हलबी कविता -गिरिजा प्रसाद पांडे

भितरे बांदा गोटोक अचरीत दखलुं रे दादा जीव जनावर हरिक होला मनुख होला भितरे बांदा।। धन…

हलबी कविता-केशर चंद्र पुजारी

बस्तरिया साग भाजी ऐ ना ऐ बाबू बुदरू। कसने होओ सुदरूं।। मंद लांदा के छांडून। भात…

हलबी कविता-गणेश मानिकपुरी

बेटी बेटी जेबे जनम धरली, पारा गुड़ा उदिम होली… थुमुक-थामक हिंडुक सिकली, हिंडा बुला के हुनचो…

व्यंग्य -वीरेंद्र देवांगन

शराबबंदी पर शराबियों का चिंतन वे रोजाना पीते थे। बगैर पिए उनका हाथ-पॉंव कांपता था। भोजन…

हल्बी कविता-अशोक नेताम

हल्बी कविता पीला बेरा चो समया बुलतूँ संगवारी मन संग खमना ने. चिपटी ने नोन मिरी…