काव्य-हेमंत बघेल

कोशिश

अपने नन्हें पैरों से
चलने की कोशिश
करती है पर
गिर जाती है
लड़खड़ाकर.
फिर थामकर
उठ खड़ी होती है
चलती है
फिर गिर जाती है
फिर उठती है
कदम बढ़ाने की
कोशिश करती है
हार नहीं मानती
बार-बार गिरती
बार-बार उठती
कभी मम्मी-पापा
कभी भैया-दीदी
देते हैं सहारा
चलने में.
पर कब तक ?
जीवन पथ में
चलना तो उसे
अकेले ही है
इसलिए
बार-बार कोशिश
करती है
अंत में चलना
सीख ही जाती है.

युवा मन

नयनों में नव स्वप्न लिये
नव उत्साह और नव उमंग लिये
जीवन यात्रा में
पहला कदम
डगमगाते लड़खड़ाते
रखता है.
तरक्की के पथ पर
नित बढ़ना चाहता है.
अनेक आशाओं से भरा मन
इस संसार में
अपना स्थान खोजता है.
युवा मन तो आशाओं भरा है
पर
संसार में चारों ओर
भ्रष्टाचार है
जिसके फेर में
अधिकांश युवा
बेरोजगार का तमगा
पा जाते हैं.
फिर भी युवा मन
नव उत्साह, नव उमंग
और नव आशाओं से
भरा रहता है.

तमाशा

क्यों ठहर गये
चलना नहीं क्या ?
भीड़ लगाकर
हो गये खड़े.
कोई पड़ा कराह रहा है
यह नहीं कि
उठाकर उसे
पहुंचायें अस्पताल
सोचते हैं
स्कूल, कालेज, आफिस
को तो देर है अभी
ठहरकर देखा जाये
तमाशा…


हेमंत बघेल
छत्रपति शिवाजी वार्ड-35
तेतरकुटीपारा
जगदलपुर (बस्तर)
मो.-09098932187