कहानी – दुनिया गोल है – सनत सागर

दुनिया गोल है 

’एक भी पेड़ कटने नहीं देंगे हम! चाहे इसके लिये जान भी देनी पड़े। एक एक पेड़ उगाने में सारी उम्र निकल जाती है। और उसको काटने में एक घंटे भी नहीं लगते। पेड़ों पर अत्याचार जरा भी बर्दाश्त नहीं होगा। पहले पेड़ उगाओ फिर आओ काटने।’
लम्बा सा भाषण देकर जरा सी सांस ली। उनके सांस लेने पर जनता भी अपनी रूकी सांस को तरोताजा किया, जरा खुल कर सांस ली।
’इस रोड़ का निर्माण रूक जायेगा, सर!’ नगर निगम सीइओ जरा गिड़गिड़ाता हुआ बोला। ’यही एक सड़क है जो शहर के दूसरे हिस्से को जोड़ती है। इसको अगर चौड़ा न किया गया तो शहर का बढ़ता ट्राफिक कैसे कंट्रोल होगा ? आज कल आये दिन उस रोड में दिन में कम से कम तीन बार जाम लगता है। उससे कैसे निजात पायें, आप ही बताइये।’
सीइओ की बात खत्म हुई या नहीं पता नहीं परन्तु नेताजी ने जोर से जवाब देकर उसे चुप करा दिया।
’हम कुछ नहीं जानते। हमें नहीं पता कि ट्राफिक कैसे कंट्रोल होगा। परन्तु रोड चौड़ीकरण के लिये कोई भी पेड़ नहीं कटेगा। आपको जरा भी भान नहीं है कि एक पेड़ के कितने फायदे होते हैं। एक पेड़ से …… टन आक्सीजन निकलती है……’
नगर निगम सीईओ का चेहरा एकाएक लाल हो गया। मानो अगले ही पल फट जायेगा। परन्तु अपनी नौकरी की सीमाओं को याद करता हुआ चुप ही रहा।
पर उसका मन चिल्ला उठा -’लात मारो ऐसी नौकरी को। आम जनता के लिये काम में अडंगे लगाने वाले इन लोगों को तो कमरे में बंद करके ठुकाई करनी चाहिये। सरकारी नौकरी को यूं तो बदनाम करने वाले ही लोग मिलते हैं परन्तु कोई काम कर रहा हो तो ऐसे छुटभैये नेता टंगड़ी अड़ाने आ जाते हैं।’
प्रत्यक्षतः एकाएक वह शांत हो गया और अपने हाथ जोड़कर बोलो -’आपकी बातें एकदम सही हैं, आप सच कह रहे हैं। मैं रोड़ चौड़ीकरण का काम रूकवा देता हूं।’
अगले ही पल नेताजी का नाम लेकर जिन्दाबाद जिन्दाबाद के नारे लगने लगे। और तमाशाई भीड़ छंटने लगी। दिसम्बर की ठण्ड के बावजूद माहौल पसीने छुटा रहा था।
नेताजी के चेहरे पर उभरा विजयी भाव स्थाई भाव बन गया था। उन्होंने अपने चेहरे पर उभर आये भाव को अनथक प्रयास से रोकने का असफल प्रयास किया।
तभी भीड़ से एक दो उत्साही युवक उनके पास आकर उनको कंधों पर उठा लिये।
नगर निगम का सीइओ अपनी सरकारी गाड़ी में बैठता हुआ ये सब देख रहा था। उसने अपनी हथेली का मुक्का बनाकर सीट पर ठोंक दिया। तभी ड्रायवर ने उसके बैठते ही गाड़ी स्टार्ट कर दी और चल पड़ा।
रात दोनों ओर भारी थी। एक ओर सार्वजनिक अपमान था तो दूसरी ओर सार्वजनिक सम्मान था। दोनों अपने अपने सपनों की दुनिया में भटक रहे थे। और ये दिवा स्वप्न के जोड़ीदार सपने नींद से कोसों दूर करवटों की दुनिया में गोते लगा रहे थे।

हाथों में अखबार था। स्थानीय समाचार का पन्ना खुला हुआ था। समाचार शीर्षकों को नजरे मार रहा था। तभी कोने के समाचार पर नजर पड़ी।
कुशालपुर रोड़ पर दो व्यक्ति मरे और दो घायल
समाचार के विस्तार में घायलों के नाम और पते थे। मरने वाले में एक औरत एक बच्ची थी। ठोकने वाले बाइक सवार था।
मन खराब हो गया उसका ये समाचार पढ़ते ही।
’अरे! आप कबसे अखबार पकड़े बैठे हैं। मैं आपको कबसे आवाज दे रही हूं। चाय पीने के लिये। पर आपको तो अखबार ही प्यारा है।’
पत्नी की फटकार थी या मनुहार, उसे समझ न आया।
वह मुस्कराकर चाय का कप हाथ में ले लिया और पास रखा मोबाइल उठा कर एक नम्बर डायल किया।
’सर! नमस्कार! मैं सीइओ नगर निगम बोल रहा था सर! ये समस्या कब तक चलती रहेगी सर ? लोग यूं ही मरते रहेंगे और हम देखते रहेंगे!’
’…..’
’माना हमारी मजबूरियां हैं पर मरने वाले बेचारे किस कारण से मर रहे हैं। ये कुशालपुर सड़क अब तो यमपुर सड़क में बदल गयी है। कुछ कीजिये सर। मैं तो हार गया हूं।’
’……!’
’जी… ज..जी, हंय! अच्छा…..अच्छा! जी ठीक है। देखता हूं मैं अभी देखता हूं। पेज नबंर तीन में न सर! जी …जी मिल गया।…….’ कुछ पलों की शांति के बाद वह जोर से चिल्लाया।
’सर! मजा आ गया। अब आया न उंट पहाड़ के नीचे। सर पूरी तरह से रगड़ना, जरा भी न छोड़ना। रखता हूं सर!’
कह कर मोबाइल रख दिया।
’सुनो विमला! एक कड़क चाय और बना दो प्लीज!’
कुर्सी पर बैठ गया और अपनी टांग के उपर दूसरी टांग रखकर अपने एक हाथ की उंगलियों को दूसरे हाथ पर बजाने लगा।
उसकी दसों उंगलियों में तरह तरह की रत्नों से सजी अंगूठियां थीं। उसने पीले से रंग वाले रत्न की अंगूठी को अपने होंठों से चूम कर आसमानी भगवान को धन्यवाद ज्ञापित किया।
अगली सुबह उसके ट्रांसफर का कॉल उसके फोन पर था। तीन सौ किलोमीटर दूर दूसरे शहर में। बच्चों के लिये अच्छे स्कूल और कोचिंग की व्यवस्था बड़े शहर में भली भांति हो जाती है इसलिये उसने ही आवेदन लगाया था और स्वीकृति आ गयी थी। सबकुछ दो दिन में ही निबटा दिया और नया शहर ज्वाइन कर लिया।
’दो साल में तीसरा ट्रांसफर है आपका।’ पत्नी ने कहा।
’ये तो हमारी ईमानदारी का ईनाम है। हम जहां जाते हैं वहां अपने झंडे गाड़ते हैं और दूसरों के झंड़े उखाड़ते हैं। अब देखो यहां कितने दिन रूकते हैं।’ हंस कर जवाब दिया।
’ये बोलो के इस बार मनचाही जगह में आ गये हैं। आपको जहां भेजेंगे वहां चले जाना पर हम ये शहर नहीं छोड़ने वाले।’ पत्नी हंस कर बोली।
’जैसी आपकी आज्ञा!’ कहकर सीइओ सागर ने अपना सर झुका दिया। ’हम तो वैसे भी हुकुम के गुलाम हैं। जो जैसा कहता है वैसा मान लेते हैं ठीक ऐसे ही सर झुका कर।’
अबकी दोनों मिलकर हंसने लगे।
माइनिंग डिपार्टमेंट था अबकी बार। नये टाइप के काम थे यहां पर। कुछ ज्यादा ही मन लगने लगा था। ऑफीस ज्वाइन करते ही सबसे पहले सभी लटकी फाइलों को मंगवा कर उनका भली भांति अध्ययन किया। हफ्ते भर में ही संबंधित लोगों को फोन करके बुलवाना शुरू किया था। आज उसकी सूची का नवमा नाम था।
वह इंतजार कर रहा था। तभी चपरासी ने एक कार्ड लेकर प्रवेश किया। सागर ने कार्ड देखते ही बिना पढ़े कह दिया ’भेज दो।’
दरवाजे की चिरर्र की ध्वनि ने आगंतुक के भीतर आने का प्रमाण दे दिया था। उसने सर उठा कर देखा। सामने खड़े व्यक्ति को देखकर चौंक कर खड़ा हो गया। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि जिससे मिल रहा है वो वही है। जबकि मिलने वाले ने अपने हाथ में कीमती गुलदस्ता और चेहरे पर मुस्कान लेकर प्रवेश किया था।
’सर! नमस्कार! सर, पहचाने या भूल गये।’
’अच्छी तरह याद हैं आप। आपको कैसे भूल सकता है कोई। पर्यावरण के लिये जीने मरने वाले हैं आप तो। कैसे आना हुआ आपका ?’
’सर! आपने बुलवाया है तो हम आ गये। मेरे लायक क्या सेवा है बताइये ये नाचीज शायद आपके काम आ जाये।’
’मैंने …? मैंने कब आपको बुलवाया ? मैं समझा नहीं आपकी बात !’ सागर असमंजस में पड़ा बोल पड़ा।
’सर! ये नोटिस आपने ही भेजी है न! राजकिरण…..वल्द रामकिरण, ग्राम हदहदा!’
’जी हां, भेजी है मैंने।’
’तो सर, मैं ही हूं न। आपके हुक्म की तामील करने आया हूं।’ वह मुस्करा कर बोला।
’पर आपका नाम तो कुछ दूसरा है न। शायद गुड्डा भैया।’ सागर ने याद करते हुये कहा।
’शायद नहीं सर! वास्तव में यही नाम है मेरा। और राजकिरण तो स्कूल कालेज का नाम है। इस नाम को तो सरकारी कागजों में जाना जाता है।’
’ओ! जी बैठिये।’ सागर अबकी मुस्करा कर बोला। और घंटी बजाकर अर्दली को बुलाया। ’दो कप चाय और दो गिलास पानी लाना।
अर्दली ने हां में सर हिलाया और चला गया।
’तो बताइये सर। करना क्या होगा हमारे केस में। हमारी एक छोटी सी ग्रेनाइट खदान है। आपके विभाग द्वारा आपत्ति लगाकर काफी दिनों से बंद कर दिया गया है। हमारा करोड़ों रूपया फंसा हुआ है। इसके साथ ही दो गिट्टी खदान भी बंद करवा दिया गया है। अब आप तो पहचान वाले साहब हैं। हमारा काम जल्दी निपटवा देते। जैसा आप बोलेंगे वैसा हम करने को तैयार हैं।’ कहकर राजकिरण उर्फ गुड्डा भैया ने हाथ जोड़ दिये और मुस्करा दिये।
प्रत्युत्तर में सागर एसी का एक नंबर और बढ़ाया और अपनी कुर्सी पर जरा ज्यादा ही टिकता हुआ मुस्कराने लगा।
’जरा चाय पानी कर लीजिये। काफी दूर से आये हैं थक गये होंगे आप।’ सागर ने कहा।
’कहां काफी दूर से आये हैं सर! अपना तो यहां चार चार मकान है। एक टांग वहां तो एक टांग यहां पसारे रहते हैं।’
’अच्छा!’ सागर की आंखों में आश्चर्य छा गया।
’जी सर! अब करें भी तो क्या करें, धंधे के लिये तो दुनिया पागल है। यहां वहां न भागो तो काम भी नहीं चलता है। सर! बताइये न हमारे केस में क्या करना होगा। बेमतलब डेढ़ साल से ताला लगा है, वहां लगी मशीनें सड़ जायेंगी। बिजली का बिल भर भर कर लाखों रूपये बरबाद हो गये। हमारे केस में तो सिर्फ चेकिंग में आये अधिकारी कि जिद के कारण मामला लटका हुआ है। अब आपसे क्या छिपाना आप तो अपने आदमी हैं। उस चेकिंग में आये अधिकारी को हम वहां टेकल नहीं कर पाये थे। वहीं के वहीं निपटा देते तो मामला यहां तक नहीं पहुंचता।’
सागर उसकी बात को सुनकर सिहर सा गया।
’निपटता देते मतलब ? ये कौन सी भाषा है ? उनकी आड़ में आप मुझे धमकी देने आये हैं क्या ?’ सागर की बौखलाहट देख कर राजकिरण वल्द राम किरण अपनी सीट से उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर बोला।
’अरे सर! आप गलत समझ रहे हैं। निपटाना से मेरा मतलब लेन देन से था। बातचीत करके जो भी पैसा रूपया देना था दे देते। राम राम सर!’ अपने दोनों कानों में हाथ लगाता राजकिरण वल्द रामकिरण बोला। ’हम सीधे सादे लोग हैं जो काम ऐसे ही हो जाता है तो फिर ये मारपीट वाले काम करेंगे ही क्यों। सर! आपसे करबद्व निवेदन है कि आप मेरा केस निपटा दीजिये। आप जो बोलेंगे आज ही छोड़ दूंगा।’
सागर का दिमाग अब भी भनभना रहा था। वह राजकिरण की द्विअर्थी बातों को समझता हुआ कुछ और सोच रहा था।
’फिलहाल तो आप अपनी सफाई जो भी कहना चाहते हो उसे लिखित में छोड़ शाम तक फिर देखते हैं कि क्या किया जा सकता है।’ सागर पानी का एक घूंट पीकर कह दिया।
’सर! अभी केस निपटा देते तो ठीक रहता….बहुत दिनों से फंसा हुआ है।’ राजकिरण ने फिर हाथ जोड़े।
’मुझे केस निपटाना है इसलिये ही बुलवा रहा हूं लटके केसों को। आप जल्दी करेंगे काम जल्दी होगा।’
सागर अपना ब्रीफकेस उठाता हुआ, खड़ा हो गया। राजकिरण भी खड़ा होते होते बोला।
’सर! कहीं छोड़ना हो तो छोड़ दूं ?’
’नहीं इसकी जरूरत नहीं, ऊपर कलेक्टर सर के के साथ मीटिंग में जा रहा हूं……हां, आप अपने पेपर आज ही जमा कर दीजिये।’
सबके सब केबिन से बाहर निकल गये।
रास्ते भर राजकिरण कुछ कुछ बोलता ही रहा जब तक कि मीटिंग हाल न आ गया।
सागर भीतर जाने के पहले झटके से रूका और मुस्कराता हुआ बोला -’जो पेपर बोला हूं आज ही जमा कर देना।’ और मीटिंग रूम का दरवाजा खोलकर भीतर घुस गया।
एकाएक राजकिरण की मुस्कराहट तनाव में बदल गयी और अपनी हथेली की मुट्ठी बनाकर मीटिंग हाल की दीवार पर मारा। धीरे धीरे भारी कदमों से वह कलेक्ट्रेट भवन से बाहर आ गया।
उसे रह रह कर सागर सर की मुस्कराहट चुभ रही थी। चुभ नहीं बल्कि तलवार की तरह गड़ रही थी। दुनिया गोल है उसने जीवन में अनेक बार सुना था और कहा भी था, और आज तो अनुभव भी कर रहा था।
’अरे मैं हूं न! मैं बना देता आपका जवाब। आखिर किस लिये मुझ पर आप पैसे खर्च करते हैं ? मैं बनाता हूं कोर्ट में एक पल में ही अपना केस फायनल अपने पक्ष में हो जायेगा। किसी जज की हिम्मत नहीं कि मेरे पांइट को काट सके।’
अपने वकील के सामने बैठा राजकिरण वकील के आत्मविश्वास से जरा भी प्रभावित नहीं लग रहा था। फिर भी गाड़ी जवाब के पेट्रोल से ही बढ़नी थी तो वो कर भी क्या सकता था।
’वकील साहब! क्या बिना लिखित जवाब के काम निपटाने का कोई तरीका नहीं है। आपकी फीस तो मैं दूंगा पर कोई तरीका बताओ कि केस ऊपर ऊपर ही निपट जाये।’
’अरे गुड्डा भैया! बिना जवाब दिये कैसे कोई भी सरकारी दस्तावेज को खत्म कर पायेगा ? आपके जवाब के आधार पर ही उस पर टीप लिखी जायेगी और केस बंद होगा….!’
’यही तो समस्या है न वकील साहब! आपको कैसे बताऊं! आप अपनी फीस की चिन्ता जरा भ्ी न करें। मैं अभी कहो तो अभी दे दूं। बस आप ऊपरी रास्ता निकालिये।’ बड़ी बेचैनी से कुर्सी पर अपनी करवट बदलता राजकिरण बोला।
उतनी ही बेचैनी से वकील ने भी अपना करवट बदला। और कहा -’नामुमकीन है!’
राजकिरण ने मानो जवाब सुना ही न हो वह फिर से बोला -’अब तक आपका जो भी हिसाब है उसे बता दीजिये मैं अभी के अभी दे रहा हूं।’
अपने साथ आये व्यक्ति को इशारा किया तो वह अपने बैग से चेक बुक निकाल कर राजकिरण के हाथ में दे दिया। एक पल भी गंवायें बिना राजकिरण ने पन्ने खोलकर साइन किया और वह खाली चेक का पन्ना वकील के सामने रख दिया।
वकील उसकी ओर अजीब नजरों से देख रहा था। अविश्वास और अचरज दोनों भाव एकम एक हो रहे थे।
’ऐसे न देखिये आप! इस बार ये चेक बाउंस नहीं होगा।’
वकील अपनी कुर्सी पर फिर से करवट बदला परन्तु चेक को अपने हाथ में न पकड़ा।
’ये सागर सर हैं न, इनको तो मंत्री लेबल का आदमी भी नहीं संभाल सकता है। मैं आप तो कोई खेत की मूली नहीं हैं। जिस विजीलेंस वाले साहब ने आपके माइन की जांच की थी उसका बड़ा बाप मान लो आप इसे।’
शांत वातावरण में एसी चलने की आवाज भी सुनायी पड़ने लगी। तभी वकील मुस्करा कर बोला -’आप ये चेक रखिये। तमाम उधारियों का हिसाब होता रहेगा। एक दो चेक बाउंस होने से न तो आपको कोई फर्क पड़ेगा न ही मैं गरीब हो जाउंगा। अभी केस निपटाने में शायद काम आ जाये।’
इतना कह कर मुस्कराहट के साथ अपनी आराम कुर्सी में टिक गया।
राजकिरण को जाने क्यों ऐसा लगा रहा था कि सारी दुनिया उसके विपरीत हो गयी हो। वकील साहब की मुस्कराहट काट रही थी। मुस्काराहट में कुटिलता झलक रही थी।
उसके माथे पर पसीना चुहचुहाने लगा। वकील कुछ फाइलें निकाल कर व्यस्त हो गया। कुछ पलों की शांति के बाद उसने वकील से कहा -’ठीक है आप जवाब बनाइये। मैं मार्केट से जरा देर में आता हूं।’
वकील ने प्रत्युत्तर में अपना सर तोते की तरह हिला दिया।
घड़ी की टिक टिक ने जाने कब पूरा डायल घूम लिया पता ही न चला। वकील साहब के खुले ऑफीस में एक बार फिर से राजकिरण मौजूद था। वकील साहब उनके आने पर आंखों से इशारा कर बैठने को कहा और खुद लिखते ही रहे।
आलमारियों में अनेक मोटी मोटी पुस्तकें जमी हुयी थीं। किनारे वाली बड़ी आलमारी मिलाकर सात आलमारियां थीं। लगभग नौ सौ के आसपास पुस्तकें थीं। ’
कौन पढ़ता होगा इनको!’ वह बुदबुदा उठा।
’जी ?’ आपने कुछ कहा क्या ?’ वकील तत्काल पूछ बैठा।
राजकिरण जो अपना समय पास करने के लिये वकील के ऑफीस का निरक्षण कर रहा था चौक उठा।
’क…कुछ नहीं! कुछ भी तो नहीं कहा।’ वह जवाब दिया।
’बस ये बन गया है जवाब! अब आप जरा पढ़कर देख समझ लें।’
’अरे! वकील साहब! आपने लिखा है तो अच्छा ही होगा। मैं क्या टिप्पणी करूंगा उस पर। बताइये कहां पर साइन करना है।’ अपनी जेब से कलम निकालकर उसका ढक्कन खोल कहते कहते।
दो सेट में साइन करके कागज अपने पास रख लिया।
’ठीक है वकील साहब! जरूरत पड़ने पर पुनः आता हूं। नमस्ते।’
फटाफट सब काम करते हुये अपना जवाब लेकर राजकिरण वल्द रामकिरण कलेक्ट्रेट के माइनिंग डिपार्टमेंट के रिसिप्ट डिसपैच टेबल पर पहुंच ही गये। अपना जवाब जमा करके उसकी पावती ले ली। वहीं कुर्सी पर बैठे रहे। बैठे क्या था घड़ी घड़ी अपनी घड़ी देख रहे थे। तब रिसेप्सन पर बैठी महिला कर्मचारी ने कहा।
’सर तो कलेक्टर साहब के साथ दौरे पर गये हैं अब नहीं आयेंगे।’
राजकिरण का गोरा चेहरा लाल हो गया था। वह चाह रहा था कि जल्दी से जल्दी काम की बात हो और सबकुछ निपट जाये। पर…..! कल और परसों सेंकेण्ड सटरडे और संडे की छुट्टी है।
वह भारी कदमों से बाहर की ओर चल पड़ा।

नंबर तो सागर सर का परन्तु बात करने की हिम्मत जुटाना कठिन लग रहा था। तभी अचानक उसका फोन बज उठा। अनजान नंबर था। एक सोचा अगले पल उठा लिया।
’हलो!’
’हां, राजकिरण जी! मैं सागर बोल रहा हूं। मैं सुबह से ही आपको याद कर रहा था।’
सागर की आवाज सुनते ही राजकिरण का ख्ेहरा एक पल को खिल गया और फिर बुझ भी गया।
’जी!’
’मैं पंद्रह दिनों की ट्रेनिंग के लिये आज निकल रहा हूं। इसलिये बता दिया। मैं आते ही तुम्हारी फाइल देखूंगा। ठीक है।’
जवाब का इंतजार किये बिना ही फोन रख दिया।
राजकिरण की चिढ़ और बेचैनी का आलम देखते ही बनता था। वह कसमसा कर रह गया।
प्रतीक्षा के अलावा कोई उपाय भी कहां था।
एक एक दिन करके दिन बीतते गये। और आखिर वो दिन भी आ गया जब सागर सर अपनी कुर्सी पर पहुंच ही गये। आते ही अपने वादे के अनुरूप राजकिरण की फाइल खोली। उसका जवाब देखा। विजिलेंस की रिपोर्ट से मिलान किया। कुछ फोटोग्राफ भी जांच के समय के लगे थे। सबका बारीकी से निरिक्षण करने के उपरांत अपनी ओर से फाइल में टीप लिखना आरम्भ किया। घंटे भर के भीतर सबकुछ निपटा दिया।
दीवार की ओर शून्य में देखता हुआ वह काफी देर तक बैठा ही रहा। दोपहर की चाय आने पर उसकी तंद्रा भंग हुयी।
चाय पीकर वह अपनी हरी कलम से अपनी लिखी टीप पर हस्ताक्षर कर दिया।
शाम होते होते ही राजकिरण उसके दरवाजे पर खड़ा था।
’आइये आइये राजकिरण जी! मैंने अपने वायदे के अनुसार आपकी फाइल तैयार करके कलेक्टर सर के पास भेज दी है।
एक दो रोज में आपको उनके यहां से सूचना आ जायेगी। मेरा तो साइन हो चुका है। कलेक्टर साहब का साइन और होगा।’ सागर ने एक ही सांस में राजकिरण के पूछे बगैर सबकुछ बता दिया।
राजकिरण कुर्सी खींचकर बैठने की चेष्टा कर ही रहा था कि सागर सर अपनी कुर्सी से उठकर चलने को हुये।
’मुझे अतिआवश्यक कार्य से राजधानी जाना है अभी रात आठ को ही फ्लाइट है। आप चिंता मत कीजिये आपको कल ज्यादा से ज्यादा परसों तक यहां से सूचना मिल जायेगी।’
ये कह कर सागर निकल गया।
अनिश्चितता के बादल उमड़ घुमड़ रहे थे। राजकिरण का मन अनचाही आशंका से भारी हुआ जा रहा था।
एक दिन और एक रात बड़ी भयंकर लग रही थी। इतनी टेन्शन तो कभी परीक्षा हाल में पहुंचने से पहले भी नहीं हुयी।
कहते हैं न कि बुरा वक्त भी आखिर कट ही जाता है। कट ही गये एक दिन और एक रात।
पोस्टमेन ने सरकारी चिट्ठी उसके हाथ थमा दी थी। उसने झटपट लिफाफा खोला। और पढ़ना आरंभ किया।
1-श्री राजकिरण वल्द श्री रामकिरण
राजकिरण ग्रेनाइट एण्ड पॉलिश, ग्राम हदहदा।
2-श्री राजकिरण वल्द श्री रामकिरण
राजकिरण स्टोन क्रशर, ग्राम हदहदा।
3-श्री राजकिरण वल्द श्री रामकिरण
राजकिरण पत्थर खदान, ग्राम फिरदा।

संदर्भ-
विजिलेंस जांच क्रमांक……दिनांक….
विजिलेंस जांच क्रमांक……दिनांक….
विजिलेंस जांच क्रमांक……दिनांक….
आपका उपरोक्त विषयक आवेदन क्रमांक….दिनंाक…..

उपरोक्त संदर्भों के अनुसार उपरोक्त समस्त खदानों की लीज निरस्त की जाती है। और अनुशंसा की जाती है कि आपके अन्य समस्त माइन्स संबंधी कार्यों की अत्यंत बारीकी से जांच की जाये और यदि निर्माण, खनन संबंधी कोई शासकीय अनुमति हो तो उसे भी निरस्त किया जाये। एवं जितना भी शासकीय नुकसान हुआ है जब्ती के माध्यम से वसूल किया जाये।
हस्ताक्षर
कलेक्टर

प्रतिलिपि-
समस्त कलेक्टर प्रदेश….
खनन मंत्री, प्रदेश शासन, ….
ग्रीन ट्रीब्यूनल, प्रदेश शासन ….
राजकिरण लगभग गिरते गिरते बचा ये सब पढ़ते पढ़ते।
उसके सारे सपने टूट कर चकनाचूर हो गये थे। इज्जत का फालूदा बन गया था।
उसकी गिरते ही उसकी आंखें बंद हो गयी थी। घर के सारे लोग गिरने की आवाज के साथ ही एकत्रित हो गये।
अगले घंटे में वह शहर के महंगे अस्पताल में था। मेजर हार्ट अटैक था।
दो दिनों की बेहोशी के बाद आज आंखें खुली थी। उसे जो दिखायी पड़ रहा था समझने का प्रयास कर रहा था। ग्लूकोज की बाटल, सफेद चादर, सफेद पुती दीवारों ने उसे सबकुछ समझा दिया था।
ये सब समझने के बाद अब उसे यहां आने कारण भी याद आ रहा था।
इस बीच उसकी आंखें खुलने की खबर सभी रिश्तेदारों में फैल गयी थी। आईसीयू के बाहर जमघट लगा था। सभी उसे देखने और मिलने को आतुर थे। एक एक करके सभी को डाक्टर ने अनुमति दी थी।
’गुड्डा भैया! ये क्या हो गया आपको। उस कलेक्टर को तो हम छोड़ेंगे नहीं। हजार बारह सौ पेड़ काटने के लिये किसी आदमी को मौत की सजा दे दोगे ? ये कैसा न्याय है ? कोर्ट में घसीटेंगे तो सारी नेतागिरी और न्यायबाजी चूल्हे में जल जायेगी….!’
उनकी बात पूरी भी न हो पायी उनके पास कहीं से आवाज आयी।
’हजार बारह सौ नहीं, पूरा जंगल साफ कर दिया है माइन की आड़ में।’
वे चौंक कर अस पास देखे कोई भी न था। शायद पीछे खड़े कंपाउंडर ने कहा था। पर साफ न हुआ कि किसने कहा।
’कौन बोला रे! कौन बोला!’ वो महानुभाव गुड्डा भैया को छोड़कर बोलने वाले को ढूंढने लगे। पर किसी ने कुछ जवाब न दिया। तब वे वहां उपस्थित डाक्टर की कालर पकड़कर बोले -’लगता है खाल कुछ ज्यादा ही मोटी हो गयी है।’
डाक्टर उसकी इस एकाएक हुयी हरकत पर सकपका गया। वह समझ ही नहीं पा रहा था कि आखिर हो क्या रहा है।
तब तक कंपाउंडर नर्सों ने उनको छुड़ाया और मिलने के लिये महानुभाव को बाहर किया। तब तक दो पुलिस वाले आते दिखे।
पंद्रह मिनट भी न बीते पुलिस वालों को जांच करते करते। वे सभी को लगभग डांटते हुये चले गये।
आईस्ीयू में सिर्फ मरीज और नर्स ही रह गये थे। शांति छायी हुयी थी। राजकिरण दवाई के नशे में सोया हुआ था।
’ये वही है न! इसी को खबर आयी है न वाट्सएप में। ये बहुत बड़ा पर्यावरणविद है एक शहर में और दूसरे इलाके में हजारों की संख्या में पेड़ काटकर बेचने का धंधा करता था।’
’धीरे बोलो मैम! अभी थोड़ी देर पहले ही इसकी वजह से झगड़ा हुआ था।’
’कैसी हालत है ? बचेगा या फिर….?’
’ऐसे लोग मरते नहीं हैं। और मरना भी नहीं चाहिये। इनकी सामाजिक बेइज्जती ही बड़ी भारी सजा है।’
’श्..श श! वो सोया नहीं है। वो तो जाग रहा है।’

सनत सागर