संस्मरण-वसंत वि. चव्हाण

परम आदरणीय स्व. लाला जगदलपुरी जी जिनका वास्तविक नाम लालाराम श्रीवास्तव है जगदलपुर के डोकरीघाट पारा में निवास करते थे। उनसे मेरा मनमिलिय तथा साहित्यिक संबंध वर्ष 1975 में श्री बंशीलाल विश्वकर्मा, अध्यक्ष ‘बस्तर तरूण साहित्य समिति’, वर्तमान ‘आकृति कला एवं साहित्य संस्था’, मेरे छात्रजीवन के साथी स्व. भानुप्रताप श्रीवास्तव (रायगढ) जगदलपुर एवं श्री हुकुमदास अचिंत्य जी कवि, गीतकार के माध्यम से हुआ।
श्रद्धेय लालाजी को हम सभी आदरपूर्वक लालाजी ही संबोधित करते थे और वे हर एक से बड़े ही प्रेमपूर्वक हिलमिल जाते थे। उनकी प्रतिदिन की दिनचर्या सुबह 9 बजे से 12 बजे तक तथा शाम 5 बजे से रात 8 बजे तक नगर भ्रमण करते हुये, साहित्य प्रेमी मित्र मंडली से भेंट मुलाकात करते व्यतित हो जाती थी। वे ‘आकृति’ के संरक्षक थे इसलिए आना-जाना एवं साहित्यिक गोष्टि, चर्चा हुआ करती थी। उस समय मुझे हमेशा कहा करते थे कि आप भी कुछ अपने विचार भावों को लिखा करो। उनके सामने मौन रहकर कुछ लिखने का प्रयास किया। आज उन्हीं के आशीर्वाद से कुछ लिखने में अल्पस्वरूप प्रयासरत हूॅं।
लालाजी स्वयं एक व्यक्ति नहीं एक संस्था थे। जिनकी ख्याति न केवल बस्तर अंचल में थी, वे अखिल भारतीय स्तर के सम्मानित साहित्यकार थे। उन्होंने बस्तर की आदिवासी संस्कृति के इतिहास का गहन अध्ययन किया था। उन्होंने गीत, गज़ल, क्षणिकाओं आदि के अतिरिक्त ‘बाल साहित्य’ पर भी कार्य किया था। उनके शोधपूर्ण ग्रंथ साहित्य जगत की अमूल्य धरोहर है।
कुर्ता, धोती, जवाहर जैकेट पहने हुए हाथ में छाता पकड़े कितने किलोमीटर भ्रमण कर जाते थे। आभापूर्ण दमकता चेहरा, हृदय में कोमलता, बुलंद आवाज ही उनके व्यक्तित्व का परिचय रहा।
उन्होनें अपना सारा जीवन साहित्य साधना में ही व्यतित किया। रचना उनकी जीवन संगीनी रहीं। ऐसे साहित्यिक तपस्वी को पाकर संपूर्ण बस्तर अंचल धन्य है। उनकी साहित्यिक कृतियॉं संपूर्ण साहित्यिक जगत को आलोकित करती रहेंगी। ऐसे साहित्यिक मनिषी को मेरी श्रद्धांजली, पुष्पांजली इन पंक्तियों के साथ समर्पित है-
बस्तर की माटी का गौरव
दीपशिखा है निर्भय जलना
घोर तिमिर में दिनकर बढ़ता
शैलशिखर पर अविचल बढ़ता
जनमानस का अटल तपस्वी
सुख-दुख में रहकर अविचल
श्रद्धा के दो सुमन समर्पित/ऑंखों में भर अश्रुजल।।

वसंत वि. चव्हाण
ठाकुर रोड़
जगदलपुर जिला-बस्तर छ.ग.
फोन-09752992194