘डायरी’ लिखते रहते। मैं बिस्तर पर सोने का नाटक किये पड़ी रहती। वे चुपचाप आते, मेरे पास सोते ‘सनी’ को उठाते और सीने से लगा कर सो जाते। रात भर मेरी आंखों से आंसू बहकर कनपटियों के आसपास से गुजरते हुए तकिये में जज्ब होते रहते। ‘सनी’ से उन्हें बेहद प्यार था और मैं जानती थी कि ‘सनी’ ही मेरी ‘सोशल सिक्यूरिटी’ था, जिसके लिए वह बार-बार पीछे लौटते वरना बहुत पहले ही मैं उन्हें खो चुकी होती।
‘नमस्ते’ दीदी, कहां खोई हुई हो ? – मेरी तन्द्रा एकदम टूट गई–‘अहां……नमस्ते…..आप ? एकदम से पहचान नहीं पाई उसे। हल्की गुलाबी साड़ी, बड़ी-बड़ी भावप्रवण आंखे, पतले होंठ और उन पर बिंधी शांत, संयत स्मित की एक महीन सी रेखा। बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व। ‘मैं, अनुप्रिया……. अनुप्रिया श्रीवास्तव’। अचानक ढेर सारी घृणा उतर आई है मेरे चेहरे पर। ‘तो ये हैं अभिमन्यु की अनुप्रिया, लेकिन अब यहां क्या लेने आयी है ? मेरे अभिमन्यु की हत्यारी।’ वह मेरे पास वाली कुर्सी पर ही बैठ गई। मैं घृणा से अपनी कुर्सी की दूसरी ओर झुक कर बैठ गयी। लोगों से बहुत सुना था इसके बारे में। सभी पत्र-पत्रिकाओं ने अभिमन्यु आत्महत्या को ‘भावनात्मक हत्या से उपजी आत्महत्या’ कहा था। उनके अपन्यास ‘रेत के समंदर’ की नायिका ‘उपाशा’ से अनुप्रिया को जोड़ा था।
डायरी के पृष्ठ तेजी से मेरी आंखों के आगे फड़फड़ाने लगे-‘आज दसवां दिन है, तुम्हें यह शहर छोड़े हुए। तुम्हें इस तरह नौकरी छोड़कर नहीं जाना चाहिए था। तुम्हारी इस ‘अबु़द्धमत्ता’ के लिए मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगा। तुम ऐसा क्यों सोचती हो कि तुम्हारे कारण मेरा पारिवारिक जीवन तबाह हुआ है। इसके कारण तो मेरे व्यक्तित्व में खोजने होंगे………मीरा के व्यक्तित्व में खोजने होंगे। और फिर तुम्हारा मेरी भावनात्मक परिधि से निकलने का प्रयास समाधान तो नहीं मेरी समस्या का। यह सच है कि मीरा का जाना तुम्हारे कारण हुआ। परन्तु वह पहले से ही मुझसे बहुत दूर थी। हमारे सम्बन्ध निरे शाब्दिक होकर रह गये थे। वे दो इन्सान जो एक जैसी चीजों को प्यार नहीं करते, जिनके सपने, वैल्यूज, आदर्श एक जैसे नहीं, प्रगाढ़ से प्रगाढ़ रिश्ते में बंधे होने पर भी साथ-साथ नहीं रह सकते। मेरी चेतना स्तब्ध सी हो गयी है। समझ नहीं आता ऐसे सम्बन्धों का क्या करूं ? कहां ले जाऊं ? मेरा व्यक्तित्व टुकड़ों में बिखर गया है …..मीरा…..सनी…….और तुम। तुमने कभी कुछ नहीं मांगा मुझसे………न मांगोगी। तुम्हारे स्वाभिमानी मन से मेरा घनिष्ठ परिचय है…….। परन्तु क्या मेरा फर्ज नहीं बनता कि तुम्हें एक सामाजिक धरातल मिले ? इसमें मेरा स्वार्थ भी है। मैं हमेशा के लिए इन ‘रेत के समंदर’ में तुम्हारी घनी छांह चाहता हूं। तुम ही तो वह ज्योति हो जिसके प्रकाश से मेरा पथ आलोकित होता रहा है। दो वर्ष पूर्व के एक साधारण से लेखक को एक नई धारा, एक नये वाद के रचियता के रूप में तुमने स्थापित कर दिया। तुम्हीं ने तो मेरे अवचेतन को झकझोरा था। बरसों से सोये उस लेखक की नींद को हौले से जगा तुमने देश की अग्रणी साहित्यकारों की श्रेणी में खड़ा कर दिया। मेरी कितनी साहित्यिक रचनाएं तुमसे विचार-विमर्श के बाद एक नये रूप में निखर कर सामने आयीं। मैं कई बार यह सोचने पर विवश हो जाता हूं कि तुम मेरी ‘प्रेरणा’ से मेरी कमजोरी कैसे बन गयीं और जैसे ही तुम्हें पता चला कि तुम मेरी कमजोरी बनती जा रही हो, एक झटके से तुमने वे सारे बंधन तोड़ डाले। मैंने वैसे भी तो तुम्हें कई बार स्पर्श किया था। फिर उस दिन ऐसा क्या हुआ कि तुम यूं एकाएक सब स्नेह के बंध तोड़ मेरी जिंदगी से ही नहीं, इस शहर से भी कहीं दूर चली गयीं। लेकिन जरा सोचना अनु!…….। क्या हम एक दूसरे से दूर जा पाये हैं ? शायद पहली बार अपने घर पर मैंने तुम्हे बाहों में भरना चाहा था…..। सच, वासना जैसा कुछ भी नहीं था मेरे मन में। तुम छिटक गयीं। फिर फफक कर रोती रहीं – ‘मुझे अपने गृहस्थ जीवन की बरबादी का माध्यम मत बनाओ अभिमन्यु, मैं अपनी ही ‘आत्मग्लानि’ में घुटकर मर जाऊॅगी – प्लीज।’ और तुम इस दुनिया की भीड़ में मेरे सारे सपने चुरा कर गुम हो गई। कोई ऐसा सूत्र भी नहीं है मेरे पास जो मुझे तुम तक पहुंचा सके। मैं बिखर गया हूं…..। चाहूं तो मीरा को बुला सकता हूं वह दौड़ी आयेगी…….परन्तु यह शब्दहीन ग्लानि क्या मुझे उसके साथ भी जीने देगी ?’
‘मुझसे नाराज हो दीदी ?’ – उसके स्वर में बहुत ही करूणा है। मैं चुप ही रही हूं। वह मेरी ओर भरी-भरी आंखों से देखने लगी। मैंने मंच पर नजरें टिका दी। कार्यक्रम प्रारम्भ होने ही वाला है। चारों तरफ बड़ी गहमा-गहमी है। सामने से जाते हुए एक वालंटियर से मैंने पूछा – ‘एक गिलास पानी मिलेगा ?’ ‘पानी बाहर मिलेगा’ – वह व्यस्त नजर आया। ‘मैं लेकर आती हूं दीदी’ – वह बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये चली गयी।
मैं मन ही मन सोचने लगी- ‘है तो बहुत ही सुंदर, समझदार भी लगती है। इसी ने कोई चक्कर चलाया होगा वरना वे तो अपने काम में बहुत ही डूबे रहने वाले इंसान थे। पिछली पंक्ति में दो व्यक्तियों में क्षुसुर-फुयुर सी हो रही है- इन्हीं दोनों के बीच पिसता रहा बेचारा अभिमन्यु और अंत में दोनों ही छोड़ गयीं उसे।’ ‘गलती तो मिस श्रीवास्तव की है, भरी-पूरी गृहस्थी में आग लगा रही थी पिछले दो बरस से…….और जब मन भर गया तो……‘ एक बोला। ‘वैसे यार, इस अनु को जरूरत क्या थी शादीशुदा मर्द को फंसाने की, ढेरों कुंवारे मिल जाते’ – फिर दोनो जोरों से हंस पड़े।
मैं मन ही मन खुश हो रही हूं। आखिर समाज ऐसे रिश्तों को मान्यता नहीं देता। कितनी प्रताड़ना मिली होगी इस अनु को। सभी तो जानते हैं कि प्रेम में असफल होने पर अभिमन्यु ने आत्महत्या की और उनकी ‘प्रेमिका’ के रूप में अनुप्रिया तो उनके जीवन काल में ही बदनाम थी। अभिमन्यु की आत्महत्या के पश्चात् सभी पत्र-पत्रिकाओं ने अभिमन्यु की दैनिक डायरी प्रकाशित की थी।
‘पानी’-उसने आदर भाव से मेरे सामने गिलास कर दिया। मैं ना चाहते हुए भी पी गई। पीछे बैठे व्यक्तियों की वार्ता चालू है। अनु परेशान हो उठी। मैं मन ही मन खुश हो रही हूं- ‘देख लिया न, पराये मर्दों से मौज मस्ती का अंजाम!’
मंच पर से परदा सरकने लगा। मेरी कल्पना में फिर उनकी डायरी के पृष्ठ फड़फड़ा गये।
‘पत्रिका के कलापक्ष पर पिछले कई दिनों से तीखी प्रतिक्रियाएं मिल रही है। प्रबंधकों से काफी बहस के बाद ‘कला सम्पादक’ की नियुक्ति नहीं रहेंगी। देर रात तक कार्य करने में वह सहयोग नहीं कर सकती। साक्षात्कार में अगली प्रत्याशी एक लड़की थी। मैं पूर्व ही मन में निर्णय कर चुका था कि-‘रिजेक्ट’। वैसे भी उसके पास केवल सामान्य योग्यता ही थी। वह किसी दूसरे शहर से आयी थी। मैंने औपचारिकतावश प्रश्न किया- ‘इतनी दूर इस शहर में अकेले नौकरी कैसे करोगी, माह दो माह में छोड़ जाओगी ?’
‘नहीं सर, मैं जिस शहर से आयी हूॅ वहां भी मैं अकेली ही थी, दरअसल इस दुनिया में भी मैं अकेली ही हूं। अनाथाश्रमों व नारी निकेतन में पली और बढ़ी। जब इस लायक हूं कि कुछ कमा सकूं तो सोचती हूं चंदे के पैसों से चलती इस जिंदगी को स्वयं सहारा दूं। और सर, मेरे लिए यह सिर्फ नौकरी नहीं है, मेरी हॉबी, मेरा भविष्य सब कुछ है’ -कहते हुए वह भावुक हो गयी। मेरा कवि मन द्रवित हो उठा। जब अन्य सदस्यों के मत के विरूद्ध मैंने इस पद के लिए अनुप्रिया श्रीवास्तव के नाम की घोषणा की तो मुझे दूसरों की आलोचना का शिकार होना पड़ा।
अगले दिन से ही उसने कार्य आरम्भ कर दिया। वह बहुत मन लगाकर कार्य करती। कहानी-कविताओं पर उसकी :स्कैच’ लेखकों की भावनाओं को लकीरों से मूर्त कर देतीं। वह स्वयं भी बहुत अच्छी लेखिका थी। परन्तु यह बात मुझे बहुत देर बाद पता चली। मै उससे बहुत ही कम बात करता और उस दिन तो वह कितना सहम गयी थी। ‘सर, आप इतने चुप क्यों रहते हैं ? — मैंने नजरें उठाकर देखा – ‘तुम यहां नौकरी करने आती हो या यह देखने की कौन कितना बोलता है, अपने काम से काम रखा करों, समझीं।’
अगले दिन से ही बिना वह हफ्ते तक नहीं आयी। मैंने प्रबन्धकों को अनुशासनात्मक कार्यवाही के लिए लिख दिया। डेढ़ हफ्ते बाद वह आयी। चुपचाप मेरे केबिन में मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी। मैं बरस पड़ा- ‘तुम्हें’ पता है किस तारीख को पत्रिका प्रेस में जाती है ? ना कोई सूचना ना कोई एप्लीकेशन………. एक बात याद रखना मिस श्रीवास्तव, काम के प्रति लापरवाह लोगों को मैं बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करता। यदि तुम्हें नौकरी नहीं करनी है तो कल से तुम स्वतन्त्र हो……… अपना ‘इस्तीफा’ लिख देना, अन्यथा मुझे ही कुछ करना पड़ेगा।’
वह कुछ देर चुप खड़ी रही फिर रूंधी आवाज में बोली – ‘सर, मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं था। उस रात पेट में तेज दर्द हुआ तो अस्पताल में एडमिट करना पड़ा। ‘एपेन्डीसाइटिस’ का आप्रेशन हुआ। बाद में तेज फीवर हो गया। सूचना देने को मैंने कहा था परन्तु………।’
मेरा गुस्सा एकदम से काफूर हो गया। एक अकेली लड़की ने कैसे मुकाबला किया होगा मौत का। मुझे पश्चाताप होने लगा। मौत के मुंह से निकलकर आयी इस अनाथ लड़की से मुझे इस तरह का व्यवहार नहीं करना चाहिये था। मैंने उठकर उसके सिर पर स्नेह से हाथ रखकर माफी मांगी तो वह फूट-फूट कर रो उठी – ‘मुझ अनाथ को कभी किसी ने प्यार, सम्मान नहीं दिया। बस, या तो सभी डांटते हैं या दया दिखाते हैं। आप भी सर, अभी डांट रहे थे अब आपको ‘दया’ आ रही है। मुझे नहीं चाहिये किसी की दया। मैं सिर्फ अपने काम का सम्मान चाहती हूं। वह मेज पर सर टिका रोती रही। एक कटु सत्य उसने मुझे पकड़ा दिया था। फिर वह उठी और आंसू पोंछ कर खड़ी हो गई-‘आपको बुरा लगा होगा सर, सॉरी सर…….. परन्तु इस्तीफा मैं नहीं दूंगी, क्योंकि मैं अपने काम का सम्मान करती हूं। आप चाहें तो मुझे निकाल सकते हैं।’ – वह तेजी से उठकर चली गई। थोड़ी देर तक मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा रहा। फिर ‘बेल’ बजाकर ‘पियून’ को दो काफी का आर्डर दे, अनु को बुलावा भेजा। वह चुपचाप सर झुकाये मेरे सामने बैठी रही। ’कॉफी पियो अनु और तुम इसी पत्रिका में कार्य करोगी। तुम्हें नहीं इस पत्रिका को तुम्हारी जरूरत है। और हां, इसे मेरी दया मत समझना। क्योंकि ’दया’ वही कर सकता है जो दूसरों से बहुत ऊॅचा हो या अपने आप को समझता हो। मैं ना तो इतना महान हूं ना समझता हूं। मैं भी तुम्हारी तरह ही इस पत्रिका का एक कर्मचारी ही हूं बस।’
उसकी आंखों में सम्मान और स्नेह की एक भीगी सी परछायीं कांप उठी-‘थैक्यू सर।’ और वे स्तब्ध कर देने वाले पल कैसे भावनाओं की हदों को पार करके तूफान उठा देने वाले सम्बन्धों में बदल गये, इसे मैं आजतक नहीं जान पाया। धीरे धीरे अनु मेरे आत्मिक सम्बन्धों की परिधि में एक सुरक्षित बिन्दु की तरह स्थापित हो गयी। मीरा के साथ मेरे सम्बन्ध तनावपूर्ण तो नहीं थे परन्तु सुखद भी नहीं कहे जा सकते। वह इधर-उधर से अनु और मेरे आत्मीय सम्बन्धों के बारे में ‘सुन -सुनकर’ ‘हीन भावना’ की शिकार हो गयी थी। बिना बात मुझसे ‘बहस’ करती फिर हमेशा मायके जाने की जिद करती। उधर ‘अनु’ मेरे व्यक्तित्व का अंग बनती जा रही थी। मेरे अंदर के पुरूष को ऐसी ही नारी की खोज थी जो मेरे साहित्यिक मन को समझ सके। एक हमसफर की तरह मेरे कन्धे से कन्धा मिलाकर चल सके। मीरा और मेरे तनावपूर्ण सम्बन्धों की जब उसे भनक लगी तो वह उदास रहने लगी। वह मुझे प्रेरित कि मैं मीरा का अतिरिक्त ख्याल रखूं। यूं मीरा से मुझे कोई शिकायत नहीं थी। जिन गुणों को मैं एक लेखक होने के कारण अपनी पत्नी में चाहता था वे गुण अगर उसमें नहीं थे तो इसमें उसका क्या दोष था। वह एक अच्छी घरेलू औरत थी जो अपने घर को खूब सजा संवार कर रखती। मेरी व सनी की आवश्यकताओं का पूरा ख्याल रखती, परन्तु……….? और इसी ‘परन्तु’ के बाद मुझे ‘अनु’ की आवश्यकता महसूस होती।
‘दीदी, मैं आपसे सिर्फ एक बात कहना चाहती हूॅ। अचानक पास बैठी अनुप्रिया ने मेरी विचारधारा को तोड़ा। मैंने घृणा से प्रश्नवाचक निगाहें उसकी ओर उठाई। वह एक पल को मेरे चेहरे की घृणा से सहम गई। ‘मैं नहीं जानती दीदी, मेरी बात को आप समझोगी या नहीं या जो मैं कहना चाहती हूं वह शब्दों के माध्यम से कह भी पाउॅगी या नहीं……..लेकिन मैं फिर भी कहूंगी’ -एक खूब गीली और अवरूद्ध फड़फड़ाहट उसके ओठों पर कांप गई। लगा अब रो पड़ेगी। ‘मुझे लगता है दीदी, हम लोगों के सोचने और करने में कहीं बहुत भारी गलती है। जब हम प्यार को इतना पवित्र, इतना महान कहते हैं और यह भी कहते हैं कि प्यार कभी भी, कहीं भी, किसी से भी हो सकता है, तो जब यह प्यार हो जाता है तो हमें ऐसा क्यों लगता है कि कोई ‘वर्जनिय’ कोई ‘अनैतिक’, ‘असामाजिक’ बात हो रही है। किताबी कहानियों से निकल कर वास्विकता के धरातल पर आते-आते यह प्यार इतना ‘असामाजिक’ कैसे हो जाता है ?’ मैं झूठ नहीं बोलूंगी दीदी, अभिमन्यु से मैं प्यार करती रही हूं। यदि मेरी उन अनुभूतियों नितांत अपरिचित आकुलता जो चेतना के कई स्तरों पर स्वयं मुझे बेगानी सी लगती, को प्यार कहा जाये। अभिमन्यु के साथ सब कुछ ‘रिफ्रेशिंग’ सा लगता। लेकिन दीदी, इसे ‘प्यार’ का नाम मैं तब नहीं देती थी…….अब मानती हूं। तब ऐसा लगता था कि कुछ बेहद लचीला……पारे की तरह पकड़ में न आने वाला निहायत ही चंचल ऐसा कुछ मन में है जो विश्लेषित नहीं होता। अभिमन्यु भी मुझे प्यार करते हैं यह बात मुझे जिस दिन पता चली उसी दिन मैं यहां से चली गई थी दीदी। मैंने अपनी तरफ से तो ठीक ही किया था दीदी। आपकी गृहस्थी उजाड़ना नहीं चाहती थी मैं। लेकिन किस्मत ने मुझे यहां भी धोखा दिया। मुझे अभिमन्यु की मौत का ‘कारण’ बना दिया। मैं पूरी दुनिया की नफरत झेलसकती हूं….. परन्तु दीदी आप, कम से कम आप तो मुझे समझ सकती हो। मेरा कसूर सिर्फ इतना है न दीदी, कि अनजाने में ही मुझे एक ‘विवहित पुरूष’ से प्यार हो गया था। अपने इस प्यार के प्रति उत्तर में मैंने ‘अभिमन्यु’ से कभी कुछ नहीं चाहा। उनका प्यार तक नहीं। पूरी दुनिया की सहानुभूति आपके साथ है। समाज अभिमन्यु की पत्नी होने का सम्मान आपको देता है। मैंने इस सम्मान की अभिलाषा कभी नहीं की। अभिमन्यु मेरे लिए इन ‘रिश्तों’ जैसी प्रतिबद्वताओं से बहुत ऊंचे थे। आपने अपना पति खोया है दीदी…. तो मैंने अपने सारे सपने, उमंग, उत्साह खो दिया है। पूरा जीवन मैं इस आत्मग्लानि में घुटती रहूंगी कि अभिमन्यु की मौत का कारण रही हूं मैं। मैं खुद नहीं सोच पा रही हूं कि मैंने सही किया था या गलत। आपके पास तो और भी सहारे हैं बेटा है, पूरा परिवार है। मेरे लिए तो पूरे जीवन में एक अभिमन्यु ही थे। मैं उनकी ’मौत’ की जिम्मेदार हूं न दीदी…….लेकिन क्या यह सब मैंने जान-बूझकर किया ? मैं तो अपनी जान देकर भी उन्हें बचा लेती। बहुत सहा है मैंने दीदी……… सामाजिक प्रताड़ना, सस्ती और बाजारू लड़की की उपाधियां, अभिमन्यु की हत्यारी जैसी टिप्पणियां……. और पूरे जीवन सहती रहूंगी। खुद अपने आप को प्रताड़ित करूंगी अपनी इस गलती के लिए। किन्तु दीदी, अपने प्यार को मैं पाप नहीं मानती ……….मैंने अभिमन्यु से प्यार कर कोई ‘अपराध’ नहीं किया…….. क्या प्यार हो जाना गुनाह है दीदी ?’ और वह फफक फफक कर रो पड़ी।
‘रेत के समुंदर का केन्द्रीय भाव मुझे पहले भी झकझोरता रहा है। अभिमन्यु ने ‘उपाशा’ के चरित्र चित्रण से ऐसी ही सभी लड़कियों की पीड़ा को ही तो स्वर देने का प्रयास किया है जो विवाहित पुरूषों से प्यार कर अपना भविष्य दांव पर लगा देती है। जबकि उन्हें वहां से कुछ प्रतिफल की आशा नहीं होती। तो क्या ऐसा निस्वार्थ प्यार ज्यादा ‘महान’ नहीं कहलाना चाहिये ? व्यवसायिक व सामाजिक गणित के लाभ हानि से दूर उन लड़कियों को जो सामाजिक प्रताड़ना मिलती है क्या वह उचित है ? ‘रेत के समंदर’ की उपाशा से तो हम सहानुभूति रख सकते है तो वास्तविक जीवन की ‘अनुप्रियाएं’ चरित्रहीन कैसे हो गयी ?
सामने अब पुरस्कारों की घोषणा होने लगी है। ‘वर्ष 2014 के लिए सर्वश्रेष्ठ उपन्यास का प्रथम पुरस्कार लेखक स्व.अभिमन्यु शर्मा को उनके उपन्यास ‘रेत के समंदर’ के लिए प्रदान किया गया है। यह पुरस्कार श्रीमति मीरा शर्मा जो ‘अभिमन्यु’ की पत्नी हैं, ग्रहण करेंगी।’- पूरा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से देर तक गूंजता रहा। मेरा मन अभिमन्यु की याद से द्रवित हो उठा। धीरे-धीरे मंच की तरफ चल पड़ी हूं। मुख्य अतिथि और अकादमी के निदेशक हाथ में पुरस्कार ले स्वागत में खड़े हैं। मैं उनके पास ना जाकर ‘माइक’ के पास जाकर खड़ी हो गई-‘भाईयां एवं बहनों, अभिमन्यु जी की रचना प्रक्रिया को जो सम्मान मिला है उसके लिए मैं अत्यन्त आभारी हूं……..। परन्तु एक बात मैं कहना चाहूंगी। अभिमन्यु से भी ज्यादा सच्चे अर्थों में इस पुरस्कार की हकदार अगर कोई है तो वह है ‘रेत के समंदर’ की नायिका ‘उपाशा….’ जो एक विवाहित पुरूष से निस्वार्थ प्यार करती है। उसी की पीड़ा को स्वर देने का प्रयास मात्र किया था उन्होंने। उपाशा के चरित्र का चित्रण भी जिस स्वाभाविकता से अभिमन्यु ने किया है वह ‘अनुप्रिया’ से मिली प्रेरणा से ही सम्भव था। मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि उपन्यास की नायिका ‘उपाशा’ और अभिमन्यु के वास्तविक जीवन की अनुप्रिया…….अनुप्रिया श्रीवास्तव इस पुरस्कार को ग्रहण करे- और बिना किसी से कुछ कहे मैं मंच से उतर फफक-फफककर रोती अनुप्रिया के पास जा उसे मंच पर ले जाने के लिए खड़ी हो गई हूं।


कुमार शर्मा ‘अनिल’
1192-बी, सेक्टर 41-बी, चंडीगढ़
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