हलबी कविता -गिरिजा प्रसाद पांडे

भितरे बांदा

गोटोक अचरीत दखलुं रे दादा
जीव जनावर हरिक होला
मनुख होला भितरे बांदा।।

धन चो लालच ने होलु आमी भैरा-आंधा
मांगुन खातोर बिता लग मोटोर-गाड़ी
कमाउन खातोर बिता लग निहाय रांधा।।

रुख-राई के गोंदलु, होली पानी लेहरा चो बाधा।
मोटोर-गाड़ी अरू कारखाना ले कारीबादरी खादा-खादा।
लाँकडाऊन चो समया ईली जीवना होली सादा-सादा।।

पुलीस बिता आरू स्वास्थ्य कार्यकर्ता के नी करा बाधा।
बेमारी ले जमाय मरूंआ राज होयदे पादा-पादा।
मुर गुपली अमरीका चो जेन रलो दुनिया चो बाबा।।

आया दन्तेशरी चो किरपा दखा, बस्तर ने नि फसली से बाधा।
लाफी-लाफी रहुं जमाय धरून मुहबांधा।
कितरो छुत बेमार, आय ये चायना चो फाँदा।।

गोटोक अचरीत दखलुं रे दादा
जीव जनावर हरिक होला
मनुख होला भीतरे बांदा।।

गिरिजा प्रसाद पाण्डे
सातगाँव(कोण्डागाँव)