लघुकथा-अवध किशोर शर्मा

दर्द

आज मेरी खुशी का ठिकाना न था। और ऐसा हो भी क्यों न, आज मेरे लेखन को सम्मान जो मिल रहा था। मेरे लिखे नाट्य आलेख पर फिल्म बनाने का प्रस्ताव एक फिल्म निर्माता ने दिया था। निकट भविष्य में मेरा फ़िल्म राइटर होना सुनिश्चित हो गया था।
झटपट कलेक्टर मीणा साहब ने क्लिप दिया और कलाकारों का चयन भी हो गया।
मां ने मुझे भरपूर आशीर्वाद दिया, दोस्तों ने गले लगाकर मिठाइयों से मुंह भर दिया। मेरे घर वाले तो खुश थे ही, बाहर निकलने पर लोग मुझे प्रशंसा भरी दृष्टि से देखने लगते। मुझे कई बार महसूस होता कहीं मेरे बालों के बीच सिंग तो नहीं उग आए हैं।
एक दिन सुबह सुबह मुंबई से उन निर्माता साहब का रजिस्टर्ड पत्र मिला। खुशी और उत्सुकता के साथ हड़बड़ी में उसे खोलकर पढ़ने लगा।
पत्र पढ़ते ही हर ओर सन्नाटा छा गया। पत्र का मजनून ही ऐसा था। लिखा था कि अब हम कि आपकी कहानी पर नहीं, वरन दूसरी कहानी पर फिल्म बना रहे हैं।
कुछ पल को शांत रहा और फिर मैंने उस निर्माता महोदय को तुरंत फोन लगाया, और उनसे कहा कि जब तब लोग मुझे उंचाई पर ले जाकर धक्का दे देते हैं, सच मानिये मैंने अपने पूर्व अनुभवों से सीखकर अपने शरीर की सारी हड्डियां निकाल दी हैं, अब मुझे चाहे जितनी भी उंचाई से धक्का दें, मुझे कोई चोट नहीं लगती, और न ही कोई दर्द होता।

अवधकिशोर शर्मा
चांदनी चौक के पास
जगदलपुर
7974469677