विमल जैन की कविता

अन्तःमन

सोच रहा हूं अन्तःमन से, जीवन जीना है अब कैसे?
चारो ओर अंधेरा है, भौतिकता का डेरा है।
यह भी कोई जीवन है, जीना जिसका मुश्किल है
खोज रहा हूं अपनों को, मौलिकता का टोटा है।
जाति पंथ की उथली तलैया, डूब रही है धर्म की नैया
राम रहीम सब ईश के बंदे, जाति पंथ तो धोखा है।
कहां गई वो मानवता, जिसमें जीवन दर्शन है
जात-पात से ऊपर उठकर, जाति धर्म को छोड़ा है।
कृत्रिमता से सना हुआ, मानव का व्यवहार हुआ
नैतिकता कैसे अपनाऊं, आधुनिकता का रोना है।
यह तन तो नश्वर है, जीवन फिर भी जीना है
उमंग लौटाती मानवता, संभल जा अभी भी मौका है।
सोच रहा हूं अन्तःमन से, जीवन जीना है अब कैसे?

 

विमल कुमार जैन
व्याख्याता(गणित)
सनसिटी, जगदलपुर
जिला-बस्तर छ.ग.
मो-09424283971