काव्य-श्रीमती नंदिनी प्रभाती

साहस चींटी-सा चुपचाप यत्न

मन के गहरे कोने में
सहमा-सा एक बीज पड़ा है
सृष्टि के रहस्य को छुपाकर
पल्लवित होने की अमर चाह में
वह खड़ा है।

हौसला है वह
एक साहस
हसरतें उसकी
बार-बार उग आने की
अंधियारे की चट्टान को तोड़कर
भय से मुक्त होने की चाह में
अपयश के जटिल संकटों को तोड़कर
छोटे-छोटे डरों से घिरी जिन्दगी
मगर फिर भी मंजिल की तलाश में
भटकती राह
उठते कदम
जो पहले कभी न किया हो
उसे कर गुजरने का
अदम्य साहस।

सबकुछ नया
रास्ते नये, साहस नया
मान्यता नयी, उम्मीदें नयी

पुराने पन्ने पलटकर
न देखने की कामना
साहस चींटी-सा चुपचाप यत्न
साहस हमेशा
शेर की दहाड़ ही हो
यह जरूरी नहीं
साहस एक चींटी-सा चुपचाप यत्न
भी तो हो सकता है।

चींटी………
न देख पाने वाले से
रौंदे जाने का भय
लोग अक्सर गाली देते हैं
चाल चींटी को
मगर कछुआ भी कभी
जंग जीत लेता है
साहस चींटी का चुपचाप यत्न
लगन उसमें भी है
धुन उसमें भी है
कभी तो युग बदलेगा
मंजिल कभी तो मिलेगी
साहस चींटी-सा चुपचाप यत्न
रंग कभी तो चढ़ेगा
दुखों का बादल
कभी तो ढलेगा।।


श्रीमती नन्दिनी प्रभाती
एच.आई.जी.-16
पारिजात केस्टल
रिंग रोड़ नंबर-2, गौरव पथ बिलासपुर, छ.ग.
मो.-09826084197

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