अर्ध रात्रि का ज्ञान
पकने का समय कई दिनों से अब तक/लिखने का समय 7.45 ए.एम. से 10.15 पी.एम. दिनांक-8 अगस्त 2026

विकास और उससे उत्पन्न विनाश, आखिर हम कैसे चुने अपनी पसंद!

लेखक-सनत सागर, संपादक बस्तर पाति, जगदलपुर, छ.ग.

हमारे बस्तर की प्रकृति को संजोये रखने का स्वप्न लिये कुछ लोगों की संगोष्ठी में जाने का अवसर मिला मुझे। बमुश्किल पच्चीस लोग! उसमें कुछ लोग अपने अपने क्षेत्र के दिग्गज! कुछ हमारे जैसे श्रोता, लोगों के विचारों को सुनकर समाज की तह तक जाने में आनंद आता है। इस तरह समाज के शरीर का एक्सरे और उसके बाद उसकी रिपोर्ट!
वास्तव में बस्तर के लिये विचारा गया विषय सिर्फ बस्तर के लिये ही था, ऐसा नहीं है। वास्तव में ये विषय पूरे देश और पूरे विश्व के लिये विचारणीय है। और मजे की बात है कि गोष्ठी भी उसी लेवल की होती है। पूरे विश्व का चिंतन!
वर्तमान की बहुत बड़ी भयंकर समस्या है जो कि केंसर से भी भयावह है कि हम दर्द में आनंद अनुभूत करने लगे हैं। ठीक उसी तरह जब कोई घाव लगभग सूखने की स्थिति में आता है उस वक्त उसकी पपड़ी नोचने में आनंद आता है। दर्द में आनंद के इस युग में हर कोई खतरों का खिलाड़ी बना हुआ है। एक ढूंढो हजार मिलते हैं!
जब तक हम अपनी बीमारी के प्रति लापरवाह बने रहेंगे तब तक ठीक होना भी मुश्किल होगा। हमने आपने देखा है कि लोग शुगर से पीड़ित होते हैं और दबाकर मिठाई खाते हैं। देर रात जागते हैं, सिगरेट, दारू, मुर्गा सबकुछ! साला ये शुगर क्या बिगाड़ लेगा मेरा।
हार्ट वाले दबाकर समोसा (भले ही ये बेचारा मुफ्त में बदनाम है।) ब्रेड के बने आइटम, मैदा के आइटम और आजकल का मोमोज! और शादी पार्टी का मेन आइटम पनीर तो भूल ही गया।
कुल मिलाकर हम अपनी मौत को सांड समझ कर बार बार लाल गमछा हिला हिला कर उकसाते हैं। जबकि ये सभी जानते हैं कि जिन्दा हैं तो सबकुछ सबकुछ है। देख भी रहे अपने अड़ोस पड़ोस के बीमार मरते हुये लोगों को। पर मजाल है कि उंघती हुई मौत को लात मार उंगली न करें।
खैर! ये विषय से भटकने जैसा लग रहा होगा पर मैं पूर्ण रूप से विषय पर ही हूं। जब तक हम अपने जीवन के प्रति अपने परिवार के प्रति घोर लापरवाह बने रहेंगे तब तक प्रकृति बचाने की, पर्यावरण बचाने की कवायद ठीक वैसी ही रहेगी दिन चिड़ियों को पानी रखेंगे, घोसला बनायेंगे और रात को बत्तख मुर्गा, मौसम आने पर बटेर कबूतर सबकुछ चट कर जायेंगे।
अब सीधे सीधे कूंगा मैं कि जब तक पर्यावरण की सुरक्षा और प्रकृति बचाओ को हर बरस मौसम के आनंद लेने की तरह मनाते रहेंगे तो मात्र स्वयं को स्वयं हह छलते रहेंगे।
मैं अपनी आंखों देखी बल्कि उस घटना के दौरान शामिल भी था, बताना चाहूंगा। मैं अपने बेटे को लगभग सात साल उम्र तेज बरसते पानी में भी वृक्षारोपण के कार्यक्रम में लेकर गया था जबकि उसकी मम्मी मुझे तेज बारीश के कारण मना कर रही थी। मैंने उस वृह्द वृक्षारोपण कार्यक्रम में देखा कि ढेरों लोगों की भीड़ उस सीमित स्थान में लगी थी। एक पार्टी एक गुट जब उस स्थान से वृक्षारोपण करके निकलता था तब दूसरा वहां जा पा रहा था। जब हमारी पारी आयी उस वक्त लगभग स्थान नवीन पौधों से भर गया था। ऐसा कोई स्थान भी समझ नहीं आ रहा था कि वहां पर हम अपना पौधा रोप कर एक भला काम कर सकें। हमारी दुविधा को हमारे गुट के नेतृत्व ने तत्काल समझ कर उस विषम परिस्थिति को अनुकूल बना लिया। शायद मोदी जी ने उस महान व्यक्ति से ही आपदा में अवसर ढूंढने का गुण विकसित किया होगा।
उस नेतृत्व ने हमें कहा -’जो पौधे लगें है उनको उखाड़ कर फेंक दो और वहीं पर अपने पौधे लगा दो। अच्छा हुआ हमारी तो खोदने की भी मेहनत बच गयी। वरना भयंकर पानी बरसात में कैसे खोदते वृक्षारोपण के लिये गढ्डा!’
आधे घंटे में हमारा वृक्षारोपण सम्पन्न हुआ। छाते वाले ने मोबाइल खूब पोज लेकर फोटो खींची क्यों हमारे पास तो समय ही समय था पुराने उखाड़ो वहीं नये लगाओ।
बेहद जबरदस्त अनुभव था।
कितना मुश्किल है न! सामने पिज्जा केक और भजिया रखा हो और हमें चुनना है क्या खाया जाये ? उस वक्त अपने मन को मारना कितना कठिन है एवरेस्ट की चढ़ाई जितना!
पर्यावरण कैसे बचाना है, प्रकृति कैसे सहेजनी है, हम कैसे बच सकते हैं, हमें कैसे बचाना है, ये हम सब भली भांति जानते हैं। हमारा सिखाया एआई, चाट जीपेट और तमाम कम्प्यूटर बुद्धि क्षण भर में बता देते हैं। इसको जानना समझना गोष्ठी करना सब बेकार है। क्योंकि हम सब इससे भलीभांति परिचित हैं।
गोष्ठी; वही न! जिसमें किसी जल्दी से कोई दूसरा काम करने जाना होता है, किसी को बहुत अर्जेन्ट काम छोड़कर आना हुआ होता है और खुद के बोल कर जाने तक का समय होता है। किसी को मंच मिलता है तब वो बेचारा विषय पर बोल पाता है। किसी का दोस्त आ जाता है वक्तव्य देते ही। कोई अपनी कोई दूसरी भड़ास निकालता है। कोई किसी से पैर पड़वाने आता है। कोई अगले दिन के अखबार में फोटो अच्छी आये इसलिये मंच पर बीचोबीच जगह चुनता है। मतलब गोष्ठी में गोष्ठी के अलावा सबकुछ होता है।
डाटा परोस कर कोई बात करता है, कोई किसी का उदाहरण देकर इतिश्री कर लेता है।
इस पर भी गोष्ठी एक सशक्त माध्यम है किसी भी विचार को लोगों तक पहुंचाने का। पर घिसे पिटे ठस से लोगों में इसका क्या असर होता है भगवान जाने।
अरे! हां, भगवान के पास ही है इसका उपाय। अच्छा हुआ और भटकने से पहले ही याद आ गया!
हमारे सनातन धर्म की समस्त शाखाओं में मानव जीवन में प्रकृति पूजन अनिवार्य है। बस! यही तो हमारे दर्द की दवा! इसके अलावा सभी कार्य बीमारी के इलाज की जगह लक्षणों का इलाज करते हैं।
हम अपने जीवन में एक घटना देखते हैं जिससे हम आसानी से सबकुछ समझ सकते हैं। सरकार शराब बेचती है। क्यों बेचती है ? क्योंकि उससे राजस्व मिलता है। अब सरकार शराब के प्रचार प्रसार से शराब क्यों बेचती है ? चलो मान लेते हैं राजस्व के लिये।
सरकार दारूखोरों के इलाज में, उनके कारण पैदा हुये पारिवारिक विवादों से हुए सामाजिक विद्वेष में, उसके कारण पैदा हुये झगड़ों में, उसके कारण हुई मारकाट में और एनजीओं के माध्यम से शराब छुड़ाओं आदि अभियान चलाने में, पेंटिंग प्रतियोगिता, वाद विवाद आदि में, एक्सीडेंट के क्लेम में जितना पैसा खर्च करती होगी क्या वो कम होगा ?
ठीक इसी प्रकार हम भी जैसे जैसे धर्म को अफीम का टुकड़ा मानते गये हम बीमार होते गये।
हमारे धर्मगुरूओं की हजारों लाखों वर्षों के शोध का फल ही था कि हमने अपने जीवन की प्रत्येक क्रियाओं को धर्म से जोड़ दिया था।
बुरा हो मैकाले का और उसके बाद देशी मैकालों का, जिन्होंने व्यक्ति के भीतर की प्राकृतिक खोज खबर प्रणाली को मारकर नयी नवेली नौकर बनाने वाली बात बात पर जवाब मांगने वाली तथाकथित वैज्ञानिक प्रणाली में बदल दिया। अब तो बच्चा बच्चा पहले सवाल पूछता है तर्कशील है। इसके बाद भी समाज अपने मूल से कटता जा रहा है।
धर्म से प्रकृति का जुड़ा रहना कितना आवश्यक हम समझने का प्रयास करते हैं। हमारी धार्मिक आस्थाओं में पेड़ पौधे, नदी तालाब, पहाड़, फूल जानवर कीड़े तक पूजे जाते हैं। धीरे से एक ऐसी पूरी पीढ़ी गायब कर दी गयी जो इन चीजों के निकट होती। अब तो ये बातें नये बच्चों को समझ ही नहीं आती हैं। आप उनसे कहोगे कि बेटा! गंगा नदी का पानी पवित्र है इसलिय सड़ता नहीं है।
तो वह झट से कहेगा – अरे! पवित्र नहीं है वो। वो तो ऐसे स्थानों से बहुता हुआ पानी आता है जहां पर मिनरल्स हैं, पेड़ हैं। फलाना है ठिमका है।
सांप को दूध पिलाने को भी इसी तरह के प्रतिप्रश्न से नोच दिया जायेगा आपका मुंह!
हम अभी देखते हैं कि हमारा पारिस्थिक तंत्र बुरी तरह से फेल हो गया है। चूहों की भरमार से हर कोई परेशान है पर कोई कुछ नहीं कर पा रहा है। अच्छे पक्के घर में वे छेद कर रहे हैं। बरबाद कर हैं अनाज से लेकर बहुत कुछ।
आज तो ’सांप को दूध पिलाना’ मुहावरा एकार्थ हो गया है। देशद्रोही को वोट देना, अर्थ निकाल दिया गया है। जबकि देखा जाये तो संाप को दूध पिला कर लोग प्रकृति के संतुलन में सहयोग देते थे। खेतों को बचाने में सांप मददगार होते हैं चूहों का शिकार करके।
हमने पीपल बरगद नीम आंवला की पूजा करते तो देखा ही है। आम की लकड़ी से हवन करते हैं। कदंब के पेड़ का संबंध कृष्ण जी से आदि से वृक्षों का संरक्षण किया जाता था। फलते फूलते पेड़ को काटना हत्या के समान माना जाता था। पहाड़ों की पूजा का सार ये था कि उनसे टकरा कर बहने वाली हवाएं गांव नगर को बचाती थीं या बरसा लाती थीं।
नदी के किनारों पर ही मंदिर होते थे ताकि घाट साफ सुथरे बने रहें। अब तो घाट के किनारे तक घर हैं और उनके सीवरेज नदी में। नदी बेचारी कसमसा रही है। कैसा लगे कि आपको एकदम भीड़ में सटसटा कर चलने को मजबूर किया जाये। जहां गुजरने वालों की बदन की बदबू, मुंह की बदबू, पसीने की चिपचिपाहट से निरंतर सटकर चलना है।
नदी को भी मजबूर कर दिया गया है। अभी वक्त है, सारे रहवासों को तोड़ कर दूर किया जाये। नदी को भी आजादी दी जाये। (जे एन यू जैसे नारों वाली आजादी नहीं बल्कि वास्तविक आजादी।)
प्रकृति के प्रति आस्था से जुड़े सवालों को सवाल ही रहने दिया जाये उसमें जरा भी छेड़खाड़ न सही जाये। बल्कि शिक्षा में ऐसे अध्याय हों जो चुपचाप मन में इन आस्थाओ को जीवित रखने की प्रेरणा दें।
कुछ समय पहले एक ऐसा दौर भी था जब सरकार को बताना पड़ रहा था कि लेटरीन करने के बाद अच्छे से धोना है अपने कूल्हे और हाथ को भी।
मने विचार कीजिये कि हमारी आस्थाओं से हमको कितना दूर कर दिया गया है। अंग्रेज बेचारे वहां पड़ती भयंकर ठंड के कारण शौचालय जाने के बाद कागज से पोंछ लेते हैं और हमारे देश के काले अंग्रेज भारत में कागज से पोंछने वाले शौचालय बना रहे हैं वो भी धकाधक!
पेड़ों को कटने से बचाने की बात करने के लिये हमें ये सब पाम्पलेट बनाकर अखबार में छापकर पुस्तकें बांटकर आगे बढ़ने का रास्ता मिला है। (बताया गया है कि ऐसा ही करना पड़ता है।) और वर्तमान में नेट के सहारे पूरी दुनिया मोबाइल से जुड़ गयी है इसके बाद भी हर रोज एक अखबार निकालने का पंजीयन होता है। जबकि सब जानते हैं कि अखबार बिकते कम हैं। लोगों ने तो मोबाइल आने के बाद केमरा, घड़ी, टार्च, केल्क्यूलेटर, वॉकमेन, दिशासूचक यंत्र आदि आदि खरीदना ही बंद कर दिया है।
वहीं प्रायवेट स्कूल जो हर पर्यावरण दिवस पर खूब नारे प्रतियोगिता, चित्रकला, स्लोगन करवाते हैं और वे ही अपने स्कूल की पुस्तकों को हर साल बदल देते हैं या फिर पुराने क्लास की पुस्तकों की कटिंग करवा कर प्रोजैक्ट बना कर लाने कहते हैं।
सोचिए! कभी शांति से कि ये कैसा दोहराव है ?
प्लास्टिक झिल्ली का उपयोग करने को उसे देने बेचेने वाले को पकड़ते हैं फाइन करते हैं और बनाने वाला मौज काट रहा है।
अब भी समय दूसरों की गलतियों को सिर्फ देखना नहीं बल्कि ऐसी मौलिक जरूरतों के लिये सरकारी कानून में बदलाव की कोशिश करनी है। काकरोच न मिले न सही दीमक बनकर सामने आयें।
एक बात हमेशा के लिये और हर किसी के लिये सत्य है। कि विकास कोई रोक नहीं सकता है और पर्यावरण की रक्षा के लिये स्थान विशेष को अंधेरे में नहीं रखा जा सकता है। हमें एक संतुलन का सौ वर्षीय खाका तैयार करना होगा, भले ही इसे तैयार करने में दो चार बरस लग जायें लेकिन कुछ न कुछ कठोर निर्णय लेना होगा। मेरे विचार से कुछ बिन्दु हो सकते हैं। जिन्हें मैं बिन्ुद रूप में ही रखूंगा और चाहूंगा आप भी उसके आगे पीछे विचार करें। मात्र वायरल मैसेज की तरह फारवर्ड न करें।
1-हर कालोनी में कुछ प्रतिशत स्थान पेड़ों के लिये हो। आजकल रेडीमेड बड़े पेड़ आते हैं जिनसे जल्दी से डेवलपमेंट कया जा सकता है। (अब ये प्रतिशत भी मैं ही निकालूं क्या ?)
2-अखबारों, पुस्तकों, पाम्पलेटों की छपाई को नियंत्रित की जाये। इनमें भरपूर टैक्स बढ़ाया जाये। जब मोबाइल है तो फिर इन चीजों की आवश्यकता क्यों बनी रहे।
3-फैक्ट्री की स्थापना के पहले उनको उनके प्रदूषण फैलाने के हिसाब से जंगल उगाना आवश्यक किया जाये।
4-कोलो कोला आदि पेय पदार्थों का विक्रय नियंत्रित किया जाये। (भूजल संरक्षण के लिये है भैया जी टेन्शन न लिये विषय के बाहर होने का।)
5-शहरों गांवों की सरकारी भूमि में वर्षा का जल भूजल बढ़ाने के लिये वाटर हारवेस्टिंग बनाया जाये। छोटे छोटे घरों से टैक्स लेकर।
6-नदियों के किनारों को पूर्णरूप से संरक्षित करके उसे सरकारी जमीन ही बना रहने दिया जाये। बल्कि वहंा पर मंदिरों को जगह दी जाये और वे गौपालन आदि करें। इंसानों का रहना निषिद्ध हो।
7-धार्मिक आस्था के विषयों का प्रायमरी स्कूल के पाठ्यक्रम रखा जाये मूल कहानी के रूप में ताकि बच्चे के मन में अमिट छाप बनी रहे। (रोग पनपने से ही रोका जाये।)
8-जो पेड़ नहीं लगा सकता है उसे घर में पांच गमले लगाने का निमय दिया जाये।
9-हर गांव, शहर मंे एक ऐसा स्थान बनाया जाये (एक से अधिक भी हो बढ़िया हो।) जो संरक्षित वनक्षेत्र हो। वहां कि कटाई पिटाई सबकुछ गांव वालों के जिम्मे ही हो। सरकारी नियंत्रण से मुक्त।
10-वृक्षारोपण त्योहार बंद हो बल्कि हर धर्म के समाज एक जगह आबंटित की जाये और उसमें जंगल बनाने के लिये उनको जवाबदारी दी जाये। मरने वालों की लकड़ी के लिये वहीं के जंगल उपयोग हों।
11-……
उपरोक्त सूची को बढ़ाने की जिम्मेदारी पढ़ने वाले की है। इसमें ये प्रश्न सभी के मन में झट से आयेगा कि अभी वहां कालोनी है, वहां से कब्जा कैसे हटेगा ? आदि। इसका जवाब है कि नियम तो बनाओ फिर देखेंगे कि आगे क्या होता है।

और भईया जी हिन्दी टीचर बन कर मेरे नंबर मत काट लेना।