हलबी कविता-केशर चंद्र पुजारी

बस्तरिया साग भाजी

ऐ ना ऐ बाबू बुदरू।
कसने होओ सुदरूं।।
मंद लांदा के छांडून।
भात खांवा रादुंन।।
भाजी संगे झुंड़गा।
सुकसी चो पुड़गा।।
नी लागे ना चाखना।
लेकी चो बाबा दख ना।।
बांगा साग ढेटा-ढेटा।
भाजी नंगत चरोटा।।
ऐ ना ऐ बाबू सोमारू।
साग खावां ना कुन्दरु।।
गोंदरी भाजी लसलसा।
मुंनगा साग सुवाद रसा ।।
कुमडा भाजी खसखसा।
केभय नी करूं ना निसा।।
साग नंगत कड़वाड़ी।
उड़ीद बुनुआं बाड़ी।।
हरवां दार चो साग दादा।
फनस फरूआय खंदा।।
डोकरा-डोकरी येके आनुन।
कायमंजा खांवा रादुंन।।

केशर चंद पुजारी
बड़ेडोंगर