लघुकथा-अतुल मोहन प्रसाद

असर
मालकिन की चिन्ता आज ज्यादा बढ़ गई थी। दो दिन से रूबी अपने बच्चों को दूध नहीं दे रही थी। दरवाजे पर उसके बच्चे भूख से केंकिया रहे थे। मालकिन छड़ी लेकर रूबी के सामने बैठ गई-‘‘चलो बच्चन के दूध पिलाओ।’’ जमीन पर छड़ी बजाते मालकिन बोली। रूबी चुपचाप खड़ी रही। एकटक देखते हुए।
‘‘तुम इस तरह नहीं मानोगी ?’’
मालकिन बोली-’’सामने सो जाओ। दूध नहीं पिलाना है तो तू बच्चे क्यों दी ?’’ डर के मारे रूबी सीधा सो गई। मालकिन के चेहरे पर संतोष की रेखा उग आई। मालकिन सोचने लगी। अचानक परसों बहू के संग हुई बातचीत स्मरण आ गई।
’’यह क्या कर रही हो बहू ?’’ अपने बच्चे को बोतल से दूध पिलाते देख पूछी-‘‘अभी से बोतल से दूध ? अपना दूध क्यों नहीं पिला रही हो ?’’
‘‘अपना दूध पिलाकर हमे अपना फिगर खराब करना है ?’’ बहू ने टका सा जवाब सुनाया। हमे लग रहा है, रूबी बहू का जवाब सुन ली थी। उसी के जवाब का असर था कि उसी दिन से रूबी अपने बच्चों को दूध पिलाना बंद कर दी थी।
कमाई
आशा के आदमी के गुजरते ही उसकी जिन्दगी में निराशा के बादल छाने लगे। मायके वालों ने उसे ज्यादा पढ़ाया लिखाया नहीं था। कहते थे ज्यादा पढ़ लिखकर क्या होगा ? चिट्ठी-पत्री भर लिख-पढ़ ले, गीता-रामायण बांच ले बहुत है। कौन लड़की से कमाई कराना है ?’’ पढ़ाई के मामले में आशा के ससुराल वाले भी वैसे ही निकले। उनका विश्वास था-औरत की कमाई खाने से अच्छा जहर खाकर मर जाया जाये। आाशा के आदमी के गुजरते ही उस पर एवं उसके इकलौते बेटे पर परिवार की ओर से विपत्ति का कहर टूट पड़ा। लाचार होकर एक दिन आशा की जुबान खुल पड़ी-‘‘मुझे मेरे बेटा की उपेक्षा बर्दाश्त नहीं होती, मुझे घर से बाहर काम करने की इजाजत दो।’’
‘’इस घर में औरत नहीं मर्द कमाता है। समझी। देखो यह कैसे सीना भर, बित्ता भर का जीभ निकाल रही है। मर्द रहता तो सीधे आकाश में छेद कर देती। इस मामले में आगे कभी जुबान नहीं हिलाना।’’
’’मेरे हिस्से की जमीन मुझे नहीं देंगे ? मेरी जमीन की उपज का पैसा मुझे नहीं देंगे ? मतलब यही हुआ न कि आप मेरी कमाई खा रहे हैं। एक औरत की कमाई ?’’ सन्नाटा पसर गया आंगन में उसकी बात सुनकर।


अतुल मोहन प्रसाद
शाश्वत पुस्तक सदन
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