काव्य-डॉ. के. के. अग्रवाल

वह मेरे घर आई है

वह मेरे घर आई है
दबे पांव,
कई दिनों से आ रही थी वो,
पहचानता नहीं था उसे।
कोहरा छाया रहा कई दिन,
फिर चली सर्द हवाएं।
चाय के कप सी भाप,
बात करते में मुंह से निकलने लगी।
लान की घास पर सहमी सी धूप,
तिरछी होकर लेटी रही कई दिन।
पेड़ की गौरैया दाने को नहीं उतरी,
बाजरा फर्श पर फैला रहा।
बच्चा टोपी पहने,
पीछे हाथ किये बस्ता संभाले,
आधा दरवाजा खोलकर स्कूल सरक जाता।
रजाई से मुँह निकाले मैं चाय गुटकता।
आज धूप ने मेरे कमरे के
रौशनदान को खटखटाया।
कौन, कौन है वहां?
पिटुनिया हँस रहा था
झरबेरा का हाथ पकड़े।
लाल चंपा ने पत्ते गिरा दिये
कनेर के पीले फूल कर रहे थे मोंगरे से कनबतियां।
गुलाब शरमा शरमा कर और लाल हो रहे थे।
पीली दूब पर शबनम मुस्कुराई,
मैंने देखा मेरे घर वो आई थी।

याद फिर आई तेरी

देखो इन सूखी टहनियों को
कैसी काली, हृदयहीन सी ।
दुनिया की यायावरी से बिंधे मुरझाये
संवेदना शून्य मन सी
दिखती हैं।
पर दरअसल सब सूख नहीं जाता
पुष्पित होते पलाश को
इस फागुन देख मन फिर हरियाया है,
ठूँठी डालों मे दहकती उष्मा
बिखरी है कान्तार भर
हरियाली के दृश्य में सिंदूर
छिंटा है चारों ओर।
बाँझ पड़ी मन की कुठरिया से
तेरी याद का झोंका
फिर आया बाहर, मन कैसा तो हो उठा।
रंग भरे तेरी अलकों से
रंगीन रोशनी
फिर टपक रही है।
भीतर कहीं किसी टहनी पर
तेरी याद की दो केसरिया पत्तियाँ
फिर खिल आई हैं।

क्या थी कोई वजह?

सुनसान गली की उस पाटदार चटकीली धूप में
अनायास पहुंचकर
गरमियों की उस ऊमस भरी तन्हाई में
मैं तुमसे वजह जानने की कोशिश में था।
आधे बंद किवाड़ से लगी
दरवाजे से छनी धूप में आधी तुम
आधी तुम्हारी परछाई,
आधी खुली आँसुओं से लवरेज तुम्हारी आँखें।
जो तुम्हारी आँखों ने कह दिया
तुम्हारे कुछ कहने की जरूरत ही न पड़ी
पर बड़े वफादार हैं
तुम्हारे आँसू
तुम्हारी इजाजत के बगैर छलके तक नहीं।
दरवाजे के भीतर को उठते मेरे पांव
तब देहरी पर ही ठिठक गये।
मुझे तब लगा था कि
मैंने वजह जान ली है न कहने की।
पर बरसों बाद
अब भी सोचने लगता हूं
कि क्या सचमुच कोई वजह थी
तुम्हारे साथ न होने की।

 

डॉ० के के अग्रवाल
रिटायर्ड आई पी एस
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