हलबी कविता-गणेश मानिकपुरी

बेटी

बेटी जेबे जनम धरली,
पारा गुड़ा उदिम होली…
थुमुक-थामक हिंडुक सिकली,
हिंडा बुला के हुनचो गांव दखली।
बस्तर चो तुय बेटी,
घर चो पुरखा आरू गांव चो माटी
घर के सरग बनाऊ आय,
गांव शहर के सुंदर बानाऊ आय,
परिवार चलाऊ आय।
सतरा-सतरी चो सेवा संगे
आया-बुबा चो सेवा करुआय
सवसार ने नाव कमाऊ आय।
आया चो लाडरी बाबा चो लाडरी,
गोटक घर ले दुसर घर जाऊ आय
बेटी मया चो डोर बान्धुआय।
बेटी मारा से बेटा बचावा से,
बेटा काजे बोहारी काहा ले पावा से
बेटी के बचावां, बेटी के पढा़वां
सवसार ने नांव कमावां।

गणेश मानिकपुरी
जोबा कोंडागांव