व्यंग्य-सुभाष पांडे

भूख मीमांसा

चलते-चलते वे मुझे बाजार में मिल गए। मुझे रोक कर बोले -’अरे भाई! तुमने सुना ? फलां गांव में एक बुढ़िया भूख से मर गई।’ मैंने अखबारों में यह समाचार पढ़ा था, सो ज्यादा रुचि नहीं दिखाई।
वे बोले -’वाह! कैसे नागरिक हैं आप! इतने बड़े समाचार पर आपकी कोई प्रतिक्रिया नहीं।’
मैंने कहा -’भैया! एक बुढ़िया भूख से मर गई हो, इसमें कौन सी नई बात है। इस देश में, रोज कोई न कोई, कहीं न कहीं भूख और बीमारी से मरता ही रहता है। बाय द वे, वह बुढ़िया किस पार्टी की ओर से अनशन में बैठी थी ?’
वे बोले -’अरे भाई! अगर वह किसी पार्टी की ओर से अनशन में बैठी होती तो और बात होती। और हमें इसका पहले पता चलता तो हम चूकते भी नहीं। खास बात यह है कि बुढ़िया की मौत को हमारी पार्टी ने जांच का मुद्दा बनाया है। बुढ़िया राष्ट्रीय राजमार्ग से लगे एक गांव में मरी है। यह कोई कम बात है। यदि बुढ़िया की भूख से मरने की बात साबित हो गई तो हम लोग सरकार से इस्तीफे की मांग कर सकते हैं। लोकतंत्र में यदि कोई भूख से मर जाए तो यह हमारे नहीं सत्तारूढ़ पार्टी के लिए शर्म से डूब मरने वाली बात है।’
ऐसा कहते हुए उनके मुखारविंद पर सोमालिया की भुखमरी जैसी पीड़ा झलक आई। मैंने कहा -’भाई! लेकिन उन्होंने तो उस बुढ़िया की लाश खुदवा कर देखी थी। पोस्टमार्टम में उसकी पेट में अनाज के दाने पाए गए।’
फिर बोले -’यह सब उनकी चाल है। जरूर उन्होंने पोस्टमार्टम के दौरान बुढ़िया के अमाशय में पके चावल के कुछ दाने डाल दिए होंगे। उनका बस चलता तो बुढ़िया के पेट में अधपचा अंगूर, केला और रसगुल्ला भी निकाल कर दिखा देते। क्या इस घटना से आपको नहीं लगता कि देश भूख, अकाल, बेरोजगारी भ्रष्टाचार का सामना कर रहा है ? हमें तो पूरा विश्वास है कि यही स्थिति है।’ ’लेकिन इस ’ भूखकांड’ का पता आपने कैसे लगाया ?’ मैंने पूछा।
वे बोले -’दरअसल बुढ़िया राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे पास के गांव में मरी थी न, सो खट से हमने पता लगा लिया। दूरस्थ अंचल के गहन वनों के मध्य बसे गांवों में भी ऐसी घटनाएं रोज होती होंगी। लेकिन इतनी वर्षा और पानी कीचड़ में वहां तक कौन जाए। सुविधाजनक ढंग से ऐसी दुखद घटनाएं घटती रहें तो कोई न कोई मुद्दा खड़ा करने में आसानी रहती है। फिर विधानसभा सत्र चलने के दौरान ऐसी घटनाओं को प्रकाश में लाने का महत्व ही कुछ और है। आपने सुना नहीं, हमने इस घटना को लेकर प्रधानमंत्री से भी इस्तीफा मांगा है।’
मैंने मन ही मन यह कहते हुए कि ’गनीमत आपने अमेरिकी राष्ट्रपति से इस्तीफा नहीं मांगा।’ अपनी बात आगे बढ़ाई -’मैंने तो सुना है कि बुढ़िया की भूख से हुई तथाकथित मृत्यु पर सदन पर चिंता की गई।’
वे बोले -’हां, सदन में चिंता से मृतका के परिवार को भी अवगत करा दिया गया है। बुढ़िया के रिश्तेदार सदन की चिंता से स्वयं चिंतित हो गए हैं। और सदन को चिंता में डालने वाली स्वर्गीय बुढ़िया को कोस-कोसकर कह रहे हैं कि काश वह उनकी उम्र लेकर भी जीवित रहती। उस दिन मैं उनके गांव गया था। मृतका का एक रिश्तेदार कह रहा था -’बाबू! बुढ़िया ने मरने की यह स्टाइल अपना कर, हमको परेशानी में डाल दिया है। हर दिन कोई न कोई चला आता है और पूछता है सच-सच बताना रे, डोकरी कैसे मरी ? हम कहते हैं हुजूर! भूख से मरी, तो वह आंखें तरेरते हैं। और यदि हम कहते हैं कि मालिक भरपेट खाकर पीकर मरी है तो वह आग बबूला होते हैं। हमारी तो ’सांप छछूंदर भई गति केरी’ वाली स्थिति हो गई है भइया।’
मैंने कहा -’तो क्या आपका यह कहना है कि क्षेत्र में लोग उदरपूर्ति के लिए भले ही चोरी लूट खसोट करें, भीख मांगे, घूरे में पड़ अन्न उठाकर खाएं, मगर ईश्वर के लिए भूख से न मरें, क्योंकि इससे देश की बेइज्जती होती है।’
वे तुनके -’मैंने ऐसा कब कहा ? लेकिन भैया मरने की भी आखिर कोई शैली होती है। यह क्या ? शस्य श्यामला भारत भूमि में कोई भूख से मरे। और यदि कोई भूख से मरता है तो हमें सरकार से इस्तीफा मांगने का तथा पुनः चुनाव करवाने का पूरा अधिकार है। और यदि ऐसा हुआ तो इस बार हमारा बहुमत पक्का समझना। वैसे क्षेत्र में राहत कार्य जारी रहते तो क्या डोकरी भूख से मरती ? माना कि इस पकी उम्र में उससे कोई काम नहीं होता। लेकिन मस्टर रोल में उसे ’एडजस्ट’ तो किया ही जा सकता था। और तो और बुढ़िया को निराश्रित पेंशन भी नहीं मिलती थी।’
’इस बात का पता आपको कब चला ?’ मैंने पूछा।
वे बोले -’बुढ़िया के मरने के बाद।’
मैंने कहा -’लेकिन मेरी जानकारी में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें निराश्रित पेंशन नहीं मिल रही है, उनका पता आप क्यों नहीं लगाते ?’
वे बोले -’उनमें से किसी की मृत्यु भूख से होगी तो हम पता लगा लेंगे और फिर सरकार की नाक में दम कर देंगे।’
मैंने कहा -’आप बुढ़िया की मृत्यु को यह कह कर भी तो प्रचारित कर सकते थे, कि बुढ़िया गांधी जी के उपवास सिद्धांत का महत्व निरूपित करने के लिए निराहार रहकर प्रभु को प्यारी हुई।’
वे भड़क कर बोले -’गांधी नेहरू का सहस्त्र नाम का जाप वे करें जिन्हें गद्दी बचानी है। हमें क्या लेना देना ?’
’क्यों इन नामों का जाप आप नहीं करते ?’ मैंने पूछा।
वे शरमा कर बोले -’करता था, इस दल में आने से पहले जब उस दल में था, तो करता था, लेकिन अब ऐसा करना पार्टी की दृष्टि में अनुशासनहीनता होगी। बहरहाल बुढ़िया की मृत्यु से उनके सामने राजनीतिक संकट तो उत्पन्न हो ही गया है। इस मुद्दे को लेकर उनके कुछ विधायक अपनी ओर आ मिलेंगे, इसका भी भरोसा है। अब तो हम सतर्क हैं। सत्तारूढ़ दल के कार्यकाल में भूख से मरने वालों की सूची बना रहे हैं। जब हम सत्ता में थे तो उन्होंने भी ऐसी सूची बनाई थी और चिल्ला-चिल्ला कर आसमान सर में उठा लिया था। अब हमारी बारी है। खूब राज कर लिया अब कुर्सी छोड़ें।’
’और यदि उन्होंने इस्तीफा दे दिया और कुर्सी छोड़ दी तो ?’ मैंने पूछा।
वह बोले -’तो क्या ? भूख से मरने वाली उस बुढ़िया का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा ताकि भविष्य में मरने वाली गरीब वृद्धाएं इससे सबक ले सकें, लोकतंत्र के हित में।’

सुभाष पाण्डे
पाॅवर हाउस चैक
जगदलपुर
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