लघुकथा-भगवान की भक्ति-मदन देवड़ा

भगवान की भक्ति

नित्य की तरह दस बजते ही मैं स्कूल की ओर रवाना हो चुका था।
अभी मैं कुछ ही दूर पहुंचा था कि एक साधुबाबा मिल गये। बोले-’’बाबू! भगवान के नाम कर कुछ…..!’’
मैंने कहा-’’बाबा! भगवान तो महान है, सर्वगुण सम्पन्न है, उसके नाम पर मैं आपको क्या दे सकता हूं ?’’ कुछ सोचते हुए मैं फिर बोला-’’अरे, हां, याद आया, हमारे विद्यालय में एक बागवान की आवश्यकता है, आप वहां बागवानी का काम किये करना। हम आपको रोटी-कपड़ा भी देंगे।’’
मेरी बात सुनकर, साधु महाराज आग बबूला हो गये, चिमटा फटकारते हुए बोले-’’छी….छी..कैसा घोर कलयुग आ गया है, अरे मूरख! मैं तेरे यहां बागवानी का काम करूंगा ? और वो भी अपने भगवान की भक्ति छोड़कर!’’
मैं बोला-’’तो महाराज! आप फिर क्यो ंआये हैं मेरे पास अपने भगवान की भक्ति छोड़कर!’’

वे दिन कब आयेंगे

रोटी एक भले हो
लेकिन-
मिल-जुल जिसे-
सभी खाएंगे,
भैया! वे दिन कब आएंगे ?
ऐसे भी दिन जहां,
नियति के नाम-
अनैतिक कृत्य न होते,
ऐसे दिन भी जहां,
’न्याय’ के नाम-
भ्रमित युग सत्य न होते!
जाति-धर्म-मजहब की
पावन नूतन गंगा बहा पाएंगे,
समता के
सुर-ताल मिलाकर
एक साथ मिलकर गाएंगे!


मदन देवड़ा
मालीखेड़ी मार्ग
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