अंक-17-बहस-14-भारत में मार्क्सवादी पार्टी : एक संक्षिप्त नजर

14-भारत में मार्क्सवादी पार्टी : एक संक्षिप्त नजर

कांग्रेस के भीतर विचारों को लेकर दो विपरीत धाराएं शुरू से मुखर थी। सुधारवादियों के तरीके से लोकमान्य तिलक और लाला जी के तरीके भिन्न थे। बहिष्कार और स्वदेशी जैसे तरीके बंग-भंग के पूर्व तिलक आजमा चुके थे। ब्रिटिशों की हड्डी चटका दी थी -बाद में गांधी जी ने अहिंसात्मक रूप से उसी बहिष्कार और स्वदेशी का बिगुल फूंका था। सन 1920 के बाद क्रांतिकारियों की गतिविधियां और 1930 के आते-आते वैज्ञानिक द्वंदवाद और समाज-अर्थ की मुक्ति भी कांग्रेस से अभिव्यक्त होने लगी थी। विचारों की भिन्नता के साथ यह तय था कि आवाम के समक्ष राजनीतिक-स्वतंत्रता प्रथम लक्ष्य थी। चाहे जितने भी किसान-आंदोलन अथवा ट्रेड-यूनियन बने सबकी अपनी सीमित मांगे थीं और आजादी अथवा आर्थिक -सामाजिक सामंजस्य दूर की कौड़ी ही रही थी। यह भी गौर करने लायक है कि विचार वह भी तार्किक, वैज्ञानिक रूप से आवाम तक पहुंचने के लिए एक शिक्षित समाज की आवश्यकता थी। मार्क्सवाद की जन्मभूमि और रसिया के लोग और भारत के करोड़ों अशिक्षित, गरीब किसान और आधे पेट फैक्ट्री के मजदूर वैज्ञानिक द्वंदवाद को कितना समझते। और हमारे नेता उन्हें कितना समझा पाते ? इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वैसे भी, भारतीय आवाम भावना तो समझती है तार्किक तो वह आज भी नहीं है। खैर!
एम. एन. राय की अध्यक्षता में 1920 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की स्थापना हो चुकी थी। प्रारंभ में साम्यवादी ताकतों ने एक महत्वपूर्ण काम यह किया कि इसने किसानों और कामगारों को संगठित किया। लेबर-स्वराज पार्टी, कांग्रेस लेबर पार्टी, कीर्ति किसान पार्टी, लेबर किसान पार्टी प्रमुख संगठन थे। 1928 में सभी संगठन एक दल के तहत नामांकित किए गए -वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी, यह अखिल भारतीय स्तर का संगठन था जिसकी शाखाएं राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में भी खोली गईं। सभी मार्क्सवादी समर्थक इसके सदस्य थे और जिन्होंने कांग्रेस के भीतर रहकर समाजवादी विचार और क्रांतिकारी तरीकों से देश को आजादी, तदुपरांत एक आदर्श समाज की रचना का लक्ष्य रखा।
नेहरू और बोस ने इनका खुलकर समर्थन किया और कांग्रेस के भीतर वामपंथी विचार प्रेषित करने, प्रसारित करने में अहम भूमिका निभाई।
कामगार एवं किसान पार्टी (वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी) की तीव्र प्रगति ने ब्रिटिश सरकार के होश उड़ा दिये। बिटिश मालिकों, पूंजीपतियों द्वारा एशिया और भारत के विभिन्न हिस्सों में बागानी खेती की जाने लगी थी, असम के चाय बागान उदाहरण थे। समाजवादी विचार प्र्रेरित किसानों-मजदूरों की यूनियनें उनकी लगातार उठ रही समानता और शोषण के विरूद्ध हो रहे मामले हाशिये पर रखे जाने योग्य नहीं रहे थे। भारत कच्चे माल का निर्यातक था और लंदन, यूरोपीय देशों की फैक्ट्रियों की जरूरतें समय पर पूर्ण ना होने पर आर्थिक दबाव पड़ना लाजिमी था। ब्रिटिश हुकूमत जैसा कि उसका साम्राज्यवादी चरित्र था, ऐसे मौकों पर दमन की नीति का सहारा लेती थी।
1924 में ही नवजात साम्यवाद पर प्रहार करने के उद्देश्य से सरकार ने साम्यवादी नेता श्री डांगे, मुजफ्फर अहमद, नलिनी गुप्ता, शौकत उस्मानी को कानपुर वोल्वोशिक षडयंत्र में 4 वर्षों की कैद सुनाई। 1929 के आते-आते पूंजीपति जहां विश्व की महान मंदी झेल रहे थे वही वंचितों के यूनियन और उठते समानता के सवाल ने हुकूमत की जमीन हिला दी। दमन चक्र जारी रहा। बल्कि और तीव्र हुआ। 30 के ऊपर साम्यवादियों को, जिसमें तीन तो अंग्रेज साम्यवादी थे -फिलिप स्प्रॉट, बेन ब्रेडले और लेसर हचिंसन, उन सभी को मेरठ षड्यंत्र कांड में अभियुक्त करार दिया गया।
हुकूमत चाहती थी कि ट्रेड यूनियन और मार्क्सवाद कुचल दिए जाएं। विचार प्रसारित न हो, मगर हुआ इसके विपरीत। राष्ट्रीय माने हुए नेताओं ने जिसमें जवाहरलाल नेहरू सरीखे बैरिस्टर भी थे -ने कैदियों की वकालत की। गांधी जी स्वयं मेरठ जेल पहुंचकर कैदियों से मुलाकात की और कैदियों के एजेंडे और उनकी रिहाई, आगे के आंदोलन का हिस्सा होने का आश्वासन दिया। कैदी साम्यवादियों द्वारा अपने डिफेंस में व्यक्त विचार अखबारों के जरिए सारे देश में चर्चित रहे। साम्यवादी विचार प्रबल और प्रखर हो चुका था। हालांकि महत्वपूर्ण नेताओं को बंदी बना लिए जाने के कारण ट्रेड यूनियन और तत्संबंधी साम्यवादी विचार को झटका लगा।
प्रसंगवश यहां उल्लेखित करना समीचीन होगा कि यह साम्यवादी विचार का ही प्रभाव था कि इस विचार ने ’राष्ट्र’ की अवधारणा बदल कर रख दी थी। एक कामगार, दलित-पीड़ित चाहे वह मेनचेस्टर के कपड़ा मिल मालिकों के शोषण का शिकार हो या एक भारतीय मजदूर संघ के बागानों में अपने अधिकारों से वंचित-शोषित, अर्थात दुनिया के शोषित-वंचित एक मंच पर आ चुके थे। पूंजीवाद चाहे लंदन का हो या भारत अथवा अमेरिका का -उसका खात्मा इनका लक्ष्य। यह बहुत व्यापक तब्दीली थी और इस विचार ने राष्ट्रीय सीमाओं का उल्लंघन कर विश्वव्यापी चरित्र अख्तियार कर लिया था।
मार्क्स को नमन!
उसी वक्त, एन अपने उत्कर्ष पर भारतीय साम्यवाद ने सैद्धांतिक मार्क्स के प्रभाव में अथवा अन्य कारणों से साम्यवादियों ने कांग्रेस से अपना नाता तोड़ लिया। यही नहीं, इसने कांग्रेस को बुर्जुआ ताकतों के अधीन संगठन होना बताया और समाजवादी विचारों का दुश्मन। नेहरू और सुभाष जैसे वामपंथी विचारकों को ’पूंजीपतियों का एजेंट’ घोषित किया गया। गांधी जी द्वारा पूर्ण स्वराज्य की घोषणा को बुर्जुआ के अधीन होना बताया और ब्रिटिश साम्राज्यवाद से समझौतापरस्ती कह कर निंदित किया। गांधी-इरविन समझौता देश के साथ धोखाधड़ी ही था।
मार्क्सवादी पार्टी ने दो कदम आगे बढ़कर अपने पांव में कुल्हाड़ी और मार ली कि वे वर्कर्स एंड पेजेंट्स पार्टी को बुर्जुआ का समर्थन प्राप्त है अतः इस पार्टी को ही भंग कर दिया जाए।
यहां ठहरना, विचारना जरूरी है।
ऐसा क्यों किया जाता रहा ?
आज देश में मार्क्सवाद के अप्रसार के लिए ऐसी नीतिया,ं ऐसे कदम के लिए ऐतिहासिक गलतियां क्या सुधारी जा सकती है ? इसे मूर्खता कहें विद्रूपता को हम किस दृष्टि से देखें ?
मीमांसा जरूरी है ताकि हम अपनी गलती आगे न करें। हम इतिहास से सीखें और आगे बढ़ें।
वह कौन सा समय होगा जो पीढ़ी अपने इतिहास से कटकर प्रगति कर ले। वह प्रगति खोखली होगी जो अपनी जमीन की सच्चाई नहीं जानती-समझती। वह बुद्धीजीवी क्या जो बीते समय और अपने समय के सच को देख-समझ ना पाए। हम इतिहास इसलिए नहीं पढ़ते समझते कि वह हमारा मनोरंजन करता है, हम इतिहास में अपना अक्स ढूंढते हैं। अपने पूर्वजों के अच्छे कर्मों के प्रति आभार प्रकट करते हैं, वहीं उनकी गलतियों से सीख लेकर आगे बढ़ते हैं। क्योंकि हम अंधकार युग में पुनः नहीं जाना चाहते।
विचार करें, आप या आपका मित्र जो छुआछूत का मारा है, ऊंचे तबके के लोग आपकी छाया से भी दूर भागते हों!
थोड़ा ठहरें और विचार करें कि क्या यही समाज हमारे वेदों, उपनिषदों ने हमारे समक्ष रखा है ? और इस तरह का मनुष्य का मनुष्य पर भेद! यह किस मनुष्य की कहानी है ?
खैर!
बात मार्क्सवादी राजनीतिक प्रगति की हो रही थी। रोचक तथ्य यह था कि पार्टी के महा-विद्वानों को लगा कि कामगार और किसान दो पृथक पृथक क्लास (वर्ग) है और पार्टी को पूंजीपतियों-जमींदारों (बुर्जुआ) का समर्थन प्राप्त है -अतः भंग किया जाए। सिद्धांत या विचार को मैग्नीफाइंग ग्लास से देखने का नतीजा! जीवन की समस्या को ग्रंथ में ढूंढ कर समाधान करने का अंदाज!
बिना देश की परंपरा इतिहास को समझे और कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की मीटिंग मास्को इत्यादि में अटेंड करके तात्कालिक देशी मार्क्सवादियों ने मार्क्सवादी राजनीतिक प्रगति की भारी क्षति की।
सन 1930 के पश्चात मार्क्सवादी समाजवाद की अवधारणा इतनी तेजी से लोकप्रिय हो रही थी -नेता चाहे कांग्रेस के लीडर हो या सीधे-सीधे किसी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य, कहीं ना कहीं से सामाजिक-आर्थिक स्वतंत्रता की अवधारणा के प्रबल समर्थक थे। आवाम इस बात को समझ चुकी थी। किसान सभा और ट्रेड यूनियनों की एकता ने ब्रिटिश सरकार को कई बार बैकफुट पर ला दिया था। ऐसे वक्त, सिद्धांतों की पेलम-पेल में कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया ने कांग्रेस से ही नहीं डब्ल्यू पी पी (वर्कर्स एंड पेजेंट्स पार्टी) जैसा कि ऊपर बताया गया है -ऐसी पार्टी थी जो सारे भारत में सक्रिय थी जिसकी प्रायः सभी वामपंथी विचारक इसके सदस्य थे और पार्टी के बैनर तले कई-कई मांगे, हड़ताल और सरकार के रास्ते सफलतापूर्वक अवरोध-गतिरोध उत्पन्न किया जा चुका था।
सीपीआई स्वयं को अकेला कर लिया। कांग्रेस से पृथक, नेहरू-सुभाष की आलोचना, कांग्रेस को पूंजीपतियों का संगठन, साम्राज्यवाद से समझौतापरस्ती, मजदूरों-किसानों के शत्रु! इसका नतीजा यह हुआ कि देखते-देखते कम्युनिस्ट पार्टी कई तबकों में बंट गई। छोटे-छोटे दल उग आए। ब्रिटिश सरकार ने मौके का फायदा उठाया और सन 1934 में सीपीआई को अवैध घोषित कर दिया!