लघुकथा-अहफाज़ अहमद कुरैशी

इंतजार


वे तीन से बेटे के फोन का इंतजार कर रहे थे। बेटे ने कहा था-’पापा! फोन में पैसे बरबाद न किया करें, कनाडा फोन करने में बहुत पैसे लग जाते हैं। मैं खुद हर रविवार दस बजे सुबह फोन लगा लिया करूंगा।’
बेटा कनाडा में बस गया था हर रविवार उसका फोन आता भी
है पर इस रविवार नहीं आया। आज मंगलवार हो गया। वे बेचैन थे चिंतित भी हो रहे थे।
कल उनकी पत्नी को अस्थमा का जबरदस्त दौरा भी पड़ा था। अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। अस्पताल से लौटकर उन्होंने सोचा बेटे को जानकारी दे दें। फोन लगाया। फोन बंद था। पर फौरन बाद लड़के ने फोन लगाया-‘हलो।’
बेटे की आवाज सुनते ही उन्होंने कहा-‘ तुम्हारी मां अस्पताल में भर्ती है। अस्थमा का दोैरा है।’
बेटा-‘मां ठीक तो हैं न! मैं मीटिंग में हूं। उसके बाद फोन करता हूं।’
एक घंटे बाद फोन आया-‘पापा! पचास हजार रूपये भेज रहा हूं। अच्छा इलाज करवा लीजिए। मैं छुट्टियां मिलने पर पहुंचूगा।’
पापा-‘कब तक?’
बेटा-‘देखें कितना वक्त लगता है?’

जवाब


नन्हा आयुष आज उदास था। दादा-दादी वापस गांव लौट रहे थे। वे अपने सामान की पेकिंग में लगे थे। आयुष के साथ खेलने के लिए कोई उपलब्ध न था। वह चुपचाप खड़े होकर उनकी तैयारी देखता रहता। कभी अपनी मम्मी के पास जाकर सवाल करता।
मम्मी मेहमानों के जाने से बहुत राहत महसूस कर रही थी। जरा देर बाद आयुष दौड़कर आया और कहा-‘मम्मी! दादा-दादी को रोक लो न!’
‘नहीं बेटा! उन्हें जाना है।’
‘क्या वो अपने नहीं हैं ?’
‘हैं बेटा! ऐसा क्यों कह रहे हो ?
‘नाना-नानी को तो आपने रोक लिया था। इन्हें क्यों नहीं रोकती ?’
मम्मी को चुप हो जाना पड़ा। इस बात का उनके पास कोई जवाब नहीं था।


अहफाज़ अहमद कुरैशी
5-ए आदर्श कॉलोनी
पुलिस लाइन टाकली के पीछे
नागपुर-440013
मो-9545628287